लोक प्रहरी की ओर से दाखिल याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति कॉलेजियम की सर्वसम्मत राय के आधार पर की जाए। इसके साथ ही वर्ष 2015 के राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित सिद्धांतों और मानकों को भी नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल किया जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि न्यायाधीशों के चयन में स्पष्ट नियम और निर्धारित मानदंड होने से प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय बन सकती है। याचिका का एक महत्वपूर्ण पहलू कॉलेजियम के फैसलों को सूचना का अधिकार (RTI) कानून के दायरे में लाने से जुड़ा है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि नियुक्तियों से संबंधित निर्णयों में अधिक पारदर्शिता होनी चाहिए और उचित सीमा तक जनता को यह जानने का अवसर मिलना चाहिए कि न्यायाधीशों के चयन के लिए किन आधारों पर विचार किया जाता है।
संगठन ने मुख्य न्यायाधीश से प्रशासनिक स्तर पर MoP में जरूरी संशोधन करने की अपील की है। साथ ही केंद्र सरकार के कानून मंत्रालय को CJI से परामर्श करके एक महीने के भीतर इस दस्तावेज को अंतिम रूप देने का निर्देश देने की मांग भी की गई है। दरअसल, न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित प्रक्रिया को व्यवस्थित करने के लिए जून 1999 में पहली बार MoP तैयार किया गया था। यह सुप्रीम कोर्ट के दूसरे जजों के मामले में दिए गए फैसले के बाद अस्तित्व में आया था। इसके माध्यम से कॉलेजियम व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति तथा उनके चयन से जुड़े नियम निर्धारित किए गए थे।
वर्ष 2015 में संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी NJAC कानून पारित किया था। इसका उद्देश्य कॉलेजियम व्यवस्था की जगह ऐसी नई प्रणाली लाना था, जिसमें न्यायपालिका के साथ केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों की भी भूमिका होती। हालांकि, 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने NJAC कानून को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके बाद कॉलेजियम व्यवस्था को बरकरार रखा गया, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया में सुधार और पारदर्शिता बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। 16 दिसंबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को मुख्य न्यायाधीश के साथ विचार-विमर्श करके MoP में जरूरी बदलाव करने और उसे अंतिम रूप देने की जिम्मेदारी सौंपी थी। लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े कई मुद्दों पर कॉलेजियम और केंद्र सरकार के बीच सहमति नहीं बन पाने के कारण यह काम अब तक पूरा नहीं हो सका है।
याचिका में इस देरी और मौजूदा व्यवस्था की कमियों को भी उठाया गया है। इसमें कहा गया है कि नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता की कमी से संवैधानिक अदालतों में न्यायाधीशों के चयन की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। याचिकाकर्ता के अनुसार, जजों के चयन में चार प्रमुख गुणों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इनमें निष्पक्षता, निर्भीकता, पारदर्शिता और शुचिता शामिल हैं। याचिका में विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति को महत्वपूर्ण बताया गया है, क्योंकि उनके फैसले अंतिम होते हैं और उनका प्रभाव देश की न्यायिक व्यवस्था तथा नागरिकों के अधिकारों पर पड़ता है। ऐसे में चयन प्रक्रिया का विश्वसनीय और निष्पक्ष होना जरूरी है।अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की आगे की सुनवाई पर नजर रहेगी। यदि नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े नियमों में बदलाव होता है, तो इसका असर देश की न्यायपालिका की कार्यप्रणाली और न्यायाधीशों के चयन की व्यवस्था पर पड़ सकता है।