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दुष्कर्म के आरोपी न्यायिक अधिकारी के पॉक्सो मामलों की जिम्मेदारी संभालने पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के खिलाफ दुष्कर्म के आरोपों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए दाखिल याचिका पर विचार करने की सहमति दे दी है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब एक न्यायिक अधिकारी दुष्कर्म के मामले में आरोपी है और उसके खिलाफ जांच […]

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  • November 4, 2026 8:43 am IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश के खिलाफ दुष्कर्म के आरोपों से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए दाखिल याचिका पर विचार करने की सहमति दे दी है। याचिका में सवाल उठाया गया है कि जब एक न्यायिक अधिकारी दुष्कर्म के मामले में आरोपी है और उसके खिलाफ जांच चल रही है, तो उसे पॉक्सो (POCSO) मामलों की जिम्मेदारी कैसे सौंपी जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए जवाब दाखिल करने के लिए 11 दिसंबर की तारीख तय की है।

दिल्ली पुलिस कर रही मामले की जांच

मामला उत्तर प्रदेश के एक अतिरिक्त जिला न्यायाधीश से जुड़ा है, जिन पर एक महिला ने यौन शोषण और शादी का झूठा वादा करके शारीरिक संबंध बनाने के आरोप लगाए हैं। महिला का कहना है कि उसकी मुलाकात संबंधित न्यायिक अधिकारी से एक वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम से हुई थी।

महिला ने 8 दिसंबर 2022 को दिल्ली के मयूर विहार पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया कि न्यायिक अधिकारी ने बार-बार शादी करने का भरोसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। इस मामले की जांच दिल्ली पुलिस कर रही है। पुलिस इस मामले में आरोपपत्र भी दाखिल कर चुकी है।

न्यायिक कार्य वापस लेने की मांग

याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता राकेश कुमार सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ गंभीर आरोप और जांच लंबित होने के बावजूद उन्हें पॉक्सो मामलों का प्रभार दिया गया है।

उन्होंने कहा कि कम से कम जांच पूरी होने तक संबंधित अधिकारी से न्यायिक कार्य वापस लिया जाना चाहिए। इससे पहले इस मांग को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने उसे खारिज कर दिया था। इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

2023 में हाईकोर्ट से मांगी थी कार्रवाई की अनुमति

मामले की जांच के दौरान जनवरी 2023 में दिल्ली पुलिस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की अनुमति मांगी थी। इसी दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने संबंधित अधिकारी को गिरफ्तारी से अंतरिम संरक्षण प्रदान किया था, हालांकि पुलिस को जांच जारी रखने की अनुमति दी गई थी।

इसके बाद पुलिस ने मजिस्ट्रेट के समक्ष महिला का बयान दर्ज कराया। जून 2023 में दिल्ली पुलिस ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को दोबारा पत्र भेजकर जांच आगे बढ़ाने की अनुमति पर जल्द निर्णय लेने का अनुरोध किया। इस पर हाईकोर्ट ने बताया कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ पहले से ही सतर्कता जांच चल रही है।

अक्टूबर 2024 में मिली थी जांच की अनुमति

अक्टूबर 2024 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ जांच की अनुमति दे दी थी। साथ ही अधिकारी को जांच में सहयोग करने का निर्देश दिया गया था।

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद न्यायिक प्रशासन में जवाबदेही और गंभीर आरोपों का सामना कर रहे अधिकारियों को महत्वपूर्ण न्यायिक जिम्मेदारियां सौंपने के मुद्दे पर चर्चा का विषय बन गया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट प्रशासन से जवाब मांगा है। अब 11 दिसंबर को होने वाली सुनवाई में इस मामले से जुड़े प्रशासनिक और कानूनी पहलुओं पर आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

नोट: संबंधित न्यायिक अधिकारी के खिलाफ लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हुए हैं। मामले में अंतिम निर्णय अदालत द्वारा किया जाना है।

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