नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) से जुड़ा एक प्रशासनिक मामला इन दिनों चर्चा में है। दूरस्थ एवं ऑनलाइन शिक्षा केंद्र (सीडीओई) में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत डॉ. सरिपल्ली वी. रविकिरण की सेवाएं समाप्त किए जाने का मामला सामने आया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन ने यह कार्रवाई उनकी प्रोबेशन अवधि के दौरान कार्य प्रदर्शन और आचरण को लेकर जताए गए असंतोष के आधार पर की है।
इस मामले ने विश्वविद्यालय के शिक्षकों की नियुक्ति, प्रोबेशन अवधि, कार्य मूल्यांकन और सेवा समाप्ति की प्रक्रिया को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं, शिक्षक संगठनों की ओर से निष्पक्ष जांच और संबंधित शिक्षक को उचित अवसर दिए जाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया जा रहा है।
इस मामले की जड़ राजनीति विज्ञान विभाग के बीए पाठ्यक्रम के लिए तैयार की गई अध्ययन सामग्री से जुड़ी बताई जा रही है। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, डॉ. रविकिरण द्वारा तैयार की गई स्व-अध्ययन सामग्री (Self Learning Material) में डॉ. भीमराव आंबेडकर, महिलाओं, जाति व्यवस्था और आतंकवाद जैसे संवेदनशील विषयों के संदर्भ में इस्तेमाल की गई भाषा और तथ्यों को लेकर आपत्तियां उठाई गई थीं।
कुछ शिक्षकों और संबंधित पक्षों ने आरोप लगाया कि अध्ययन सामग्री में महिलाओं के संबंध में आपत्तिजनक और नकारात्मक टिप्पणियां थीं। इसी तरह डॉ. आंबेडकर के संदर्भ में इस्तेमाल किए गए शब्दों और विचारों की प्रस्तुति पर भी सवाल उठाए गए। इन आपत्तियों के बाद विश्वविद्यालय स्तर पर सामग्री की समीक्षा कराई गई और मामले को प्रशासनिक जांच के दायरे में लाया गया।
विश्वविद्यालय से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, अध्ययन सामग्री में कथित तथ्यात्मक त्रुटियों, पाठ्यक्रम से बाहर की विषयवस्तु और अकादमिक मानकों से जुड़े सवाल भी जांच का हिस्सा बने। हालांकि, इन आरोपों को अंतिम रूप से समझने के लिए जांच रिपोर्ट, संबंधित अध्ययन सामग्री और शिक्षक का पक्ष भी महत्वपूर्ण है।
मीडिया में सामने आई जानकारी के मुताबिक, डॉ. रविकिरण की नियुक्ति प्रक्रिया मई 2023 में जारी विज्ञापन के तहत हुई थी और उन्होंने 29 फरवरी 2024 को कार्यभार संभाला था। नियुक्ति के बाद उन्हें निर्धारित नियमों के अनुसार प्रोबेशन अवधि में रखा गया।
प्रशासन ने 7 फरवरी 2025 को उनकी प्रोबेशन अवधि एक वर्ष के लिए बढ़ा दी थी। इस अवधि का उद्देश्य उनके कामकाज और आचरण का मूल्यांकन करना तथा आवश्यक सुधार के लिए अवसर देना बताया गया। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि विस्तारित प्रोबेशन अवधि में भी उनके कार्य प्रदर्शन में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दिया।
आदेश में कथित तौर पर यह भी उल्लेख किया गया कि शिक्षक को समय-समय पर उनके काम में पाई गई कमियों के बारे में जानकारी दी गई थी। अपना पक्ष रखने के लिए व्यक्तिगत सुनवाई और लिखित जवाब देने के अवसर भी उपलब्ध कराए गए थे।
इसके बावजूद प्रशासन संतुष्ट नहीं हुआ। सीडीओई की गवर्निंग बॉडी ने लगातार असंतोषजनक प्रदर्शन का हवाला देते हुए उनकी सेवाएं समाप्त करने की सिफारिश की। इसके बाद विश्वविद्यालय के कुलपति की मंजूरी से 30 अक्टूबर 2026 को सेवा समाप्ति का आदेश जारी किया गया।
सीडीओई की ओर से जारी कार्यालय आदेश के अनुसार, डॉ. सरिपल्ली वी. रविकिरण को राजनीति विज्ञान विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद से तत्काल प्रभाव से सेवामुक्त कर दिया गया।
इस आदेश में एक महत्वपूर्ण बात यह भी कही गई है कि सेवा समाप्ति का यह निर्णय उन्हें भविष्य में नौकरी के अवसरों से स्थायी रूप से वंचित नहीं करेगा। वह दिल्ली विश्वविद्यालय, दूसरे कॉलेजों अथवा सरकारी सेवाओं में उपलब्ध पदों के लिए नियमानुसार आवेदन कर सकेंगे।
यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि प्रोबेशन अवधि के दौरान सेवा समाप्ति और किसी कर्मचारी को भविष्य की नियुक्तियों के लिए अयोग्य घोषित करना दो अलग-अलग विषय हैं। विश्वविद्यालय के आदेश में भविष्य में आवेदन करने की संभावना खुली रखी गई है।
इस फैसले के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक संगठनों ने विरोध शुरू कर दिया है। दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (DUTA) ने 3 नवंबर 2026 को एक दिवसीय हड़ताल का आह्वान किया है। संगठन ने अपने बयान में कहा है कि विरोध के तहत सीडीओई और स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग से जुड़ी कक्षाएं बंद रहेंगी।
DUTA की 2 नवंबर को हुई आपात बैठक में इस हड़ताल का निर्णय लिया गया। संगठन ने डॉ. रविकिरण की सेवा समाप्ति को अनुचित बताते हुए आदेश वापस लेने की मांग की है।
DUTA के अध्यक्ष प्रोफेसर वीएस नेगी के अनुसार, शिक्षक की सेवाएं समाप्त करने का फैसला स्वीकार्य नहीं है। संगठन ने इस मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन से बातचीत कर समाधान निकालने की बात भी कही है।
DUTA की कोषाध्यक्ष आकांक्षा खुराना ने बताया कि सेवा समाप्ति का आदेश जारी होने के दिन ही संगठन ने विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र लिखकर आदेश वापस लेने का अनुरोध किया था। हालांकि, उन्हें तत्काल कोई जवाब नहीं मिला। अब संगठन कुलपति से हस्तक्षेप की मांग करने की तैयारी में है।
सेवा समाप्ति के फैसले के विरोध में शिक्षक संगठनों का मुख्य सवाल यह है कि किसी शिक्षक के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करते समय विश्वविद्यालय को निर्धारित नियमों और निष्पक्ष प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करना चाहिए।
शिक्षक संगठनों का मानना है कि किसी भी शैक्षणिक संस्थान में शिक्षक की जवाबदेही तय करना आवश्यक है, लेकिन इसके साथ ही उसे अपनी बात रखने, जांच प्रक्रिया में भाग लेने और लगाए गए आरोपों का जवाब देने का उचित अवसर भी मिलना चाहिए।
इससे पहले अप्रैल 2026 में भी यह मामला अकादमिक जगत में चर्चा का विषय बना था। उस समय डॉ. रविकिरण ने अपनी ओर से जांच प्रक्रिया पर सवाल उठाए थे। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने समिति के पुनर्गठन, अध्ययन सामग्री तैयार करने के लिए सीमित समय और पर्याप्त अकादमिक सहयोग नहीं मिलने जैसी समस्याओं का उल्लेख किया था। उन्होंने आरोपों को स्वीकार नहीं किया था और अपनी कार्यप्रणाली को लेकर स्पष्टीकरण दिया था।
हालांकि, प्रशासन की जांच और शिक्षक की ओर से उठाए गए सवालों के बीच वास्तविक स्थिति समझने के लिए दोनों पक्षों के दस्तावेजों और आधिकारिक प्रतिक्रियाओं का निष्पक्ष मूल्यांकन जरूरी है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू दिल्ली विश्वविद्यालय के दूरस्थ शिक्षा कार्यक्रमों से जुड़े विद्यार्थियों की पढ़ाई है। सीडीओई के माध्यम से बड़ी संख्या में विद्यार्थी घर बैठे उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। इनमें नौकरी करने वाले विद्यार्थी, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा और नियमित कॉलेज में प्रवेश नहीं ले पाने वाले छात्र भी शामिल हैं।
ऐसे में शिक्षक संगठनों की हड़ताल का सीधा असर कक्षाओं और शैक्षणिक गतिविधियों पर पड़ सकता है। यदि विरोध लंबा खिंचता है तो विद्यार्थियों को ऑनलाइन कक्षाओं, अध्ययन सामग्री, शैक्षणिक मार्गदर्शन और अन्य सुविधाओं से संबंधित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।
विश्वविद्यालय प्रशासन के सामने अब यह चुनौती होगी कि शिक्षक संगठनों के विरोध के बीच विद्यार्थियों की पढ़ाई प्रभावित न हो। साथ ही, प्रशासन को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि विवाद का समाधान संवाद और निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से निकाला जाए।
दिल्ली विश्वविद्यालय देश के प्रतिष्ठित उच्च शिक्षण संस्थानों में शामिल है। यहां होने वाले प्रशासनिक और अकादमिक फैसलों का प्रभाव केवल विश्वविद्यालय परिसर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देशभर के शिक्षकों और विद्यार्थियों के बीच भी चर्चा का विषय बनता है।
डॉ. रविकिरण का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि इसमें तीन बड़े मुद्दे एक साथ सामने आए हैं। पहला, विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री की गुणवत्ता और अकादमिक जिम्मेदारी। दूसरा, शिक्षकों के कामकाज का मूल्यांकन और प्रोबेशन अवधि के नियम। तीसरा, किसी शिक्षक के खिलाफ सेवा समाप्ति जैसी कार्रवाई में निष्पक्षता और पारदर्शिता।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, विश्वविद्यालयों में तैयार की जाने वाली अध्ययन सामग्री में तथ्यात्मक शुद्धता, संतुलित भाषा और निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप विषयवस्तु का होना जरूरी है। खासकर राजनीति विज्ञान, सामाजिक न्याय, जाति व्यवस्था, महिला अधिकार और संविधान जैसे विषयों पर सामग्री तैयार करते समय अकादमिक जिम्मेदारी और संवेदनशीलता का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
दूसरी ओर, शिक्षक संगठनों की यह मांग भी महत्वपूर्ण है कि किसी भी कार्रवाई में नियमों का पालन हो और शिक्षक को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिले।
3 नवंबर की हड़ताल के बाद अब सबकी नजरें दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन और DUTA के बीच होने वाली बातचीत पर टिकी हैं। शिक्षक संगठन सेवा समाप्ति का आदेश वापस लेने की मांग कर रहा है, जबकि प्रशासन की ओर से जारी आदेश में विस्तारित प्रोबेशन अवधि के दौरान असंतोषजनक प्रदर्शन को कार्रवाई का आधार बताया गया है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन अपने फैसले पर पुनर्विचार करता है या नहीं। क्या शिक्षक संगठन और विश्वविद्यालय के बीच बातचीत से कोई समाधान निकलता है? क्या सेवा समाप्ति के आदेश को वापस लेने या उसकी समीक्षा की मांग पर विचार किया जाएगा? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में स्पष्ट हो सकते हैं।
फिलहाल यह मामला दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षक अधिकारों, अकादमिक जवाबदेही और प्रशासनिक निर्णयों के बीच संतुलन की एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन गया है। विद्यार्थियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस विवाद का समाधान निकालना विश्वविद्यालय प्रशासन और शिक्षक संगठनों दोनों की जिम्मेदारी है।