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पति-पत्नी के झगड़े पर गर्भपात? सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगने वाली एक महिला की याचिका ने विवाह, पारिवारिक विवाद, महिला के प्रजनन अधिकार और अजन्मे बच्चे के हितों को लेकर नई कानूनी बहस छेड़ दी है। मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां करते हुए कहा कि पति-पत्नी के बीच होने […]

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  • November 3, 2026 11:30 am IST, Published 44 minutes ago

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगने वाली एक महिला की याचिका ने विवाह, पारिवारिक विवाद, महिला के प्रजनन अधिकार और अजन्मे बच्चे के हितों को लेकर नई कानूनी बहस छेड़ दी है। मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणियां करते हुए कहा कि पति-पत्नी के बीच होने वाले सामान्य विवाद को गर्भपात का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि वैवाहिक मतभेद के कारण गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जाने लगे तो समाज किस दिशा में जाएगा और गर्भ में पल रहे बच्चे के हितों का क्या होगा?

इस मामले में महिला छह महीने से अधिक समय की गर्भवती है और उसने अपनी गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी है। महिला का आरोप है कि उसके पति और ससुराल पक्ष की ओर से उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया गया। दूसरी ओर, पति ने महिला की याचिका का विरोध करते हुए कहा है कि वह बच्चे को जन्म के बाद अपने पास रखकर उसकी देखभाल करने के लिए तैयार है।

छह महीने से अधिक की गर्भावस्था को लेकर विवाद

मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ कर रही है। महिला ने अदालत को बताया कि वह अब इस गर्भावस्था को जारी नहीं रखना चाहती और अपने पति से तलाक भी लेना चाहती है।

महिला की याचिका का विरोध करते हुए पति की ओर से कहा गया कि गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य और उसके पालन-पोषण को लेकर उसकी भी जिम्मेदारी है। पति ने अदालत के सामने बच्चे को जन्म के बाद अपने साथ रखने और उसकी देखभाल करने की इच्छा जाहिर की।

इस मामले में अदालत के सामने एक ओर महिला की इच्छा और उसकी परिस्थितियां हैं, वहीं दूसरी ओर गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य तथा पिता की जिम्मेदारी का प्रश्न भी है। इसी वजह से यह मामला सामान्य गर्भपात याचिकाओं से अलग कानूनी और सामाजिक महत्व रखता है।

सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद पर उठाए सवाल

सुनवाई के दौरान पीठ ने टिप्पणी की कि पति-पत्नी के बीच मतभेद और झगड़े होना असामान्य बात नहीं है। वैवाहिक जीवन में कई बार दोनों पक्षों के बीच विवाद हो सकते हैं, लेकिन केवल इसी आधार पर गर्भावस्था समाप्त करने का निर्णय उचित नहीं माना जा सकता।

अदालत ने सवाल उठाया कि यदि किसी महिला का अपने पति या ससुराल वालों से विवाद हो जाए और वह इसी वजह से गर्भपात की अनुमति मांगने लगे तो समाज पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?

पीठ ने यह भी कहा कि मौजूदा मामला बलात्कार, यौन उत्पीड़न अथवा गर्भस्थ शिशु में किसी चिकित्सकीय समस्या से संबंधित नहीं है। इसलिए इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को अलग तरीके से समझने की आवश्यकता है।

अदालत की इन टिप्पणियों ने एक बार फिर इस सवाल को चर्चा में ला दिया है कि गर्भपात के मामलों में महिला की व्यक्तिगत इच्छा, उसकी मानसिक स्थिति और गर्भस्थ शिशु के हितों के बीच कानूनी संतुलन किस तरह बनाया जाना चाहिए।

पति को भी बच्चे की जिम्मेदारी निभाने की बात

सुनवाई के दौरान अदालत ने पति की भूमिका पर भी ध्यान दिया। पीठ ने कहा कि गर्भ में पल रहे बच्चे के भविष्य को लेकर पिता की जिम्मेदारी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

अदालत ने पति से यह भी अपेक्षा जताई कि वह पत्नी के साथ अपने संबंधों को सुधारने की दिशा में कदम उठाए। पति-पत्नी के बीच विवाद की वजह से यदि परिवार टूटने की स्थिति पैदा हो गई है तो दोनों पक्षों को बातचीत और समझौते की संभावना पर विचार करना चाहिए।

मामले में पति द्वारा पत्नी के चरित्र को लेकर लगाए गए आरोप भी विवाद का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बताए गए। इस पर अदालत ने पति से पहले हलफनामा दाखिल कर अपने आरोप वापस लेने की दिशा में कदम उठाने को कहा। अदालत की कोशिश थी कि दोनों के बीच संवाद और आपसी विश्वास बहाल करने की संभावना पर विचार किया जाए।

हालांकि, किसी भी प्रकार के समझौते या सुलह के लिए महिला पर दबाव डालना उचित नहीं होगा। अदालत के सामने यह सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है कि महिला की सुरक्षा, सम्मान और मानसिक स्थिति को पूरा महत्व मिले।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी कानून क्या कहता है?

भारत में गर्भपात से संबंधित कानूनी व्यवस्था मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) अधिनियम, 1971 और 2021 में किए गए संशोधनों के तहत संचालित होती है।

इस कानून के अनुसार निर्धारित परिस्थितियों में गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है। सामान्य तौर पर 20 सप्ताह तक एक पंजीकृत चिकित्सक की राय और 20 से 24 सप्ताह के बीच निर्धारित श्रेणियों में आने वाली महिलाओं के लिए दो पंजीकृत चिकित्सकों की राय आवश्यक होती है।

24 सप्ताह के बाद गर्भावस्था समाप्त करने के लिए कानून में विशेष परिस्थितियों का प्रावधान है। इनमें गर्भस्थ शिशु में गंभीर चिकित्सकीय असामान्यता और महिला की जान बचाने के लिए आवश्यक चिकित्सकीय हस्तक्षेप जैसी स्थितियां शामिल हैं।

ऐसे मामलों में मेडिकल बोर्ड की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए छह महीने से अधिक की गर्भावस्था में गर्भपात की अनुमति का प्रश्न केवल पति-पत्नी के आपसी विवाद से तय नहीं होता, बल्कि संबंधित कानूनी प्रावधानों, चिकित्सकीय परिस्थितियों और अदालत के विचार पर निर्भर करता है।

महिला की प्रजनन स्वतंत्रता भी संविधान का महत्वपूर्ण अधिकार

इस मामले में एक महत्वपूर्ण पहलू महिला की प्रजनन स्वतंत्रता का भी है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि किसी महिला की शारीरिक स्वायत्तता और प्रजनन संबंधी निर्णय उसके व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े हैं।

साल 2022 में एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, हेल्थ एंड फैमिली वेलफेयर डिपार्टमेंट मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अविवाहित महिलाओं को भी गर्भपात कानून के दायरे में समान रूप से अधिकार प्राप्त हो सकते हैं। अदालत ने प्रजनन संबंधी निर्णय को महिला की गरिमा, स्वतंत्रता और संविधान के अनुच्छेद 21 से जोड़कर देखा था।

इसी तरह वर्ष 2024 के ए (मदर ऑफ एक्स) बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में अदालत ने गर्भवती नाबालिग की इच्छा, मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वायत्तता को महत्वपूर्ण माना था।

इन फैसलों से स्पष्ट होता है कि गर्भपात से जुड़े मामलों में महिला की इच्छा और परिस्थितियों की अनदेखी नहीं की जा सकती। हालांकि, प्रत्येक मामले का निर्णय उसके विशिष्ट तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर किया जाता है।

क्या सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया है अंतिम फैसला?

इस पूरे मामले में एक बात समझना बेहद जरूरी है कि सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों की टिप्पणियों को अंतिम न्यायिक फैसला नहीं माना जा सकता। फिलहाल सामने आई जानकारी के अनुसार अदालत ने पति-पत्नी के बीच सुलह की संभावना तलाशने और पति को अपने आरोपों पर हलफनामा दाखिल करने के लिए कहा है।

मामले की अगली सुनवाई बुधवार को निर्धारित की गई है। ऐसे में अंतिम निर्णय आने से पहले यह कहना उचित नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट ने महिला की गर्भपात याचिका पूरी तरह खारिज कर दी है या इस विषय पर कोई नया बाध्यकारी कानूनी सिद्धांत स्थापित कर दिया है।

महिला के अधिकार और बच्चे का भविष्य बने बहस का केंद्र

यह मामला केवल एक परिवार के विवाद तक सीमित नहीं है। इसके जरिए देश में महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता, विवाह संस्था, पारिवारिक जिम्मेदारी और गर्भस्थ शिशु के भविष्य को लेकर महत्वपूर्ण सवाल सामने आए हैं।

कानूनी विशेषज्ञों के लिए भी यह मामला महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसमें महिला की इच्छा, गर्भावस्था की अवधि, चिकित्सकीय परिस्थितियों और पति की आपत्ति जैसे कई पहलू एक साथ मौजूद हैं।

अदालत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि कानून के अनुरूप निर्णय हो और किसी भी पक्ष के अधिकारों की अनदेखी न हो। महिला को अपनी शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों के आधार पर न्याय मिलना चाहिए, वहीं बच्चे के भविष्य और परिवार की जिम्मेदारी से जुड़े पहलुओं पर भी कानून के दायरे में विचार होना चाहिए।

अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी हैं। आने वाले दिनों में अदालत का रुख इस संवेदनशील मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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