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नासा की 1.5 टन की दूरबीन धरती पर लौटी, कहां हुआ अंत?

अंतरिक्ष में 22 साल तक ब्रह्मांड के रहस्यों पर नजर रखने वाली नासा की विशाल दूरबीन का सफर खत्म, इंडोनेशिया के ऊपर वायुमंडल में दाखिल होते ही जलकर बिखरी।

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Gauravshali Bharat News
  • November 5, 2026 11:46 am IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली। अंतरिक्ष से आने वाली रहस्यमयी घटनाओं और ब्रह्मांड के शक्तिशाली विस्फोटों का अध्ययन करने वाली अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की करीब 1.5 टन वजनी अंतरिक्ष दूरबीन का सफर आखिरकार समाप्त हो गया। लगभग 22 वर्षों तक अंतरिक्ष में वैज्ञानिक अनुसंधान करने वाली नील गेहरल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी (Neil Gehrels Swift Observatory) 4 नवंबर 2026 को पृथ्वी के वायुमंडल में दोबारा प्रवेश कर गई। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और अमेरिकी स्पेस फोर्स की जानकारी के अनुसार, इसका पुनः प्रवेश इंडोनेशिया के उत्तरी सुमात्रा क्षेत्र के ऊपर हुआ। इस घटना के साथ ही अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले एक ऐतिहासिक मिशन का अंत हो गया।

इस अंतरिक्ष दूरबीन का वजन लगभग 3,200 पाउंड यानी करीब 1,452 किलोग्राम था। इसे पृथ्वी पर लौटने से पहले अंतरिक्ष में ही बचाने की कोशिश की गई थी, लेकिन यह प्रयास सफल नहीं हो पाया। नासा के अनुमान के अनुसार, वायुमंडल में प्रवेश के दौरान अंतरिक्ष यान का अधिकांश हिस्सा अत्यधिक गर्मी के कारण जलकर नष्ट हो गया। हालांकि, इसके कुछ भारी और मजबूत हिस्सों के पृथ्वी तक पहुंचने की आशंका भी जताई गई थी।

इंडोनेशिया के ऊपर वायुमंडल में हुआ पुनः प्रवेश

नासा की ओर से जारी जानकारी के मुताबिक, स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी ने 4 नवंबर को भारतीय समय के अनुसार नहीं, बल्कि अमेरिकी पूर्वी समय के मुताबिक सुबह लगभग 7:39 बजे पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश किया। उस समय यह उत्तरी सुमात्रा, इंडोनेशिया के ऊपर से गुजर रही थी। इसकी गति लगभग ध्वनि की गति से 22 गुना अधिक बताई गई।

वायुमंडल में इतनी तेज गति से प्रवेश करने के कारण अंतरिक्ष यान पर अत्यधिक ताप और दबाव पैदा हुआ। ऐसी परिस्थितियों में किसी भी अंतरिक्ष यान के लिए अपने मूल स्वरूप में बने रहना बेहद मुश्किल होता है। नासा ने पहले ही संभावना जताई थी कि इसका अधिकांश हिस्सा वायुमंडल में जल जाएगा, जबकि कुछ घने और मजबूत उपकरणों के टुकड़े नीचे तक पहुंच सकते हैं।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि वायुमंडल में दोबारा प्रवेश करने और जमीन पर मलबा गिरने में अंतर होता है। अभी उपलब्ध आधिकारिक जानकारी से यह पुष्टि नहीं होती कि इसके टुकड़े किसी आबादी वाले इलाके में गिरे या जमीन पर किसी तरह का नुकसान हुआ। इसलिए इसे किसी शहर या देश में मलबा गिरने की घटना के रूप में प्रस्तुत करना सही नहीं होगा। Reuters +2

क्या थी नासा की स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी?

नील गेहरल्स स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी नासा का एक अत्याधुनिक अंतरिक्ष मिशन था, जिसे ब्रह्मांड में होने वाली सबसे शक्तिशाली घटनाओं का अध्ययन करने के लिए तैयार किया गया था। इसे 20 नवंबर 2004 को अंतरिक्ष में भेजा गया था। शुरुआत में इस मिशन को केवल दो वर्षों तक संचालित करने की योजना बनाई गई थी, लेकिन इसने अपनी निर्धारित अवधि से कहीं अधिक समय तक काम किया।

इसका नाम बाद में प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक नील गेहरल्स के सम्मान में रखा गया। यह मिशन मुख्य रूप से गामा-रे बर्स्ट यानी गामा किरणों के विस्फोटों का अध्ययन करने के लिए बनाया गया था। गामा-रे बर्स्ट ब्रह्मांड में होने वाली अत्यंत शक्तिशाली और कम समय तक रहने वाली घटनाएं हैं। इनके दौरान बहुत अधिक ऊर्जा निकलती है और वैज्ञानिकों को ब्रह्मांड की उत्पत्ति, तारों के जीवन तथा आकाशगंगाओं से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां मिल सकती हैं।

स्विफ्ट की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह अंतरिक्ष में किसी शक्तिशाली विस्फोट का संकेत मिलते ही तेजी से अपनी दिशा बदल सकती थी। इसके बाद यह अपने उपकरणों की मदद से उस घटना का अलग-अलग तरंगदैर्ध्य पर अध्ययन करती थी। इसकी ओर से मिलने वाले अलर्ट के आधार पर दुनिया की दूसरी अंतरिक्ष वेधशालाएं और दूरबीनें भी उस क्षेत्र का निरीक्षण कर सकती थीं।

तीन आधुनिक उपकरणों से करती थी ब्रह्मांड की निगरानी

स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी में तीन प्रमुख वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए थे। इनमें बैटरी एक्स-रे टेलीस्कोप, अल्ट्रावायलेट/ऑप्टिकल टेलीस्कोप और बर्स्ट अलर्ट टेलीस्कोप शामिल थे।

इन तीनों उपकरणों का काम अलग-अलग था, लेकिन इनका उद्देश्य एक ही था—ब्रह्मांड में होने वाली असाधारण घटनाओं को समझना।

* बर्स्ट अलर्ट टेलीस्कोप: इसका काम गामा-रे विस्फोटों का पता लगाना और उनकी दिशा की जानकारी देना था।

* एक्स-रे टेलीस्कोप: यह विस्फोटों के बाद निकलने वाली एक्स-रे ऊर्जा का अध्ययन करता था।

* अल्ट्रावायलेट और ऑप्टिकल टेलीस्कोप: इसके माध्यम से वैज्ञानिक घटनाओं को पराबैंगनी और दृश्य प्रकाश में देख सकते थे।

इन उपकरणों की मदद से स्विफ्ट ने केवल गामा-रे विस्फोटों तक ही अपना अध्ययन सीमित नहीं रखा, बल्कि सुपरनोवा, ब्लैक होल, तारों में होने वाली गतिविधियों, धूमकेतुओं और अन्य खगोलीय पिंडों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां भी जुटाईं।

आखिर क्यों नीचे आने लगी थी अंतरिक्ष दूरबीन?

स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी का पृथ्वी की ओर लौटना अचानक हुई घटना नहीं थी। पिछले कुछ वर्षों में सूर्य की गतिविधियों में तेजी आने के कारण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में बदलाव हुए। इसका प्रभाव पृथ्वी की निचली कक्षा में चक्कर लगाने वाले उपग्रहों पर भी पड़ा।

सूर्य की बढ़ी हुई गतिविधियों से ऊपरी वायुमंडल का विस्तार हुआ और वहां मौजूद गैसों के कारण उपग्रहों को पहले की तुलना में अधिक वायुमंडलीय घर्षण का सामना करना पड़ा। इस घर्षण की वजह से स्विफ्ट की कक्षा धीरे-धीरे नीचे आने लगी।

अंतरिक्ष में किसी उपग्रह को अपनी कक्षा में बनाए रखने के लिए उसकी ऊंचाई और गति का संतुलन जरूरी होता है। जब वायुमंडलीय घर्षण बढ़ता है तो उपग्रह की कक्षीय ऊर्जा कम होने लगती है। यदि उसे समय रहते ऊपर उठाने की व्यवस्था नहीं की जाए तो वह धीरे-धीरे पृथ्वी के वायुमंडल की ओर बढ़ने लगता है।

नासा के मुताबिक, 20 अक्टूबर 2026 तक स्विफ्ट की ऊंचाई लगभग 275 किलोमीटर रह गई थी। इस स्थिति में वह अपने वैज्ञानिक उपकरणों को स्थिर रखकर लगातार अंतरिक्ष का अध्ययन करने में सक्षम नहीं रह गई थी। इसके बाद मिशन संचालन बंद करने की प्रक्रिया पूरी की गई।

बचाने के लिए चलाया गया अभियान भी नहीं हुआ सफल

नासा ने इस ऐतिहासिक अंतरिक्ष दूरबीन को बचाने के लिए निजी कंपनी कैटलिस्ट स्पेस टेक्नोलॉजीज के साथ मिलकर एक विशेष अभियान की योजना बनाई थी। इसके तहत LINK नामक एक अंतरिक्ष यान को स्विफ्ट के पास भेजकर उसे पकड़ने और ऊंची कक्षा में पहुंचाने की तैयारी की गई थी।

इस योजना का उद्देश्य स्विफ्ट की कक्षीय ऊंचाई बढ़ाकर उसके वैज्ञानिक जीवन को आगे बढ़ाना था। इसके लिए विशेष रोबोटिक तकनीक और अंतरिक्ष में यान की स्थिति को नियंत्रित करने वाली प्रणालियों का इस्तेमाल किया जाना था।

LINK अंतरिक्ष यान को जुलाई 2026 में लॉन्च किया गया था, लेकिन तकनीकी और नियंत्रण संबंधी समस्याओं के कारण यह निर्धारित लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया। अंतरिक्ष यान में दिशा और स्थिति नियंत्रित करने से जुड़ी परेशानियां सामने आईं। परिणामस्वरूप स्विफ्ट को सुरक्षित तरीके से पकड़कर उसकी कक्षा ऊंची करने की योजना सफल नहीं हो सकी।

इस असफल प्रयास के बाद स्विफ्ट की कक्षा लगातार नीचे आती रही और आखिरकार 4 नवंबर को उसका पृथ्वी के वायुमंडल में पुनः प्रवेश हो गया।

क्या पृथ्वी पर रहने वाले लोगों को था खतरा?

करीब 1.5 टन वजन वाली किसी अंतरिक्ष वस्तु के पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश करने की खबर से लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से सुरक्षा को लेकर सवाल उठते हैं। हालांकि, नासा ने पहले ही स्पष्ट किया था कि इस घटना से किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचने की आशंका बहुत कम है।

2 नवंबर को जारी नासा की जानकारी के अनुसार, किसी व्यक्ति को नुकसान पहुंचने का अनुमानित जोखिम लगभग 2,100 में एक था। अंतरिक्ष यान के अधिकांश हिस्से के वायुमंडल में जलकर नष्ट होने की संभावना थी। कुछ भारी हिस्सों के बचने की आशंका जरूर थी, लेकिन उनका वास्तविक स्थान और प्रभाव अलग-अलग परिस्थितियों पर निर्भर करता था।

स्विफ्ट के पुनः प्रवेश के बाद भी उपलब्ध रिपोर्टों में किसी पुष्ट जनहानि या जमीन पर नुकसान की जानकारी सामने नहीं आई। इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल उठाया है कि भविष्य में बड़े और पुराने होते अंतरिक्ष उपग्रहों को सुरक्षित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में वापस लाने के लिए बेहतर तकनीक कितनी जरूरी है।

22 साल की वैज्ञानिक यात्रा छोड़ गई बड़ी विरासत

स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी का अंत भले ही हो गया हो, लेकिन इससे मिले वैज्ञानिक आंकड़े आने वाले वर्षों तक शोधकर्ताओं के लिए उपयोगी रहेंगे। इसने दो साल के निर्धारित मिशन को लगभग 22 वर्षों तक जारी रखकर यह साबित किया कि अंतरिक्ष विज्ञान में लंबे समय तक काम करने वाले मिशन कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इस मिशन ने वैज्ञानिकों को गामा-रे विस्फोटों, ब्लैक होल, सुपरनोवा और तारों की गतिविधियों को समझने में मदद की। इसके अवलोकनों का उपयोग हजारों वैज्ञानिक शोधपत्रों में किया गया है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, स्विफ्ट से जुड़े वैज्ञानिक कार्यों ने लगभग 7,000 शोधपत्रों में योगदान दिया है। Reuters +1

इस घटना का सबसे बड़ा संदेश यह है कि अंतरिक्ष में भेजे गए उपग्रह और वैज्ञानिक उपकरण हमेशा काम नहीं करते रह सकते। उनके संचालन की अवधि समाप्त होने के बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाना भी अंतरिक्ष विज्ञान की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

नासा की स्विफ्ट ऑब्जर्वेटरी अब अंतरिक्ष में सक्रिय नहीं है, लेकिन इसके द्वारा जुटाई गई जानकारियां ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने में वैज्ञानिकों की मदद करती रहेंगी। 22 वर्षों तक अंतरिक्ष में चमकते विस्फोटों की निगरानी करने वाली यह दूरबीन अब इतिहास का हिस्सा बन चुकी है।

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