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SC-ST आरक्षित सीटों के रोटेशन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

नई दिल्ली। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को निश्चित अंतराल पर बदलने यानी रोटेशन लागू करने की मांग को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने इस व्यवस्था को अनिवार्य बनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत […]

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  • November 5, 2026 12:00 pm IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली। अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं में आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को निश्चित अंतराल पर बदलने यानी रोटेशन लागू करने की मांग को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने इस व्यवस्था को अनिवार्य बनाने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों के रोटेशन की व्यवस्था लागू करना विधायी नीति का विषय है और इस संबंध में कानून बनाने या उसमें बदलाव करने का अधिकार संसद के पास है। न्यायपालिका संसद को इस तरह की व्यवस्था लागू करने का निर्देश नहीं दे सकती।

इस मामले की सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ता को सुझाव दिया कि यदि वह आरक्षित सीटों के रोटेशन की व्यवस्था लागू करवाना चाहते हैं तो उन्हें इस मुद्दे को संसद और जनप्रतिनिधियों के सामने उठाना चाहिए। सुनवाई के दौरान सीजेआई की एक टिप्पणी भी चर्चा का विषय बन गई। उन्होंने याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें पेश किए जाने पर कहा कि वह गलत नंबर मिला रहे हैं। अदालत के अनुसार इस विषय पर फैसला लेने का उचित मंच संसद है।

सात दशक से आरक्षित सीट को लेकर उठाया गया सवाल

इस मामले में याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कादीपुर विधानसभा सीट से जुड़े मतदाता जगदीश सिंह की ओर से दाखिल की गई थी। याचिकाकर्ता का कहना था कि कादीपुर विधानसभा क्षेत्र लंबे समय से अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित बना हुआ है। उनका दावा था कि सीट के लगातार आरक्षित रहने से चुनाव लड़ने के अवसर सीमित हो रहे हैं और इसका लाभ व्यापक समुदाय के बजाय कुछ चुनिंदा परिवारों तक सिमट सकता है।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जिस तरह पंचायतों और नगर निकायों में आरक्षित सीटों के आवंटन में रोटेशन की व्यवस्था अपनाई जाती है, उसी तरह लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों में भी समय-समय पर आरक्षित सीटों का बदलाव होना चाहिए।

उनका तर्क था कि लंबे समय तक किसी एक निर्वाचन क्षेत्र को आरक्षित बनाए रखने से वहां के मतदाताओं के सामने उम्मीदवारों के चयन के विकल्प सीमित हो जाते हैं। इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था में समान अवसर और व्यापक राजनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए रोटेशन जरूरी है।

किन संवैधानिक प्रावधानों को दी गई चुनौती?

याचिकाकर्ता ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) को चुनौती दी थी। इस प्रावधान के तहत अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों को राज्य के अलग-अलग हिस्सों में इस प्रकार निर्धारित करने की व्यवस्था है कि जहां तक संभव हो, उन क्षेत्रों को प्राथमिकता मिले जहां कुल आबादी में अनुसूचित जाति की जनसंख्या का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक है।

याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का हवाला देते हुए कहा गया कि लंबे समय तक सीटों को आरक्षित रखने और रोटेशन की अनिवार्य व्यवस्था नहीं होने से समानता तथा लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़े सवाल पैदा होते हैं।

याचिकाकर्ता ने पंचायतों और नगरपालिकाओं में आरक्षण के साथ रोटेशन की व्यवस्था का उदाहरण देते हुए कहा कि विधानसभा और लोकसभा में भी इसी तरह का सिद्धांत अपनाया जाना चाहिए।

हालांकि, अदालत ने इस तर्क को कानून में बदलाव करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं माना।

इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से इनकार

सुप्रीम कोर्ट में यह मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देने के बाद पहुंचा था। हाईकोर्ट ने भी आरक्षित विधानसभा सीटों के अनिवार्य रोटेशन की मांग पर न्यायिक निर्देश देने से इनकार किया था। हाईकोर्ट ने माना था कि आदर्श रूप में सीटों का रोटेशन एक विचारणीय व्यवस्था हो सकती है, लेकिन मौजूदा संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों के तहत अदालत इस तरह का निर्देश जारी नहीं कर सकती। यह निर्णय विधायिका के अधिकार क्षेत्र में आता है।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण से अलग राय रखने का कोई आधार नहीं पाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब संविधान और संबंधित कानून में विधानसभा तथा लोकसभा की आरक्षित सीटों के लिए अनिवार्य रोटेशन का प्रावधान नहीं है, तब न्यायालय अपनी ओर से ऐसी नई व्यवस्था लागू नहीं कर सकता।

सीजेआई सूर्यकांत की टिप्पणी क्यों हुई चर्चा में?

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि वह इस मांग के लिए गलत मंच पर आए हैं। उन्होंने हल्के अंदाज में टिप्पणी की कि यह विरोध और नारेबाजी का दौर है, इसलिए इस मुद्दे को संसद और जनप्रतिनिधियों के माध्यम से उठाया जाना चाहिए।

सीजेआई की इस टिप्पणी के बाद सुनवाई के दौरान कुछ हल्का-फुल्का संवाद भी हुआ। वकील ने स्पष्ट किया कि उनका विरोध-प्रदर्शन करने का कोई इरादा नहीं है। इस पर अदालत ने समझाया कि यदि याचिकाकर्ता चाहते हैं कि कानून में बदलाव हो, तो उन्हें जनप्रतिनिधियों के सामने अपनी बात रखनी चाहिए।

अदालत की इस टिप्पणी का मुख्य संदेश यह था कि न्यायपालिका और विधायिका के अधिकार क्षेत्र अलग-अलग हैं। कानून में नई व्यवस्था जोड़ने का काम संसद का है, जबकि न्यायालय मौजूदा कानून की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करता है।

मतदाताओं की पसंद पर भी अदालत ने रखी अहम बात

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने मतदाताओं के व्यवहार से जुड़े तर्क पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि यह मानकर नहीं चला जा सकता कि किसी निर्वाचन क्षेत्र का बहुसंख्यक समुदाय केवल जाति या धर्म के आधार पर ही मतदान करेगा।

अदालत ने बहुदलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि मतदाता राजनीतिक दलों, उनकी विचारधाराओं और उम्मीदवारों के आधार पर भी अपना निर्णय लेते हैं। इसलिए यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि किसी सीट का आरक्षित रहना अपने आप में मतदाताओं की लोकतांत्रिक पसंद को समाप्त कर देता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के अधिकार और मतदान करने के अधिकार के बीच अंतर है। सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के लिए अनारक्षित निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने का विकल्प उपलब्ध रहता है।

पंचायतों और विधानसभा चुनावों की व्यवस्था अलग

याचिकाकर्ता की ओर से पंचायतों और नगर निकायों में लागू आरक्षण तथा रोटेशन के प्रावधानों का हवाला दिया गया था। इस पर अदालत ने स्पष्ट किया कि स्थानीय निकायों के चुनाव और संसद तथा राज्य विधानसभाओं के चुनावों के लिए संविधान में अलग-अलग व्यवस्थाएं निर्धारित हैं।

संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T के तहत पंचायतों तथा नगरपालिकाओं में आरक्षण और रोटेशन से संबंधित प्रावधान मौजूद हैं। दूसरी ओर, लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान क्रमशः अनुच्छेद 330 और 332 में किया गया है।

अदालत का कहना था कि स्थानीय निकायों के लिए बनाई गई व्यवस्था को बिना विधायी बदलाव के सीधे विधानसभा और लोकसभा चुनावों पर लागू नहीं किया जा सकता। न्यायपालिका संविधान और कानून में अपनी ओर से नई शर्तें नहीं जोड़ सकती।

अब संसद और जनप्रतिनिधियों के सामने उठाना होगा मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता के लिए एक रास्ता खुला रखा है। अदालत ने कहा कि वह इस विषय को अपने क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों, सांसदों और अन्य निर्वाचित प्रतिनिधियों के सामने उठा सकते हैं। यदि इस व्यवस्था में बदलाव की जरूरत महसूस की जाती है तो संसद में इस पर चर्चा और कानून बनाने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।

इस फैसले से स्पष्ट है कि फिलहाल लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की SC-ST आरक्षित सीटों के लिए अनिवार्य रोटेशन लागू करने का कोई नया न्यायिक आदेश नहीं दिया गया है। मौजूदा कानूनी व्यवस्था जारी रहेगी।

यह फैसला देश की चुनावी व्यवस्था, आरक्षण नीति और परिसीमन से जुड़े व्यापक विमर्श के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की क्या भूमिका रहती है, यह देखना अहम होगा।

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