• होम
  • दिल्ली
  • सर हेनरी डुनेंट मानवता के मसीहा थे, विश्व रेड क्रॉस दिवस, 8 मई को उन्हें विशेष रूप से याद किया जाना चाहिए।

सर हेनरी डुनेंट मानवता के मसीहा थे, विश्व रेड क्रॉस दिवस, 8 मई को उन्हें विशेष रूप से याद किया जाना चाहिए।

नई दिल्ली : रेड क्रॉस का उद्देश्य: “सेवा परमो धर्मः” एवं “वसुधैव कुटुम्बकम्“ आज जब विश्व युद्ध, संघर्ष, जलवायु आपदाओं और मानवीय संकटों के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में 8 मई को मनाया जाने वाला विश्व रेडक्रॉस दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि मानवता के प्रति समर्पण का जीवंत संकल्प है। यह दिवस […]

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • May 4, 2026 3:45 pm IST, Published 3 hours ago

नई दिल्ली : रेड क्रॉस का उद्देश्य: “सेवा परमो धर्मः” एवं “वसुधैव कुटुम्बकम् आज जब विश्व युद्ध, संघर्ष, जलवायु आपदाओं और मानवीय संकटों के दौर से गुजर रहा है, ऐसे में 8 मई को मनाया जाने वाला विश्व रेडक्रॉस दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि मानवता के प्रति समर्पण का जीवंत संकल्प है। यह दिवस रेडक्रॉस आंदोलन के प्रणेता, नोबेल शांति पुरस्कार के प्रथम विजेता सर जीन हेनरी डुनांट के जन्मदिवस पर मनाया जाता है, जिन्होंने 19वीं शताब्दी में मानव सेवा को धर्म, जाति और राष्ट्र की सीमाओं से ऊपर उठाकर ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का वैश्विक स्वरूप दिया।

सोल्फेरिनो के युद्धक्षेत्र से जन्मा सेवा का आंदोलन
वर्ष 1859 में उत्तरी इटली के सोल्फेरिनो में फ्रांस और ऑस्ट्रिया के बीच भीषण युद्ध हुआ। स्विस व्यवसायी हेनरी डुनांट संयोगवश वहाँ पहुँचे। युद्ध के बाद करीब 40,000 सैनिक घायल या मृत अवस्था में पड़े थे। न कोई चिकित्सा थी, न पानी, न मरहम-पट्टी। यह दृश्य देखकर डुनांट का हृदय द्रवित हो उठा। उन्होंने स्थानीय ग्रामीणों, विशेषकर महिलाओं को साथ लेकर कहा – “Tutti fratelli” अर्थात् हम सब भाई हैं। घायलों की सेवा में उन्होंने मित्र-शत्रु का भेद नहीं किया। इसी मानवीय करुणा से रेडक्रॉस का बीज अंकुरित हुआ।

अपने अनुभवों को उन्होंने 1862 में “A Memory of Solferino” – सोल्फेरिनो की एक स्मृति पुस्तक में लिखा। इस पुस्तक ने पूरे यूरोप की अंतरात्मा को झकझोर दिया। डुनांट ने दो क्रांतिकारी प्रस्ताव रखे: पहला, हर देश में शांतिकाल में ही स्वयंसेवी राहत समितियाँ बनें। दूसरा, युद्ध में घायलों और चिकित्सा कर्मियों की तटस्थता के लिए अंतर्राष्ट्रीय संधि हो। इन्हीं प्रयासों से 1863 में रेडक्रॉस की अंतर्राष्ट्रीय समिति बनी और 1864 में प्रथम जेनेवा कन्वेंशन पर 12 देशों ने हस्ताक्षर किए। आज 196 देश इसके हस्ताक्षरकर्ता हैं। यही आधुनिक अंतर्राष्ट्रीय मानवीय कानून की नींव है।

रेडक्रॉस के 7 मूल सिद्धांत: भारतीय दर्शन का वैश्विक प्रतिरूप
रेडक्रॉस के सात मूल सिद्धांत – मानवता, निष्पक्षता, तटस्थता, स्वतंत्रता, स्वैच्छिक सेवा, एकता और सार्वभौमिकता – भारत के शाश्वत मूल्यों “सेवा परमो धर्मः” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” से पूर्णतः मेल खाते हैं। युद्ध, दंगे, बाढ़, भूकंप, महामारी या सड़क दुर्घटना – रेडक्रॉस का स्वयंसेवक यह नहीं पूछता कि पीड़ित किस धर्म, जाति या देश का है। उसका एकमात्र धर्म होता है – पीड़ा कम करना, जीवन बचाना।

भारत में रेडक्रॉस: आपदा में जीवन रेखा
भारतीय रेडक्रॉस सोसाइटी की स्थापना 1920 में संसद के अधिनियम द्वारा हुई। भारत के राष्ट्रपति इसके पदेन अध्यक्ष होते हैं। प्रत्येक जिले में जिलाधिकारी की अध्यक्षता में इसकी इकाई कार्यरत है। रक्तदान शिविरों से लेकर प्राकृतिक आपदाओं में राहत, स्वास्थ्य जांच, स्वच्छता अभियान, दिव्यांग सहायता उपकरण वितरण और युवाओं को फर्स्ट-एड व आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण – रेडक्रॉस आज भारत की ‘लाइफ लाइन’ बन चुका है। कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सीजन कंसंट्रेटर, PPE किट और भोजन वितरण में इसकी भूमिका ऐतिहासिक रही।

युवा शक्ति और रेडक्रॉस: अनुभव के आईने से
विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों में यूथ रेडक्रॉस की इकाइयाँ युवाओं में सेवा-संस्कार का बीजारोपण करती हैं। मैं स्वयं अपने महाविद्यालय जीवन में श्री नारायण सिंह महाविद्यालय, मोतिहारी, पूर्वी चंपारण में यूथ रेडक्रॉस का अध्यक्ष रहा। अध्यक्ष के दायित्व का निर्वहन करते हुए हमने कई रक्तदान एवं स्वास्थ्य जांच शिविर आयोजित किए, जिनमें एनएस, एनसीसी और सामान्य विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर रक्तदान किया।

कड़ाके की सर्द रातों में हमारे यूथ क्लब ने रेडक्रॉस के सहयोग से रेलवे स्टेशन और फुटपाथ पर खुले आसमान के नीचे सो रहे निराश्रितों, रिक्शा चालकों एवं कुष्ठ रोगियों के बीच कंबल वितरण किया। एक कंबल केवल ऊन नहीं था, वह किसी के लिए पूरी रात की जिंदगी था। आपदा प्रबंधन पर पटना में मास्टर वालंटियर के रूप में मिला प्रशिक्षण आज भी जीवन में दिशा देता है – कैसे भगदड़ में भीड़ को नियंत्रित करें, कैसे डूबते को बचाएँ, कैसे प्राथमिक उपचार दें। ये कौशल डिग्रियों से बड़े होते हैं, क्योंकि ये किसी की साँसें लौटाते हैं।

आज की सामरिक प्रासंगिकता
आज जब रूस-यूक्रेन, इजरायल-फिलिस्तीन जैसे संघर्षों और जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न बाढ़-सूखे की विभीषिका बढ़ रही है, तब हेनरी डुनांट का संदेश और भी सामरिक हो जाता है। युद्ध रोका न जा सके तो भी घायल को पानी देना, बंदी को मानवीय गरिमा देना – यही जेनेवा कन्वेंशन की आत्मा है। रेडक्रॉस का तटस्थ झंडा आज भी युद्धविराम की सबसे बड़ी गारंटी है।

आह्वान: आइए, रेडक्रॉस परिवार से जुड़ें
रेडक्रॉस कोई सरकारी विभाग नहीं, यह नागरिकों का आंदोलन है। कोई भी भारतीय नागरिक इसकी आजीवन सदस्यता लेकर ‘सेवा परमो धर्मः’ के यज्ञ में अपनी आहुति दे सकता है। एक यूनिट रक्त, एक घंटे का श्रमदान, एक कंबल का दान – छोटा कदम किसी की पूरी दुनिया बदल सकता है।

आइए, इस 8 मई को हम संकल्प लें कि जाति, धर्म, क्षेत्र से ऊपर उठकर हर पीड़ित की मदद करेंगे। क्योंकि जैसा डुनांट ने कहा था – युद्ध के मैदान में भी हम सब भाई हैं। रेडक्रॉस हमें याद दिलाता है कि मानवता ही सबसे बड़ा धर्म है और पूरी पृथ्वी ही हमारा कुटुंब है।

Gauravshali Bharat

डॉ. नन्दकिशोर साह
पूर्व अध्यक्ष, यूथ रेडक्रॉस

Advertisement