तमिलनाडु की सियासत में एक ऐसा मोड़ आया है, जिसने न सिर्फ़ राज्य बल्कि दिल्ली की सत्ता गलियारों में भी हलचल मचा दी है।
कहानी शुरू होती है अचानक लिए गए उस फैसले से, जहाँ कांग्रेस पार्टी ने अपने ही पाँच विधायकों के साथ एक नया दांव खेल दिया और समर्थन दे दिया उभरते चेहरे विजय को। यह सिर्फ़ समर्थन नहीं, बल्कि एक संकेत था… बदलाव का, और शायद बगावत का।
अब तक मजबूत माने जाने वाला डीएमके,कांग्रेस गठबंधन दरकता हुआ दिख रहा है। अंदरखाने की खामोशी अब खुली सियासी कहानी बनती जा रही है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ़ रणनीति है, या रिश्तों का अंत?
दिल्ली की ओर नज़र डालें तो तस्वीर और भी दिलचस्प हो जाती है। डीएमके के पास केंद्र में 22 लोकसभा और 8 राज्यसभा सांसद, कुल 30 की ताकत है। अगर यह ताकत INDIA गठबंधन से अलग होने का फैसला करती है, तो समीकरण पूरी तरह बदल सकते हैं।
यहाँ असली खेल शुरू होता है… क्या डीएमके अपने राज्य हितों को प्राथमिकता देते हुए केंद्र में नई रणनीति बनाएगी? क्या वह समर्थन की नई कीमत तय करेगी?
इस पूरे घटनाक्रम में एक और खिलाड़ी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है वह है एआईएडीएमके। लोकसभा में शून्य और राज्यसभा में मात्र पाँच सांसदों के साथ खड़ी यह पार्टी अब दबाव में है। राजनीति के इस गणित में जब विकल्प 5 और 30 का हो… तो झुकाव किस ओर होगा, यह समझना मुश्किल नहीं।
तमिलनाडु की राजनीति अब सिर्फ़ राज्य तक सीमित नहीं रही है… यह एक ऐसी शतरंज बन चुकी है, जहाँ हर चाल का असर दिल्ली तक जाएगा।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह सिर्फ़ एक चाल थी, या पूरे खेल का रुख बदलने वाली शुरुआत?