प्रवासी भारतीय बने भारत की आर्थिक शक्ति

भारत आज विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। तेज आर्थिक विकास, बढ़ता वैश्विक प्रभाव और विशाल युवा शक्ति भारत को नई ऊँचाइयों तक ले जा रहे हैं। किंतु इस विकास यात्रा के पीछे केवल देश के भीतर होने वाला उत्पादन और व्यापार ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे करोड़ों भारतीयों का योगदान भी […]

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  • May 14, 2026 1:46 pm IST, Published 2 hours ago

भारत आज विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। तेज आर्थिक विकास, बढ़ता वैश्विक प्रभाव और विशाल युवा शक्ति भारत को नई ऊँचाइयों तक ले जा रहे हैं। किंतु इस विकास यात्रा के पीछे केवल देश के भीतर होने वाला उत्पादन और व्यापार ही नहीं, बल्कि विदेशों में बसे करोड़ों भारतीयों का योगदान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रवासी भारतीय हर वर्ष अरबों डॉलर भारत भेजते हैं और बड़ी मात्रा में सोना भी भारत आता है। यही कारण है कि विदेशी मुद्रा, डॉलर बचत और आत्मनिर्भरता जैसे विषय आज राष्ट्रीय आर्थिक चर्चा के केंद्र में हैं।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी समय-समय पर “डॉलर बचाने”, “स्थानीय उत्पाद अपनाने” और “आत्मनिर्भर भारत” पर बल देते रहे हैं। पहली दृष्टि में यह प्रश्न उठता है कि जब विदेशों में बसे भारतीय भारत को इतनी बड़ी मात्रा में डॉलर भेज रहे हैं, तब डॉलर बचाने की आवश्यकता क्यों है? किंतु जब भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना को गहराई से देखा जाए, तब इस कथन का महत्व स्पष्ट हो जाता है।

विश्व बैंक के अनुसार भारत लगातार दुनिया में सबसे अधिक रेमिटेंस प्राप्त करने वाला देश बना हुआ है। वर्ष 2024 में प्रवासी भारतीयों ने लगभग 137-138 अरब डॉलर भारत भेजे। भारतीय मुद्रा में यह लगभग 11-12 लाख करोड़ रुपये के बराबर है। यह राशि कई देशों के वार्षिक बजट से भी अधिक है। संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका, सऊदी अरब, ब्रिटेन और कनाडा जैसे देशों में बसे भारतीय अपने परिवारों की सहायता के लिए नियमित रूप से धन भेजते हैं।

यह धन केवल व्यक्तिगत सहायता नहीं है, यह भारत की अर्थव्यवस्था को स्थिरता देने वाला महत्वपूर्ण स्रोत है। लाखों परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य, मकान निर्माण, खेती और छोटे व्यवसाय इसी धन पर निर्भर हैं। विशेष रूप से केरल, पंजाब, गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में प्रवासी भारतीयों का आर्थिक योगदान अत्यंत प्रभावशाली है।

पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन ने कहा था कि भारत की सबसे बड़ी शक्तियों में उसका वैश्विक भारतीय समुदाय शामिल है, जो कठिन अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में भी भारत के लिए विदेशी मुद्रा का स्थिर स्रोत बना रहता है। वास्तव में कोविड महामारी और वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के समय भी प्रवासी भारतीयों ने रिकॉर्ड मात्रा में धन भारत भेजा।

लेकिन दूसरी ओर भारत की एक बड़ी चुनौती उसका भारी आयात बिल है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर विदेशों पर निर्भर है। पेट्रोलियम, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा उपकरण, खाद्य तेल, सेमीकंडक्टर और सोने के आयात पर हर वर्ष भारी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। भारत जितना निर्यात करता है, उससे अधिक आयात करता है, जिससे व्यापार घाटा उत्पन्न होता है।

सोना इस संदर्भ में विशेष महत्व रखता है। भारतीय समाज में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और बचत का प्रतीक है। विवाह, त्योहार और धार्मिक अवसरों पर सोने की खरीद भारतीय परंपरा का हिस्सा बन चुकी है। अनुमान है कि भारतीय परिवारों और मंदिरों के पास 25,000 से 35,000 टन तक सोना मौजूद है। इसकी कीमत कई ट्रिलियन डॉलर आँकी जाती है। वहीं भारतीय रिजर्व बैंक के पास लगभग 880 टन स्वर्ण भंडार है।

भारत हर वर्ष लगभग 700 से 900 टन तक सोना आयात करता है। केवल 2025-26 में भारत ने लगभग 72 अरब डॉलर मूल्य का सोना आयात किया। यह विदेशी मुद्रा पर बड़ा दबाव डालता है। इसी कारण प्रधानमंत्री मोदी बार-बार यह कहते रहे हैं कि अनावश्यक आयात कम करना और डॉलर बचाना राष्ट्रीय हित में है।

मोदी जी का “वोकल फॉर लोकल” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियान इसी सोच से जुड़ा हुआ है। उनका तर्क है कि यदि भारत अपनी आवश्यक वस्तुएँ स्वयं बनाएगा, तो आयात कम होगा, डॉलर की बचत होगी और रोजगार बढ़ेंगे। मोबाइल निर्माण, रक्षा उत्पादन, इलेक्ट्रॉनिक्स और सौर ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में उल्लेखनीय प्रगति भी की है।

हालाँकि अर्थशास्त्रियों का मत है कि केवल डॉलर बचाने की अपील पर्याप्त नहीं है। अमत्र्य सेन का मानना है कि विदेशी मुद्रा का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य और मानव संसाधन विकास में होना चाहिए। यदि आर्थिक नीतियाँ आम लोगों की जीवन गुणवत्ता सुधारने में सफल नहीं होतीं, तो केवल विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ने से विकास अधूरा रहेगा।

इसी प्रकार अभिजीत बनर्जी ने कहा है कि भारत जैसे विकासशील देशों में सोना गरीब और मध्यम वर्ग के लिए आर्थिक सुरक्षा का माध्यम बन जाता है। इसलिए केवल लोगों को सोना खरीदने से रोकना समाधान नहीं है, बेहतर वित्तीय विकल्प उपलब्ध कराना भी आवश्यक है।

सरकार ने इसी दिशा में सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड, डिजिटल गोल्ड और जनधन जैसी योजनाएँ शुरू कीं, ताकि लोग पारंपरिक सोने के बजाय वित्तीय निवेश की ओर बढ़ें। साथ ही उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआई) योजनाओं के माध्यम से भारत में विनिर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है।

अर्थशास्त्री कौशिक बसु का कहना है कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक आर्थिक शक्ति केवल विदेशी मुद्रा बचाने में नहीं, बल्कि विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी उत्पादन करने में होती है। यदि भारत उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद बनाकर वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाता है तो डॉलर अपने आप देश में आएँगे।

आज भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह अपने विशाल प्रवासी समुदाय की आर्थिक शक्ति, तकनीकी अनुभव और निवेश क्षमता का सही उपयोग करे। विदेशों में बसे भारतीय केवल धन ही नहीं भेजते, बल्कि ज्ञान, तकनीक और वैश्विक संपर्क भी भारत तक पहुँचाते हैं। यदि इन संसाधनों का योजनाबद्ध उपयोग किया जाए, तो भारत आने वाले वर्षों में दुनिया की सबसे शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है।

अंततः यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी का “डॉलर बचाओ” कथन केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था की वास्तविक चुनौतियों और संभावनाओं से जुड़ा हुआ है। प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे गए अरबों डॉलर भारत की आर्थिक रीढ़ को मजबूत करते हैं, लेकिन साथ ही अनावश्यक आयात और विशेषकर सोने पर अत्यधिक निर्भरता विदेशी मुद्रा पर दबाव भी बनाती है। इसलिए भारत के हित में संतुलित नीति यही होगी कि एक ओर विदेशी मुद्रा की बचत हो, दूसरी ओर उत्पादन, निर्यात, शिक्षा और तकनीकी आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिले। यही मार्ग भारत को आर्थिक रूप से सशक्त, आत्मनिर्भर और विश्व नेतृत्व की दिशा में आगे ले जा सकता है।

 

लेखक

डाॅ. चेतन आनंद

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