केरल की राजनीति में इस बार सत्ता परिवर्तन सिर्फ चुनावी जीत की कहानी नहीं थी, बल्कि कांग्रेस के भीतर चली लंबी रणनीतिक लड़ाई का भी नतीजा थी। और इस पूरी कहानी के केंद्र में थे, वी डी सतीशन और के सी वेणुगोपाल।
चुनाव से कई महीने पहले ही यह साफ हो गया था कि अगर कांग्रेस गठबंधन सत्ता में लौटता है, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए सबसे बड़ी लड़ाई पार्टी के अंदर ही होगी। दिल्ली में बैठे के सी वेणुगोपाल ने अपनी रणनीति बहुत पहले से शुरू कर दी थी। उम्मीदवारों की सूची तैयार करने से लेकर अंतिम नामों की छंटनी तक, उनकी भूमिका बेहद अहम रही। पार्टी के भीतर यह धारणा बनाई गई कि जिन उम्मीदवारों को टिकट मिला, उनमें बड़ी संख्या वेणुगोपाल खेमे की पसंद थी। यहीं से चुनाव के बाद एक नैरेटिव तैयार किया गया कि, “ज्यादातर विधायक वेणुगोपाल के साथ हैं।”
दिल्ली दरबार में यह संदेश लगातार पहुंचाया गया कि संगठन पर पकड़, आलाकमान से नजदीकी और विधायकों का समर्थन, तीनों चीजें वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक दावेदार बनाती हैं। कांग्रेस हाईकमान में भी उनके पक्ष में माहौल कमजोर नहीं था। लेकिन राजनीति सिर्फ नंबरों का खेल नहीं होती, जमीन का संदेश भी उतना ही मायने रखता है।
दूसरी तरफ थे वी डी सतीशन। सतीशन ने चुनाव के दौरान खुद को सिर्फ कांग्रेस नेता नहीं, बल्कि पूरे यूडीएफ गठबंधन के चेहरे के रूप में स्थापित किया। वे लगातार सरकार के खिलाफ आक्रामक विपक्षी नेता की भूमिका में दिखे थे। कार्यकर्ताओं, सहयोगी दलों और जमीनी नेताओं के बीच उनकी स्वीकार्यता ज्यादा व्यापक थी। यहीं से कहानी पलटनी शुरू हुई। कांग्रेस नेतृत्व को यह एहसास कराया गया कि अगर वेणुगोपाल को मुख्यमंत्री बनाया गया, तो उसका राजनीतिक संदेश बहुत नकारात्मक जाएगा। वे संसद की राजनीति और दिल्ली संगठन के नेता माने जाते हैं, जबकि केरल की जनता एक जमीनी चेहरे की उम्मीद कर रही थी।
क्या वेणुगोपाल विधानसभा चुनाव जीत पाएंगे?
क्योंकि वे सांसद थे, उन्हें छह महीने के भीतर उपचुनाव लड़ना पड़ता। पार्टी के भीतर कई नेताओं ने साफ संकेत दिया कि वायनाड और दूसरे इलाकों में इसे “दिल्ली का थोपे गए नेता” वाला फैसला माना जा सकता है। राहुल गांधी के प्रभाव वाले इलाकों तक में इसका असर पड़ने की आशंका जताई गई। यानी कांग्रेस के सामने जोखिम बड़ा था | सरकार बनने के तुरंत बाद ही जनता के बीच गलत संदेश जाना।
यहीं सतीशन की सबसे बड़ी ताकत सामने आई। उनके पास सिर्फ कांग्रेस का एक धड़ा नहीं, बल्कि पूरे गठबंधन का भरोसा था। सहयोगी दलों ने भी संकेत दे दिया कि स्थिर सरकार और राजनीतिक संतुलन के लिए सतीशन बेहतर विकल्प होंगे। आखिरकार हाईकमान ने संगठनात्मक शक्ति से ज्यादा राजनीतिक स्वीकार्यता को महत्व दिया। वेणुगोपाल मजबूत दावेदार जरूर रहे, लेकिन अंतिम फैसला सतीशन के पक्ष में गया।
इसी तरह वी डी सतीशन मुख्यमंत्री बने, सिर्फ इसलिए नहीं कि उनके पास संख्या थी, बल्कि इसलिए कि पार्टी को लगा, वे जनता, गठबंधन और संगठन तीनों के बीच सबसे सुरक्षित और स्वीकार्य चेहरा हैं। कांग्रेस के भीतर अब यह माना जा रहा है कि यह फैसला सिर्फ नेतृत्व चयन नहीं, बल्कि भविष्य की राजनीति को ध्यान में रखकर लिया गया कदम था।