नयी दिल्ली: सोमवार को कारोबार की शुरुआत के साथ ही भारतीय मुद्रा बाजार में रुपये पर भारी दबाव देखने को मिला। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। दिन के दौरान रुपया 96.17 प्रति डॉलर तक टूट गया, जबकि कुछ समय के लिए यह 96.18 के स्तर तक भी फिसला। यह गिरावट पिछले बंद भाव के मुकाबले करीब 0.2 प्रतिशत रही। इससे पहले रुपये का ऐतिहासिक निचला स्तर 96.1350 दर्ज किया गया था, जिसे अब पीछे छोड़ दिया गया है।
बाजार के जानकारों का मानना है कि रुपये में लगातार कमजोरी के पीछे कई वैश्विक कारण जिम्मेदार हैं, जिनमें सबसे बड़ा कारण कच्चे तेल की कीमतों में उछाल है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है। ऐसे में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो देश का आयात बिल भी तेजी से बढ़ जाता है।
वर्तमान में कच्चे तेल की कीमतें 111 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं, जिससे भारतीय तेल कंपनियों और आयातकों पर डॉलर की मांग बढ़ गई है। जब बाजार में डॉलर की मांग ज्यादा होती है और आपूर्ति अपेक्षाकृत सीमित रहती है, तो रुपया दबाव में आकर कमजोर होने लगता है।
इसके अलावा वैश्विक आर्थिक परिस्थितियां, विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और आयात-निर्यात संतुलन भी मुद्रा की चाल को प्रभावित करते हैं। रुपये की यह गिरावट केवल वित्तीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और आम लोगों के जीवन पर भी पड़ सकता है।
रुपया कमजोर होने का सबसे पहला असर विदेश में होने वाले खर्चों पर दिखाई देता है। जो छात्र विदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं, उन्हें अब फीस और अन्य खर्चों के लिए पहले से ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे क्योंकि उन्हें डॉलर में भुगतान करना होता है। इसी तरह विदेश यात्रा, मेडिकल ट्रीटमेंट और विदेशी सेवाएं भी महंगी हो जाती हैं।
इसके साथ ही भारत में आयात होने वाले कई उत्पादों की कीमतें भी बढ़ सकती हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स, ऑटोमोबाइल कंपोनेंट्स और अन्य तकनीकी सामान विदेश से आते हैं, जिनकी लागत डॉलर की मजबूती के कारण बढ़ जाती है।
डॉलर महंगा होने का असर लॉजिस्टिक्स और ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट पर भी पड़ता है, जिससे सप्लाई चेन की लागत बढ़ती है। इसका असर धीरे-धीरे रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है और महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है।
कुल मिलाकर, रुपये की यह कमजोरी वैश्विक बाजार के दबाव और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का परिणाम है, जिसका असर आने वाले समय में अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में देखने को मिल सकता है।