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हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: अदालत के आदेशों के अनुपालन में लापरवाही स्वीकार्य नहीं

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद के आचरण पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के निर्देशों के अनुपालन को टालने का प्रयास न्यायिक प्रक्रिया के प्रति उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने मामले से संबंधित दस्तावेज केंद्रीय कार्मिक एवं […]

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  • June 4, 2026 1:28 pm IST, Published 2 hours ago

प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद के आचरण पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि अदालत के निर्देशों के अनुपालन को टालने का प्रयास न्यायिक प्रक्रिया के प्रति उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने मामले से संबंधित दस्तावेज केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को भेजने का निर्देश भी दिया है।

न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकलपीठ ने झांसी निवासी मेघा रैकवार द्वारा दायर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का निस्तारण करते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से पूर्व में यह जानकारी दी गई थी कि एक संबंधित मामले में हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी, लेकिन अब तक उससे जुड़े किसी आदेश, स्थगन या सुनवाई का रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया।

अदालत ने कहा कि केवल विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल करने का हवाला देकर न्यायालय के आदेशों के अनुपालन को रोका नहीं जा सकता। यदि उच्चतम न्यायालय से कोई रोक नहीं मिली है, तो आदेशों का पालन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि घटनाक्रम से ऐसा प्रतीत होता है कि एसएलपी का उल्लेख अनुपालन प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के बजाय उसे टालने के लिए किया गया।

पीठ ने प्रशासनिक जवाबदेही और पुलिस सुधारों की आवश्यकता पर भी बल दिया। अदालत ने सुझाव दिया कि वरिष्ठ अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के लिए स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार किया जाए, ताकि अधीनस्थ स्तर पर होने वाली लापरवाही के लिए जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।

न्यायालय ने जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। इनमें चार्जशीट के संबंधित कॉलम में जांच का विस्तृत विवरण दर्ज करना, अभियोजन अधिकारी द्वारा चार्जशीट की समीक्षा तथा वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों द्वारा नियमित अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत करना शामिल है।

मामला एक नाबालिग लड़की के लापता होने से जुड़ा था। याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि उसकी बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाया गया था। मामले में प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जांच शुरू हुई, लेकिन मुख्य आरोपित की गिरफ्तारी से पहले ही चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी। बाद में पुलिस ने लड़की को सकुशल बरामद कर परिजनों से मिलवाया |अदालत ने इस कार्य के लिए झांसी पुलिस और संबंधित अधिकारियों के प्रयासों की सराहना भी की। साथ ही स्पष्ट किया कि न्यायिक निर्देशों का समयबद्ध पालन और जवाबदेह प्रशासन कानून के शासन की मूल आवश्यकता है।

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