• होम
  • उत्तर प्रदेश
  • यूपी बोर्ड का बड़ा फैसला: 465 निष्क्रिय स्कूलों की मान्यता रद्द, शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने की पहल

यूपी बोर्ड का बड़ा फैसला: 465 निष्क्रिय स्कूलों की मान्यता रद्द, शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही बढ़ाने की पहल

प्रयागराज/लखनऊ। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए प्रदेश के 465 मान्यता प्राप्त विद्यालयों की मान्यता समाप्त कर दी है। यह कार्रवाई उन विद्यालयों के खिलाफ की गई है जहां पिछले दो शैक्षिक सत्रों के […]

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • June 18, 2026 10:30 am IST, Published 2 hours ago

प्रयागराज/लखनऊ। उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद (यूपी बोर्ड) ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, प्रभावी और जवाबदेह बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए प्रदेश के 465 मान्यता प्राप्त विद्यालयों की मान्यता समाप्त कर दी है। यह कार्रवाई उन विद्यालयों के खिलाफ की गई है जहां पिछले दो शैक्षिक सत्रों के दौरान न तो नियमित शैक्षणिक गतिविधियां संचालित हुईं और न ही कोई छात्र बोर्ड परीक्षाओं में शामिल हुआ। बोर्ड के इस फैसले को शिक्षा व्यवस्था में सुधार और फर्जी अथवा निष्क्रिय संस्थानों पर अंकुश लगाने की बड़ी कार्रवाई माना जा रहा है।

  • यूपी बोर्ड का बड़ा एक्शन, 465 निष्क्रिय स्कूलों की मान्यता खत्म
  • दो साल तक परीक्षा में नहीं भेजे छात्र, 465 स्कूलों पर गिरी गाज
  • फर्जी और निष्क्रिय स्कूलों पर यूपी बोर्ड सख्त, 465 की मान्यता रद्द
  • शिक्षा व्यवस्था में सुधार की बड़ी पहल, 465 स्कूलों की मान्यता समाप्त

यूपी बोर्ड सचिव भगवती सिंह द्वारा जारी आदेश के अनुसार, शैक्षिक सत्र 2024-25 और 2025-26 में संबंधित विद्यालयों से एक भी छात्र हाईस्कूल या इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में शामिल नहीं हुआ। इसके अलावा कई विद्यालयों में नियमित रूप से कक्षाओं का संचालन भी नहीं पाया गया। ऐसे में इंटरमीडिएट शिक्षा अधिनियम, 1921 के प्रावधानों के तहत इन विद्यालयों की मान्यता स्वतः समाप्त मानते हुए आवश्यक कार्रवाई की गई है।

बोर्ड अधिकारियों का कहना है कि किसी भी मान्यता प्राप्त विद्यालय के लिए केवल भवन या पंजीकरण पर्याप्त नहीं होता, बल्कि वहां नियमित पढ़ाई, छात्रों की उपस्थिति और परीक्षा में सहभागिता भी अनिवार्य है। यदि कोई संस्थान लगातार वर्षों तक शैक्षणिक गतिविधियों से दूर रहता है, तो उसकी मान्यता बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं रह जाता। इसी आधार पर विस्तृत समीक्षा के बाद 465 विद्यालयों की सूची तैयार की गई और उनकी मान्यता समाप्त करने का निर्णय लिया गया।

शिक्षा विभाग के अनुसार, प्रदेश में कुछ ऐसे विद्यालय भी सामने आए हैं जो वर्षों से निष्क्रिय थे, लेकिन कागजों पर मान्यता प्राप्त संस्थान के रूप में दर्ज थे। ऐसे विद्यालय न केवल शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं, बल्कि कई बार प्रशासनिक और वित्तीय अनियमितताओं की आशंका भी पैदा करते हैं। बोर्ड का मानना है कि इस कार्रवाई से ऐसे संस्थानों पर प्रभावी रोक लगेगी और शिक्षा के क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय केवल मान्यता रद्द करने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शिक्षा व्यवस्था को गुणवत्ता आधारित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण संदेश भी है। इससे उन विद्यालयों को प्रोत्साहन मिलेगा जो नियमों का पालन करते हुए छात्रों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध करा रहे हैं। वहीं, लापरवाही बरतने वाले संस्थानों को यह स्पष्ट संकेत मिलेगा कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में निष्क्रियता और अनियमितता स्वीकार नहीं की जाएगी।

यूपी बोर्ड देश के सबसे बड़े शिक्षा बोर्डों में गिना जाता है। इसके अधीन हजारों विद्यालय और लाखों छात्र जुड़े हुए हैं। ऐसे में बोर्ड द्वारा समय-समय पर विद्यालयों की समीक्षा, निरीक्षण और मान्यता संबंधी कार्रवाई शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी मानी जाती है। हाल के वर्षों में बोर्ड ने परीक्षा व्यवस्था, मूल्यांकन प्रक्रिया और संस्थागत निगरानी को मजबूत करने के लिए कई सुधारात्मक कदम उठाए हैं।

इस कार्रवाई के बाद संबंधित विद्यालय अब यूपी बोर्ड से संबद्ध संस्थान के रूप में कार्य नहीं कर सकेंगे। साथ ही जिला विद्यालय निरीक्षकों और अन्य अधिकारियों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में विद्यालयों की शैक्षणिक गतिविधियों पर नियमित नजर रखें और यह सुनिश्चित करें कि मान्यता प्राप्त संस्थान निर्धारित मानकों का पालन कर रहे हैं।

शिक्षा जगत से जुड़े लोगों का मानना है कि यूपी बोर्ड का यह कदम छात्रों के हितों की रक्षा करने और शिक्षा प्रणाली को अधिक विश्वसनीय बनाने की दिशा में एक सकारात्मक पहल है। इससे प्रदेश में केवल वही विद्यालय सक्रिय रहेंगे जो वास्तव में छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं और उनके भविष्य निर्माण में अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए भविष्य में भी ऐसी कार्रवाइयों के जारी रहने की संभावना जताई जा रही है।

Advertisement