सरकारी शिक्षकों के मामले में हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति और वरिष्ठता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी कर्मचारी का प्रारंभिक पदोन्नति आदेश अनियमितताओं के कारण निरस्त कर दिया जाता है, तो उस आदेश की तिथि के आधार पर भविष्य में वरिष्ठता का दावा नहीं किया जा सकता। अदालत […]

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  • June 30, 2026 1:21 pm IST, Published 2 hours ago

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की पदोन्नति और वरिष्ठता को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी कर्मचारी का प्रारंभिक पदोन्नति आदेश अनियमितताओं के कारण निरस्त कर दिया जाता है, तो उस आदेश की तिथि के आधार पर भविष्य में वरिष्ठता का दावा नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि कानूनी रूप से केवल वैध और प्रभावी पदोन्नति आदेश ही वरिष्ठता का आधार बन सकता है।

यह फैसला सूरजपुर जिले के पांच प्रधानपाठकों द्वारा दायर याचिका पर आया, जिसमें उन्होंने अपनी वरिष्ठता वर्ष 2012 की पहली पदोन्नति की तारीख से निर्धारित किए जाने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने सभी दलीलों पर विचार करने के बाद याचिका को निराधार मानते हुए खारिज कर दिया और राज्य सरकार की कार्रवाई को पूरी तरह वैधानिक ठहराया।

मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता शोभनाथ चौबे, अशोक कुमार उपाध्याय, दिनेश कुमार द्विवेदी, संजय कुमार त्रिपाठी और दिनेश कुमार कौशिक को 7 सितंबर 2012 को शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में प्रधानपाठक पद पर पदोन्नत किया गया था। सभी ने पदभार भी ग्रहण कर लिया था, लेकिन पदोन्नति प्रक्रिया में अनियमितताओं और चयन संबंधी शिकायतों के बाद पूरे मामले की जांच कराई गई।

जांच में प्रक्रिया संबंधी कमियां सामने आने पर जिला प्रशासन ने 21 सितंबर 2012 को वह पदोन्नति आदेश निरस्त कर दिया। इसके बाद चयन प्रक्रिया को दोबारा पूरा किया गया और सभी आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के बाद 19 सितंबर 2013 को संबंधित शिक्षकों को नए आदेश के तहत फिर से पदोन्नत किया गया।

बाद में इन शिक्षकों ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए मांग की कि उनकी वरिष्ठता 2013 के बजाय 2012 की पहली पदोन्नति की तारीख से मानी जाए। उनका कहना था कि समान परिस्थितियों में कुछ अन्य कर्मचारियों को ऐसा लाभ दिया गया है, इसलिए उन्हें भी वही अधिकार मिलना चाहिए।

राज्य सरकार ने इस मांग का विरोध करते हुए अदालत में कहा कि वर्ष 2012 का पदोन्नति आदेश विधिक रूप से अस्तित्व में नहीं है क्योंकि उसे अनियमितताओं के कारण निरस्त किया जा चुका था। इसलिए उसके आधार पर किसी भी प्रकार की वरिष्ठता या सेवा लाभ देना कानून के अनुरूप नहीं होगा।

मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जब मूल पदोन्नति आदेश ही रद्द हो चुका है, तब उसकी तिथि से किसी कर्मचारी को वरिष्ठता का अधिकार नहीं मिल सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि नई और वैध पदोन्नति ही सेवा संबंधी अधिकारों का आधार बनेगी। इसलिए वर्ष 2013 में जारी पदोन्नति आदेश के अनुसार ही वरिष्ठता निर्धारित की जाएगी। न्यायालय ने यह भी माना कि संबंधित अधिकारियों द्वारा शिक्षकों के दावे को अस्वीकार करने का निर्णय पूरी तरह विधिसम्मत था। इसी आधार पर अदालत ने याचिका को खारिज करते हुए राज्य शासन के निर्णय को बरकरार रखा।

 

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