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19 राज्यों के 181 जिलों पर मंडरा रहा भूस्खलन का बड़ा खतरा

नई दिल्ली। देश के पहाड़ी और संवेदनशील इलाकों को लेकर सामने आई भूवैज्ञानिक जानकारी ने चिंता बढ़ा दी है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की राष्ट्रीय भूस्खलन संवेदनशीलता मैपिंग के अनुसार, देश के 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पहाड़ी एवं पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा मौजूद है। करीब 4.3 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र […]

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  • August 15, 2026 12:35 pm IST, Published 3 hours ago

नई दिल्ली। देश के पहाड़ी और संवेदनशील इलाकों को लेकर सामने आई भूवैज्ञानिक जानकारी ने चिंता बढ़ा दी है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) की राष्ट्रीय भूस्खलन संवेदनशीलता मैपिंग के अनुसार, देश के 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पहाड़ी एवं पर्वतीय क्षेत्रों में भूस्खलन का खतरा मौजूद है। करीब 4.3 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की मैपिंग की गई है। इस व्यापक अध्ययन में ऐसे इलाकों को कम, मध्यम और उच्च संवेदनशीलता वाले क्षेत्रों में वर्गीकृत किया गया है।

खास बात यह है कि अत्यधिक संवेदनशील क्षेत्र देश के करीब 181 जिलों के हिस्सों में फैले हुए बताए गए हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि इन जिलों का पूरा क्षेत्र भूस्खलन की चपेट में है, बल्कि इन जिलों के कुछ हिस्सों में भू-स्खलन शुरू होने की संवेदनशीलता अधिक है। यही वजह है कि पहाड़ों पर सड़क, भवन, पर्यटन और अन्य निर्माण गतिविधियों को लेकर विशेषज्ञों की चिंता लगातार बढ़ रही है।

4.3 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की हुई मैपिंग

GSI ने National Landslide Susceptibility Mapping (NLSM) के तहत 1:50,000 पैमाने पर देश के भूस्खलन संभावित पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों का व्यापक अध्ययन किया है। इसमें हिमालयी क्षेत्र, पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियां और पश्चिमी घाट के बड़े हिस्से शामिल हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, मैपिंग का कुल क्षेत्र करीब 4.3 लाख वर्ग किलोमीटर है।

इस मैपिंग का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं है कि कहां भूस्खलन हो सकता है, बल्कि इसका इस्तेमाल क्षेत्रीय भूमि उपयोग की योजना, निर्माण गतिविधियों, आपदा प्रबंधन और संवेदनशील ढलानों की निगरानी के लिए भी किया जा सकता है।

GSI के अनुसार संवेदनशीलता को तीन प्रमुख श्रेणियों—Low, Moderate और High—में बांटा गया है। उपलब्ध सरकारी आंकड़ों में करीब 63 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को उच्च संवेदनशीलता वाली श्रेणी में रखा गया है, जो मैप किए गए क्षेत्र का लगभग 15 प्रतिशत है।

किन इलाकों में सबसे ज्यादा चिंता?

भूस्खलन का खतरा मुख्य रूप से हिमालय, पूर्वोत्तर की पहाड़ियों और पश्चिमी घाट के क्षेत्रों में देखा जाता है। सरकारी मैपिंग में अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, उत्तराखंड, सिक्किम, पश्चिम बंगाल के पहाड़ी क्षेत्र, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और केरल जैसे क्षेत्रों में उच्च संवेदनशीलता वाले हिस्से दर्ज किए गए हैं।

उदाहरण के तौर पर सरकारी आंकड़ों के मुताबिक अरुणाचल प्रदेश में मैप किए गए क्षेत्र का करीब 15 प्रतिशत हिस्सा उच्च संवेदनशीलता श्रेणी में है। हिमाचल प्रदेश में यह अनुपात करीब 29 प्रतिशत, लद्दाख में 21 प्रतिशत, नागालैंड में 21 प्रतिशत, सिक्किम में 18 प्रतिशत और उत्तराखंड में 22 प्रतिशत बताया गया है।

इसका सीधा अर्थ यह है कि पहाड़ी ढलानों पर किसी भी नई परियोजना की योजना बनाते समय स्थानीय भूगर्भीय परिस्थितियों को नजरअंदाज करना जोखिम बढ़ा सकता है।

अंधाधुंध निर्माण क्यों बढ़ा सकता है खतरा?

भूस्खलन केवल प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है। भारी बारिश, कमजोर चट्टानें, ढलान की संरचना और भूगर्भीय परिस्थितियां इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण के दौरान पहाड़ों की कटाई, ढलानों को असुरक्षित तरीके से काटना, जल निकासी व्यवस्था बाधित होना और अनियोजित निर्माण भी जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

सरकारी अध्ययन में भी यह सामने आया है कि असामान्य या अत्यधिक बारिश भूस्खलन का प्रमुख ट्रिगर हो सकती है। इसके साथ भू-आकृति, ढलान, मिट्टी एवं चट्टान की प्रकृति, भूमि उपयोग और भूमि आवरण जैसी परिस्थितियां भी भूमिका निभाती हैं। कई मामलों में असुरक्षित slope cutting और drainage blockage जैसी मानवीय गतिविधियां भी समस्या को बढ़ाती हैं।

यही वजह है कि पहाड़ी क्षेत्रों में विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी हो जाता है। सड़क, होटल, घर, सुरंग या अन्य बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में भूवैज्ञानिक जोखिम का आकलन पहले से किया जाना जरूरी है।

91 हजार से ज्यादा ऐतिहासिक भूस्खलनों का रिकॉर्ड

GSI ने केवल संवेदनशील क्षेत्रों की मैपिंग ही नहीं की है, बल्कि देश में हुए पुराने भूस्खलनों की जानकारी भी एकत्र की है। अगस्त 2025 में सरकार द्वारा संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, GSI ने रिमोट सेंसिंग और फील्ड आधारित स्रोतों से करीब 91,000 ऐतिहासिक भूस्खलनों की जानकारी जुटाई थी। इनमें से हजारों मामलों का फील्ड स्तर पर सत्यापन भी किया गया है।

यह डेटाबेस भविष्य में भूस्खलन की संभावना वाले इलाकों को समझने और आपदा प्रबंधन की रणनीति तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

अब समय पर चेतावनी देने की तैयारी

भूस्खलन के जोखिम को देखते हुए सरकार और GSI केवल मैपिंग तक सीमित नहीं हैं। बारिश आधारित भूस्खलन की संभावना का पूर्वानुमान लगाने के लिए Regional Landslide Forecasting System विकसित किया जा रहा है। इसमें बारिश के संभावित पैटर्न, Numerical Weather Prediction मॉडल और वास्तविक वर्षा के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके लिए GSI ने IMD, NCMRWF, ISRO के National Remote Sensing Centre और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के साथ सहयोग किया है।

कुछ जिलों में भूस्खलन पूर्वानुमान प्रणाली का परीक्षण और संचालन भी शुरू किया जा चुका है। 2025 में पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग और कलिम्पोंग तथा तमिलनाडु के नीलगिरी में परिचालन स्तर पर पूर्वानुमान जारी किए जाने की जानकारी सरकार ने दी थी।

विकास जरूरी, लेकिन पहाड़ों की कीमत पर नहीं

भूस्खलन की संवेदनशीलता से जुड़ी यह जानकारी पहाड़ी राज्यों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी के तौर पर देखी जा सकती है। पहाड़ों में सड़क और अन्य बुनियादी सुविधाओं का विकास जरूरी है, लेकिन निर्माण की गति से ज्यादा महत्वपूर्ण उसकी वैज्ञानिक योजना है।

विशेषज्ञों के लिए चुनौती यह है कि संवेदनशील ढलानों की पहचान के बाद वहां निर्माण मानकों को प्रभावी तरीके से लागू किया जाए। बारिश के दौरान संवेदनशील क्षेत्रों की निगरानी बढ़ाई जाए, प्राकृतिक जल निकासी के रास्ते बाधित न हों और जहां जरूरी हो वहां slope stabilization जैसे उपाय किए जाएं।

दरअसल, 181 जिलों का आंकड़ा डराने के लिए नहीं बल्कि सावधान करने के लिए है। इसका संदेश साफ है—पहाड़ों पर विकास हो, लेकिन भूगर्भीय क्षमता और प्राकृतिक संतुलन को ध्यान में रखकर। समय रहते वैज्ञानिक मैपिंग, स्थानीय चेतावनी प्रणाली और सुरक्षित निर्माण मानकों को अपनाया जाए तो भूस्खलन से होने वाले जान-माल के नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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