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NCR में बच्चों में अस्थमा का बड़ा खतरा! ICCT रिपोर्ट ने चौंकाया

नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन का असर अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बच्चों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (ICCT) की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश की […]

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  • July 30, 2026 10:52 pm IST, Published 55 minutes ago

नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में वायु प्रदूषण और वाहनों से होने वाले उत्सर्जन का असर अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह बच्चों के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। इंटरनेशनल काउंसिल ऑन क्लीन ट्रांसपोर्टेशन (ICCT) की नई रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि देश की कुल आबादी का केवल लगभग 5 प्रतिशत हिस्सा एनसीआर में रहता है, लेकिन पूरे भारत में वाहनों से होने वाले प्रदूषण के कारण बच्चों में सामने आने वाले अस्थमा के लगभग 23 प्रतिशत नए मामले इसी क्षेत्र से जुड़े हैं। रिपोर्ट के अनुसार हर वर्ष लगभग 3,500 नए बाल अस्थमा के मामले केवल एनसीआर में दर्ज किए जा रहे हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते वाहनों से होने वाले उत्सर्जन पर प्रभावी नियंत्रण नहीं किया गया, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और भी गंभीर रूप ले सकती है। रिपोर्ट में वाहनों से निकलने वाले प्रदूषकों को बच्चों, बुजुर्गों और पहले से श्वसन संबंधी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया गया है।

2024 में हजारों असमय मौतों का कारण बना वाहन प्रदूषण

ICCT की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2024 में एनसीआर में वाहन उत्सर्जन के कारण लगभग 8,100 लोगों की असमय मृत्यु हुई। यह देशभर में वाहन प्रदूषण से हुई कुल मौतों का लगभग 9 प्रतिशत है। अकेले दिल्ली में वर्ष 2024 के दौरान वाहनों के धुएं से 2,800 असमय मौतें दर्ज की गईं। इसी अवधि में बच्चों में अस्थमा के करीब 1,500 नए मामले सामने आए।

रिपोर्ट के अनुसार वायु प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव बच्चों के फेफड़ों के विकास पर पड़ता है। छोटे बच्चों की प्रतिरोधक क्षमता अपेक्षाकृत कम होने के कारण वे प्रदूषित हवा से जल्दी प्रभावित होते हैं। यही वजह है कि एनसीआर जैसे अत्यधिक प्रदूषित क्षेत्रों में बाल अस्थमा के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।

एनसीआर क्यों बना बाल अस्थमा का हॉटस्पॉट?

रिपोर्ट बताती है कि एनसीआर के कई इलाकों में वाहन उत्सर्जन से निकलने वाली नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO₂) और पीएम 2.5 का स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा निर्धारित सुरक्षित सीमा से कई गुना अधिक पाया गया। यही प्रदूषक बच्चों के फेफड़ों और श्वसन तंत्र को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार प्रदूषित हवा में रहने से बच्चों में सांस लेने में तकलीफ, एलर्जी, फेफड़ों की क्षमता में कमी और अस्थमा जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

भारी वाहन सबसे बड़े प्रदूषण स्रोत

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि ट्रक और बस जैसे भारी वाहन प्रदूषण फैलाने में सबसे बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। हालांकि कुल वाहनों में इनकी संख्या कम है, लेकिन इनके उत्सर्जन का प्रभाव अत्यधिक है।

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में वाहन उत्सर्जन से उत्पन्न 79 प्रतिशत नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और 64 प्रतिशत पीएम प्रदूषण का स्रोत भारी मालवाहक और यात्री वाहन रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सार्वजनिक परिवहन को स्वच्छ बनाया जाए और पुराने डीजल वाहनों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जाए, तो प्रदूषण में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

स्वच्छ परिवहन से बच सकती हैं लाखों जानें

ICCT ने अपनी रिपोर्ट में भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण समाधान भी प्रस्तुत किया है। रिपोर्ट के अनुसार यदि भारत वर्ष 2045 तक बिकने वाले सभी नए वाहनों को शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission Vehicles) में बदलने का लक्ष्य हासिल कर लेता है, तो वर्ष 2050 तक लगभग 17 लाख असमय मौतों को रोका जा सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन को स्वच्छ बनाना, चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित करना और स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाना इस दिशा में सबसे प्रभावी कदम होंगे।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने दी चेतावनी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों में बढ़ते अस्थमा के मामलों को केवल चिकित्सा समस्या के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि इसे पर्यावरणीय संकट के रूप में भी समझना होगा। प्रदूषित हवा का असर बच्चों के शारीरिक विकास, शिक्षा और जीवन की गुणवत्ता पर भी पड़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार अभिभावकों को अत्यधिक प्रदूषण वाले दिनों में बच्चों की बाहरी गतिविधियां सीमित करनी चाहिए, घरों में स्वच्छ हवा बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए और किसी भी प्रकार की सांस संबंधी समस्या दिखाई देने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

सरकार और समाज की साझा जिम्मेदारी

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि केवल सरकारी नीतियां ही इस समस्या का समाधान नहीं कर सकतीं। आम नागरिकों को भी निजी वाहनों का कम उपयोग, सार्वजनिक परिवहन को अपनाने, कार पूलिंग, साइकिल और पैदल चलने जैसी आदतों को बढ़ावा देना होगा। इसके साथ ही शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना और स्वच्छ ऊर्जा आधारित परिवहन प्रणाली विकसित करना भी आवश्यक है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अभी प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में बच्चों में अस्थमा और अन्य श्वसन रोगों का बोझ तेजी से बढ़ सकता है। ICCT की यह रिपोर्ट स्पष्ट संकेत देती है कि स्वच्छ परिवहन केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य और भविष्य से जुड़ा हुआ मुद्दा है।

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