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लाइसेंस का झंझट खत्म! क्या भारत में सेल्फ-ड्राइविंग कारों का रास्ता हो रहा है आसान?

नई दिल्ली। भारत में स्मार्ट और सुरक्षित परिवहन व्यवस्था की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। केंद्र सरकार ने ऑटोमोटिव रडार और कनेक्टेड व्हीकल तकनीकों के लिए लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। इस फैसले को केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि देश में भविष्य की स्मार्ट मोबिलिटी और उन्नत वाहन […]

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Gauravshali Bharat News
  • June 15, 2026 3:00 pm IST, Published 5 hours ago

नई दिल्ली। भारत में स्मार्ट और सुरक्षित परिवहन व्यवस्था की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया गया है। केंद्र सरकार ने ऑटोमोटिव रडार और कनेक्टेड व्हीकल तकनीकों के लिए लाइसेंस लेने की अनिवार्यता समाप्त कर दी है। इस फैसले को केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि देश में भविष्य की स्मार्ट मोबिलिटी और उन्नत वाहन तकनीकों के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे एडवांस्ड ड्राइवर असिस्टेंस सिस्टम (ADAS), कनेक्टेड कार तकनीक और भविष्य में सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों के लिए आवश्यक तकनीकी ढांचे को मजबूती मिलेगी।

सरकार के नए निर्णय के तहत 77GHz से 81GHz फ्रीक्वेंसी बैंड पर संचालित होने वाले ऑटोमोटिव रडार सिस्टम और 5.9GHz बैंड पर आधारित वाहन संचार प्रणालियों को लाइसेंसिंग प्रक्रिया से छूट प्रदान की गई है। ये वही तकनीकें हैं जिनकी मदद से आधुनिक वाहन अपने आसपास के वातावरण को समझते हैं और संभावित खतरों का आकलन कर चालक को समय रहते चेतावनी देते हैं। वर्तमान में दुनिया भर में प्रीमियम और आधुनिक वाहनों में इन तकनीकों का तेजी से उपयोग बढ़ रहा है।

ऑटोमोटिव रडार तकनीक सड़क पर मौजूद अन्य वाहनों, पैदल यात्रियों, अवरोधों और संभावित दुर्घटना की स्थितियों का पता लगाने में सक्षम होती है। इसी तकनीक के आधार पर ऑटोमैटिक इमरजेंसी ब्रेकिंग, एडाप्टिव क्रूज कंट्रोल, लेन-कीपिंग असिस्ट, ब्लाइंड स्पॉट मॉनिटरिंग और टक्कर से बचाव जैसी अत्याधुनिक सुविधाएं कार्य करती हैं। यही तकनीक भविष्य में पूरी तरह स्वचालित या सेल्फ-ड्राइविंग वाहनों की नींव भी मानी जाती है।

इसके साथ ही 5.9GHz बैंड पर आधारित Vehicle-to-Everything (V2X) तकनीक वाहनों को एक-दूसरे, ट्रैफिक सिग्नलों और सड़क किनारे स्थापित स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर से जोड़ती है। इससे वाहन रीयल-टाइम में जानकारी साझा कर सकते हैं, ट्रैफिक प्रबंधन बेहतर हो सकता है और दुर्घटनाओं की संभावना कम की जा सकती है। स्मार्ट सिटी और इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट सिस्टम के विकास में भी यह तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली है।

विशेषज्ञों के अनुसार अब वाहन निर्माताओं को इन तकनीकों के इस्तेमाल के लिए जटिल लाइसेंसिंग प्रक्रियाओं से नहीं गुजरना पड़ेगा। इससे कंपनियों का समय और लागत दोनों बचेंगे। वैश्विक ऑटोमोबाइल कंपनियां भारत के लिए अलग हार्डवेयर विकसित करने के बजाय दुनिया में उपयोग हो रही आधुनिक तकनीकों को सीधे भारतीय बाजार में ला सकेंगी। इसका लाभ अंततः उपभोक्ताओं को अधिक सुरक्षित, स्मार्ट और तकनीकी रूप से उन्नत वाहनों के रूप में मिलेगा।

हालांकि भारत में अभी पूरी तरह सेल्फ-ड्राइविंग कारों को कानूनी मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन विशेषज्ञ इस फैसले को उस दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम मान रहे हैं। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में यह निर्णय भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को नई गति देगा और देश को वैश्विक स्मार्ट मोबिलिटी क्रांति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाने में मदद करेगा।

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