• होम
  • दिल्ली/NCR
  • वैदिक ज्ञान परंपरा और आचार्य परंपरा पर मंथन, राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

वैदिक ज्ञान परंपरा और आचार्य परंपरा पर मंथन, राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

भारतीय शिक्षा परंपरा, वैदिक ज्ञान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के बीच समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय तथा संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान (Samskrit Promotion Foundation) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “वैदिक साहित्य में शिक्षा” विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का शुक्रवार को शुभारंभ हुआ। इस ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, […]

Advertisement
Vedic Literature Education National Webinar
Gauravshali Bharat News
  • July 25, 2026 5:19 pm IST, Published 3 weeks ago

भारतीय शिक्षा परंपरा, वैदिक ज्ञान और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) के बीच समन्वय स्थापित करने के उद्देश्य से दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय तथा संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान (Samskrit Promotion Foundation) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “वैदिक साहित्य में शिक्षा” विषयक द्विदिवसीय राष्ट्रीय वेबिनार का शुक्रवार को शुभारंभ हुआ। इस ऑनलाइन राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर के प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, कुलपतियों, शोधकर्ताओं, संस्कृत विद्वानों और अकादमिक विशेषज्ञों ने भाग लेकर भारतीय शिक्षा परंपरा के दार्शनिक, सामाजिक एवं शैक्षिक आयामों पर व्यापक चर्चा की।

कार्यक्रम का शुभारंभ श्री सुनील कुमार शर्मा द्वारा वैदिक मंगलाचरण से हुआ, जिसने पूरे आयोजन को आध्यात्मिक और गरिमामय वातावरण प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के कार्यपालक अधिकारी श्री लक्ष्मीनरसिम्हन ने किया।

भारतीय शिक्षा की विरासत को आधुनिक व्यवस्था से जोड़ने पर जोर
उद्घाटन सत्र में अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत करते हुए दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. संजीव राय ने कहा कि भारत की समृद्ध शैक्षिक विरासत केवल इतिहास का विषय नहीं है, बल्कि वर्तमान और भविष्य की शिक्षा व्यवस्था के लिए भी प्रेरणास्रोत है। उन्होंने भारतीय शिक्षा के स्थायी सिद्धांतों को आधुनिक शिक्षा प्रणाली में समाहित करने की आवश्यकता पर बल दिया।

विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. अनु सिंह लाठर ने अपने प्रस्तावना वक्तव्य में कहा कि भारतीय शिक्षा के मूलभूत मूल्य आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्राचीन काल में थे। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए भारतीय ज्ञान परंपरा की उपयोगिता को विशेष रूप से रेखांकित किया।

गुरुकुल परंपरा और मूल्य आधारित शिक्षा पर चर्चा
संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के प्रो. चाँद किरण सलूजा ने अपने बीज वक्तव्य में भारतीय शिक्षा के दार्शनिक आधारों की विस्तृत व्याख्या करते हुए गुरुकुल परंपरा की विशेषताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसका उद्देश्य चरित्र निर्माण, व्यक्तित्व विकास और समाजोपयोगी जीवन मूल्यों का विकास भी रहा है।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए जयप्रकाश विश्वविद्यालय, छपरा (बिहार) के पूर्व कुलपति प्रो. हरिकेश सिंह ने कहा कि आधुनिक समाज जिन शैक्षिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनके समाधान भारतीय शिक्षा परंपरा में मौजूद हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा की सांस्कृतिक एवं बौद्धिक निरंतरता बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया।

सत्र का समापन दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के शोध सहायक डॉ. आयुष नन्दन द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

पहले दिन हुए छह शैक्षणिक सत्र
उद्घाटन सत्र के बाद वेबिनार के प्रथम दिवस में वैदिक एवं भारतीय शिक्षा दर्शन के विभिन्न पहलुओं पर आधारित छह विद्वत सत्र आयोजित किए गए।

भारतीय शैक्षिक मनोविज्ञान पर व्याख्यान
पहले सत्र में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नासिक परिसर के निदेशक डॉ. नीलाभ तिवारी ने “भारतीय शैक्षिक मनोविज्ञान” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने भारतीय परंपरा में वर्णित चौदह करणों (अंतःकरण एवं बाह्यकरण) की भूमिका तथा ज्ञानार्जन की प्रक्रिया का विस्तृत विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने बुद्धि, मन, चित्त और अहंकार की ज्ञान प्राप्ति में भूमिका को विशेष रूप से स्पष्ट किया।

शिक्षक की भूमिका पर विशेष जोर
द्वितीय सत्र में केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी ने भारतीय शिक्षा परंपरा में आचार्य की केंद्रीय भूमिका पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि शिक्षक का आचरण, व्यक्तित्व और विद्यार्थियों के साथ उसका भावनात्मक जुड़ाव भी शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। उन्होंने स्वदेशी शिक्षण पद्धतियों के पुनरुत्थान की आवश्यकता पर भी बल दिया।

सामाजिक समरसता में वैदिक शिक्षा की भूमिका
तृतीय सत्र में उत्तराखण्ड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. रमाकान्त पाण्डेय ने वैदिक शिक्षा में विद्यार्थियों के लिए प्रयुक्त विभिन्न संज्ञाओं—अन्तेवासी, छात्र और शिष्य—का उल्लेख करते हुए उनके दार्शनिक महत्व को समझाया। उन्होंने वैदिक शिक्षा को सामाजिक समरसता और समावेशी विकास का आधार बताया।

21वीं सदी में प्राचीन शिक्षा की प्रासंगिकता
चतुर्थ सत्र में महर्षि पाणिनि संस्कृत एवं वैदिक विश्वविद्यालय, उज्जैन के संस्कृत साहित्य विभागाध्यक्ष प्रो. तुलसीदास परौहा ने “इक्कीसवीं शताब्दी में प्राचीन भारतीय शिक्षा” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भी भारतीय शिक्षा के पारंपरिक आदर्श मानव जीवन को दिशा देने में सक्षम हैं।

वैदिक साहित्य और विज्ञान का संबंध
पंचम सत्र में डॉ. भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रो. आनन्द वर्धन ने वैदिक साहित्य में निहित वैज्ञानिक अवधारणाओं का विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि वैदिक साहित्य केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं हैं, बल्कि उनमें अनेक वैज्ञानिक दृष्टिकोण और सिद्धांत भी अंतर्निहित हैं।

गुरु-शिष्य संबंध पर अंतिम व्याख्यान
प्रथम दिवस के अंतिम सत्र में विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग (झारखंड) के कुलपति प्रो. सी. बी. शर्मा ने “उपनिषद्कालीन आचार्य का स्वरूप” विषय पर व्याख्यान दिया। उन्होंने उपनिषदों में वर्णित गुरु-शिष्य संबंधों के दार्शनिक और शैक्षिक पक्षों का गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया।
दिनभर चले सभी शैक्षणिक सत्रों का समापन दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय की डॉ. सरोज मलिक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ।

दूसरे दिन भी जारी रहेगा मंथन
वेबिनार के पहले दिन देशभर के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से जुड़े विद्वानों, शोधार्थियों, प्राध्यापकों और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। वक्ताओं ने एकमत होकर कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा और वैदिक शिक्षा प्रणाली आज भी मूल्याधारित, समग्र और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शिक्षा व्यवस्था के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

आयोजकों के अनुसार वेबिनार का दूसरा दिन 25 जुलाई (शनिवार) को भी विभिन्न शैक्षणिक सत्रों, व्याख्यानों और परिचर्चाओं के साथ आयोजित होगा, जिसमें भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा-दर्शन तथा वैदिक साहित्य के विभिन्न आयामों पर विस्तृत विमर्श किया जाएगा।

Advertisement