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विज्ञान का बड़ा खुलासा: बच्चे में मां की कोशिकाएं रहती हैं

नई दिल्ली: मां और बच्चे का रिश्ता जन्म से पहले ही बेहद गहराई से जुड़ जाता है। आमतौर पर माना जाता है कि गर्भ में पल रहा बच्चा मां से पोषण और ऑक्सीजन प्राप्त करता है, लेकिन विज्ञान ने इस रिश्ते का एक और दिलचस्प पहलू सामने रखा है। गर्भावस्था के दौरान मां और भ्रूण […]

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  • September 4, 2026 9:30 pm IST, Published 36 minutes ago

नई दिल्ली: मां और बच्चे का रिश्ता जन्म से पहले ही बेहद गहराई से जुड़ जाता है। आमतौर पर माना जाता है कि गर्भ में पल रहा बच्चा मां से पोषण और ऑक्सीजन प्राप्त करता है, लेकिन विज्ञान ने इस रिश्ते का एक और दिलचस्प पहलू सामने रखा है। गर्भावस्था के दौरान मां और भ्रूण के बीच केवल पोषक तत्वों का ही आदान-प्रदान नहीं होता, बल्कि कुछ कोशिकाएं भी एक-दूसरे के शरीर में पहुंच सकती हैं। इस वैज्ञानिक प्रक्रिया को Fetal-Maternal Microchimerism यानी भ्रूण-मातृ माइक्रोकाइमेरिज्म कहा जाता है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रही इस जानकारी में दावा किया जा रहा है कि मां की कोशिकाएं बच्चे के शरीर में पहुंचकर उसके दिल और दिमाग सहित विभिन्न अंगों में लंबे समय तक मौजूद रह सकती हैं। इस दावे का एक वैज्ञानिक आधार जरूर है, लेकिन इसे समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि माइक्रोकाइमेरिज्म वास्तव में क्या है और इसके बारे में विज्ञान ने अब तक क्या पाया है।

गर्भ में कैसे पहुंचती हैं मां की कोशिकाएं?

गर्भावस्था के दौरान प्लेसेंटा (Placenta) मां और भ्रूण के बीच महत्वपूर्ण संपर्क क्षेत्र का काम करता है। इसके माध्यम से ऑक्सीजन, पोषक तत्व और अन्य आवश्यक पदार्थों का आदान-प्रदान होता है। इसी दौरान बहुत कम संख्या में मातृ कोशिकाएं भ्रूण के रक्त और ऊतकों तक पहुंच सकती हैं।

यह प्रक्रिया केवल एक दिशा में नहीं होती। भ्रूण की कुछ कोशिकाएं भी मां के शरीर में प्रवेश कर सकती हैं। यानी गर्भावस्था के दौरान मां और बच्चे के बीच कोशिकीय स्तर पर दोतरफा आदान-प्रदान संभव है।

वैज्ञानिकों ने विभिन्न अध्ययनों में ऐसी कोशिकाओं की मौजूदगी के प्रमाण पाए हैं। यही कारण है कि माइक्रोकाइमेरिज्म को मां और बच्चे के बीच जैविक संबंध का एक रोचक उदाहरण माना जाता है।

जन्म के बाद भी रह सकती हैं कोशिकाएं

इस विषय का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि गर्भावस्था के दौरान शरीर में पहुंची कुछ कोशिकाएं बच्चे के जन्म के तुरंत बाद समाप्त नहीं होतीं। शोध में माइक्रोकाइमेरिक कोशिकाओं के लंबे समय तक मौजूद रहने के प्रमाण मिले हैं।

हालांकि, यह कहना सही नहीं होगा कि हर बच्चे के शरीर में मां की बड़ी संख्या में कोशिकाएं जीवनभर सक्रिय रहती हैं। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इन कोशिकाओं की संख्या बहुत कम हो सकती है और अलग-अलग व्यक्तियों में उनकी मौजूदगी तथा अवधि भी अलग हो सकती है।

यानी सोशल मीडिया पर चलने वाला “मां हमेशा बच्चे के शरीर में रहती है” जैसा वाक्य भावनात्मक रूप से आकर्षक है, लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसे सावधानी के साथ समझना चाहिए।

क्या मां की कोशिकाएं बच्चे के दिमाग और दिल तक पहुंचती हैं?

शोधकर्ताओं ने माइक्रोकाइमेरिक कोशिकाओं को शरीर के अलग-अलग ऊतकों और अंगों में खोजा है। कुछ अध्ययनों में ऐसी कोशिकाओं के विभिन्न अंगों में पाए जाने के संकेत मिले हैं। इसी वजह से यह विषय वैज्ञानिक समुदाय में लगातार अध्ययन का विषय बना हुआ है।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। किसी अंग में कोशिकाओं का मिलना यह साबित नहीं करता कि वे उस अंग के कामकाज को निश्चित रूप से नियंत्रित करती हैं या हमेशा उसकी मरम्मत करती हैं। इन कोशिकाओं की वास्तविक भूमिका अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि ये कोशिकाएं शरीर में किस तरह व्यवहार करती हैं और क्या वे ऊतक की मरम्मत, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया या अन्य जैविक प्रक्रियाओं में कोई भूमिका निभाती हैं।

प्रतिरक्षा प्रणाली से भी हो सकता है संबंध

माइक्रोकाइमेरिज्म पर शोध का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र Immune System है। गर्भावस्था के दौरान मां और भ्रूण की प्रतिरक्षा प्रणालियों के बीच जटिल संतुलन बना रहता है। भ्रूण के विकास के दौरान मां का शरीर उसे स्वीकार करता है, जबकि दोनों के बीच कोशिकीय आदान-प्रदान भी चलता रहता है।

कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों ने माइक्रोकाइमेरिक कोशिकाओं और ऊतक की मरम्मत या प्रतिरक्षा संबंधी प्रक्रियाओं के बीच संभावित संबंधों की जांच की है। हालांकि, इन कोशिकाओं को सीधे तौर पर “बच्चे की इम्युनिटी मजबूत करने वाली कोशिकाएं” कहना अभी निश्चित वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं है।

मां-बच्चे का रिश्ता जैविक स्तर पर कितना खास है?

मां और बच्चे के बीच गर्भावस्था के दौरान होने वाला कोशिकीय आदान-प्रदान मानव शरीर की जटिलता को समझने का एक अनोखा उदाहरण है। यह बताता है कि गर्भावस्था केवल बच्चे के विकास की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि मां और भ्रूण दोनों के शरीर में होने वाले कई जैविक बदलावों की एक जटिल श्रृंखला है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि भ्रूण की कोशिकाएं भी मां के शरीर में लंबे समय तक पाई जा सकती हैं। इस वजह से वैज्ञानिक माइक्रोकाइमेरिज्म को भविष्य में कई बीमारियों और शरीर की मरम्मत संबंधी प्रक्रियाओं को समझने के संभावित रास्ते के रूप में देख रहे हैं।

वायरल दावे में कितना सच और कितना भावनात्मक?

“आप कभी भी सच में अकेले नहीं चलते, आपकी मां की सेल्स हमेशा आपके दिल और दिमाग में रहती हैं”—ऐसी पंक्तियां सोशल मीडिया पर तेजी से आकर्षित करती हैं। इनके पीछे मौजूद मूल वैज्ञानिक अवधारणा वास्तविक है, लेकिन इसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना सही नहीं होगा।

वास्तविकता यह है कि गर्भावस्था के दौरान मां और भ्रूण के बीच कोशिकाओं का आदान-प्रदान हो सकता है और कुछ मातृ कोशिकाएं बच्चे के शरीर में लंबे समय तक मौजूद रह सकती हैं। लेकिन हर बच्चे में उनकी मात्रा, स्थान और भूमिका समान हो, यह जरूरी नहीं है।

इसलिए वायरल पोस्ट को पूरी तरह गलत कहना भी उचित नहीं होगा और उसके हर दावे को वैज्ञानिक तथ्य मान लेना भी सही नहीं है।

निष्कर्ष

Fetal-Maternal Microchimerism विज्ञान का ऐसा क्षेत्र है, जिसने मां और बच्चे के रिश्ते को जैविक स्तर पर समझने का नया रास्ता खोला है। गर्भावस्था के दौरान कोशिकाओं का आदान-प्रदान और उनका लंबे समय तक बने रहना वैज्ञानिक रूप से दिलचस्प तथ्य है। हालांकि, इन कोशिकाओं की पूरी भूमिका अभी शोध का विषय है।

इसलिए वायरल दावे का सबसे सटीक सार यही है—मां और बच्चे के बीच गर्भावस्था के दौरान कोशिकीय स्तर पर गहरा जैविक संपर्क होता है, और कुछ मातृ कोशिकाएं बच्चे के शरीर में लंबे समय तक मौजूद रह सकती हैं।

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