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सुभाष चंद्रा को बड़ा झटका, NCLT ने कर्ज प्लान पर लगाई रोक

नई दिल्ली: एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और जी समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया कार्यवाही से जुड़े मामले में 1 सितंबर 2026 को बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने पहले मंजूर किए गए रिपेमेंट प्लान के अमल पर रोक लगा दी है। इस […]

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  • September 1, 2026 8:34 pm IST, Published 42 minutes ago

नई दिल्ली: एस्सेल ग्रुप के चेयरमैन और जी समूह के संस्थापक सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया कार्यवाही से जुड़े मामले में 1 सितंबर 2026 को बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) की पांच सदस्यीय विशेष पीठ ने पहले मंजूर किए गए रिपेमेंट प्लान के अमल पर रोक लगा दी है। इस योजना के तहत करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले सुभाष चंद्रा की ओर से लगभग 6.25 करोड़ रुपये का भुगतान प्रस्तावित था। साथ ही ट्रिब्यूनल ने उन्हें अपनी संपत्तियों को सीधे या परोक्ष रूप से बेचने, ट्रांसफर करने या किसी अन्य तरीके से अलग करने से भी रोक दिया है।

यह फैसला ऐसे समय आया है जब चंद्रा की व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में प्रस्तावित भुगतान और कुल दावों के बीच भारी अंतर को लेकर कई कर्जदाताओं की ओर से सवाल उठाए जा रहे थे। NCLT की विशेष पीठ ने मामले को दोबारा सुनने का रास्ता साफ किया है और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए हैं। यानी फिलहाल 25 अगस्त को सामने आया वह आदेश प्रभावी नहीं होगा, जिसमें रिपेमेंट प्लान को मंजूरी मिली थी।

22 हजार करोड़ के दावों के सामने 6.25 करोड़ का प्लान

इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू रकम का अंतर है। NCLT की कार्यवाही में चंद्रा के खिलाफ करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के दावे स्वीकार किए गए थे। प्रस्तावित योजना में उनकी व्यक्तिगत ओर से लगभग 6.25 करोड़ रुपये का योगदान रखा गया था। इसके अलावा करीब 25 लाख रुपये की राशि दिवालिया प्रक्रिया से जुड़े खर्च के लिए बताई गई थी। इस हिसाब से कर्जदाताओं की प्रस्तावित रिकवरी स्वीकृत दावों की तुलना में बेहद कम थी।

रिपोर्टों के मुताबिक, योजना को लेकर कर्जदाताओं के बीच भी एकराय नहीं थी। कुछ वित्तीय संस्थानों ने इसका विरोध किया और इसके खिलाफ अपील की तैयारी की। इससे मामला और जटिल हो गया। NCLT की पांच सदस्यीय पीठ ने भी पाया कि पहले की कार्यवाही में स्पष्ट बहुमत वाली राय नहीं बन पाई थी, जिसके कारण 25 अगस्त के आदेश को फिलहाल लागू नहीं किया जा सकता।

NCLT की पांच सदस्यीय पीठ ने क्या कहा?

मंगलवार को गठित विशेष पीठ की अध्यक्षता NCLT के अध्यक्ष न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल ने की। पीठ में न्यायिक सदस्य बचू वेंकट बालाराम दास और महेंद्र खंडेलवाल तथा तकनीकी सदस्य अतुल चतुर्वेदी और रविंद्र चतुर्वेदी शामिल थे। पीठ ने कहा कि पहले के आदेशों में स्पष्ट बहुमत वाली राय सामने नहीं आई थी। ऐसे में उस आदेश को प्रभावी नहीं किया जा सकता।

पीठ ने चंद्रा को निर्देश दिया है कि वह गारंटर के रूप में अपनी किसी भी संपत्ति को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से बेचें, ट्रांसफर करें या अन्य तरीके से अलग न करें। यह रोक मामले की आगे की सुनवाई तक प्रभावी रहेगी। सभी संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाएगा।

मामला आखिर शुरू कैसे हुआ?

यह विवाद एस्सेल ग्रुप से जुड़ी कंपनियों द्वारा लिए गए कर्ज और उन पर सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा है। कंपनियों की ओर से लिए गए कर्ज की अदायगी में समस्या आने के बाद व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर चंद्रा के खिलाफ दिवालिया कार्यवाही शुरू हुई।

यही वजह है कि इस मामले में सामने आ रही 22,000 करोड़ रुपये से अधिक की रकम को समझना जरूरी है। यह सीधे तौर पर यह नहीं बताती कि सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत रूप से इतनी रकम का बैंक लोन लिया था। यह मुख्य रूप से उन दावों से संबंधित है, जिनमें कंपनियों के कर्ज के लिए उनकी व्यक्तिगत गारंटी जुड़ी हुई थी। इस अंतर को लेकर खुद सुभाष चंद्रा भी अपनी प्रतिक्रिया में कह चुके हैं कि मीडिया रिपोर्टों में दावों की प्रकृति को सही तरीके से पेश नहीं किया गया।

कर्जदाताओं के बीच भी हुआ था मतभेद

रिपेमेंट प्लान को लेकर कर्जदाताओं की राय बंटी हुई थी। NCLT के पहले आदेश से संबंधित रिपोर्टों के अनुसार, वोटिंग में कुछ प्रमुख कर्जदाताओं ने योजना का समर्थन किया था, जबकि HDFC Bank और LIC Housing Finance समेत कुछ संस्थानों ने इसका विरोध किया। कुल वोटिंग वैल्यू के आधार पर योजना को पर्याप्त समर्थन मिलने की बात सामने आई थी, लेकिन विरोध करने वाले कर्जदाताओं ने रिकवरी की बेहद कम राशि पर आपत्ति जताई।

कुछ सरकारी क्षेत्र के बैंक भी NCLT के पहले आदेश को चुनौती देने की तैयारी में थे। इससे यह संकेत मिल गया था कि मामला आगे अपीलीय मंच तक जा सकता है। अब NCLT की विशेष पीठ के ताजा आदेश से विवाद की दिशा और महत्वपूर्ण हो गई है।

सुभाष चंद्रा का क्या कहना है?

सुभाष चंद्रा की ओर से पहले यह कहा गया था कि व्यक्तिगत स्तर पर उनकी स्थिति को लेकर सामने आ रही कई रिपोर्टें सही तस्वीर नहीं दिखातीं। उन्होंने दावों की रकम को लेकर भी अलग आंकड़ा बताया था। साथ ही उनका कहना रहा है कि संबंधित समूह संस्थाएं अपने कर्जदाताओं के साथ बकाया राशि का मिलान कर भुगतान की दिशा में आगे बढ़ेंगी।

ऐसे में ताजा NCLT आदेश के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आगे की सुनवाई में अदालत के सामने संपत्तियों, व्यक्तिगत गारंटी, कर्जदाताओं के दावों और रिपेमेंट प्लान से जुड़े कौन-कौन से तथ्य रखे जाते हैं।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल 6.25 करोड़ रुपये वाले रिपेमेंट प्लान पर रोक है। इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा मामला समाप्त हो गया है। बल्कि अब संबंधित पक्षों को सुनने के बाद NCLT की विशेष पीठ मामले पर आगे निर्णय लेगी। इस दौरान सुभाष चंद्रा अपनी संपत्तियों को बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकेंगे।

इस मामले का अगला चरण इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक तरफ व्यक्तिगत गारंटी के आधार पर कर्ज वसूली का सवाल है और दूसरी तरफ दिवालिया प्रक्रिया में कर्जदाताओं की रिकवरी और प्रस्तावित समाधान की वैधता का मुद्दा है। करीब 22,006 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले केवल कुछ करोड़ रुपये के व्यक्तिगत भुगतान की योजना ने पहले ही वित्तीय और कानूनी बहस को तेज कर दिया है। अब NCLT की विशेष पीठ की आगे की सुनवाई यह तय करने में अहम भूमिका निभाएगी कि सुभाष चंद्रा के खिलाफ व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ती है।

नोट: इस खबर में उपलब्ध ताजा न्यायिक घटनाक्रम को आधार बनाकर स्वतंत्र भाषा में समाचार तैयार किया गया है। 22,006.57 करोड़ रुपये की राशि को व्यक्तिगत बैंक लोन के रूप में नहीं, बल्कि कार्यवाही में दर्ज स्वीकृत दावों के संदर्भ में समझना चाहिए।

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