
कपिल मिश्रा, कैबिनेट मंत्री,दिल्ली सरकार
वंदे मातरम महज एक गीत नहीं है। यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध का नारा रहा, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार का प्रतीक रहा।स्वदेशी आंदोलन की आवाज रहा। जेल जाने वाले स्वतंत्रता सेनानियों का उदघोष रहा है। छात्र एवं युवाओं के लिए प्रेरणा और ऊर्जा का स्रोत अभी भी है। वंदेमातरम सभाओं और जुलूसों की पहचान है।
कविता से क्रांति तक, साहित्य से राजनीति तक, नारे से राष्ट्रीय गीत तक और अतीत से वर्तमान तक वंदेमातरम स्वतंत्रता आंदोलन की सांस्कृतिक स्मृति और विरासत को समेटे हुए हैं। वंदे मातरम को लेकर जवाहरलाल नेहरू की तुष्टीकरण की नीति को आगे बढ़ाने पर अमादा कांग्रेस की सोच से प्रदर्शित होता है कि पीढ़ियाँ बदल गई, लेकिन विचार नहीं बदले। वंदे मातरम के संपूर्ण गायन को लेकर कांग्रेस कार्यसमिति ने जो फैसला लिया है वह दुर्भाग्यपूर्ण है। राष्ट्रप्रेम की भावनाओं के खिलाफ है। पंडित जवाहरलाल नेहरू की एक गंभीर भूल को सुधारने का मौका केंद्र की मोदी सरकार ने एक बार फिर कांग्रेस को दिया था, लेकिन 15 अगस्त, 2026 को कांग्रेस दफ्तर में ध्वजारोहण के समय श्रीमती सोनिया गांधी ने जो हरकत किया वह राष्ट्रीय गीत का अपमान है।
इससे प्रतीत होता है कि कांग्रेस अब भी मोहम्मद अली जिन्ना के विचारों के सामने नतमस्तक है। देश राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। पहली बार लाल किले के प्राचीर से वंदे मातरम का संपूर्ण गायन गायन किया गया। जबकि कांग्रेस नेताओं को राष्ट्रीय गीत को लेकर भी तुष्टीकरण की राजनीति करनी है। कांग्रेस की इस रणनीति को लेकर देशवासियों को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। वर्ष 1923 में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस अधिवेशन के दौरान वंदेमातरम का संपूर्ण गायन होना था, मगर उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली ने वॉकआउट कर दिया।
इसके बाद 1937 में पहली बार जवाहरलाल नेहरू के कहने पर ‘वंदेमातरम’ को विभाजित कर पहले छंद को ही गाने का प्रस्ताव लाया गया। मोहम्मद अली जिन्ना ने भी ‘वंदेमातरम’ के संपूर्ण गायन पर घोर आपत्ति दर्ज किया था। 1938 में नेहरू ने जिन्ना को पत्र लिखकर उनकी 14 मांगों के सामने घुटने टेक दिए और जिन्ना के दबाव में ‘वंदेमातरम्’ का एक ही छंद राष्ट्रीय गीत के रूप में स्वीकार कर लिया गया। संविधान सभा ने 24 जनवरी, 1950 में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया, जबकि 1905 में बंगाल विभाजन (बंग-भंग) के दौरान यह गीत विरोध प्रदर्शन का मुख्य महामंत्र बन गया था।
अंग्रेजों ने इस पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश की, लेकिन इसकी लोकप्रियता कम नहीं हुई। जगह जगह रैलियों और सभाओं में ‘वंदेमातरम’ की गूंज सुनाई देने लगा, जिससे यह राष्ट्रीय जागरण का प्रतीक बन गया। तमाम स्वतंत्रता सेनानियों ने ‘वंदेमातरम’ गाते- गाते फांसी के फंदे चूम लिए। जबकि नेहरू इसे आजाद भारत का गीत मानने को तैयार नहीं थे। जिन्ना के आगे नेहरू झुक गए। मुस्लिम लीग और जिन्ना के दबाव में ‘वंदे मातरम’ भी बंट गया और देश की बंटवारे का नींव पड़ गया। हालांकि नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखकर कहा था कि सांप्रदायिक ताकतों के सामने झुकने की जरूरत नहीं है।
उन्होंने कहा था कि ‘वंदे मातरम’ देश को जोड़ने वाला गीत है। इसका संपूर्ण गायन होना चाहिए, लेकिन नेहरू पर कोई असर नहीं पड़ा। बहरहाल, राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम’ को जुलाई 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण संशोधन अधिनियम 2026 के तहत राष्ट्रगान के समान पूर्ण कानूनी संरक्षण मिल गया है। 24 जनवरी, 1950 को डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने इसे ‘जनगणमन’ के बराबर सम्मान देने की घोषणा की थी। गृह मंत्रालय के निर्देशों के अनुसार, इसके सभी 6 छंदों को 3 मिनट 10 सेकेंड में गाना निर्धारित किया गया है।
यदि कोई इसके गायन में जानबूझकर बाधा डालता है या अपमान कर करता है, तो 3 साल तक की जेल और जुर्माना का प्रावधान है। पूरा देश ‘वंदेमातरम’ की 150वीं वर्षगांठ मना रहा है। केंद्र की मोदी सरकार ने साल भर चलने वाले राष्ट्रव्यापी कार्यक्रमों की शुरुआत नवंबर 2025 में की थी। यह संस्मरणोत्सव। 7 नवंबर, 2025 से 7 नवंबर, 2026 तक के लिए निर्धारित किया गया है। स्पष्ट है कि वंदे मातरम सिर्फ एक गीत नहीं है।
यह माँ भारती के प्रति भक्ति, शक्ति एवं समर्पण की शाश्वत अभिव्यक्ति है। राष्ट्र प्रथम के अमर संदेश से ओत प्रोत। यह गीत हर भारतीय हृदय में मातृभूमि के प्रति अटूट श्रद्धा का संचार करती है। कांग्रेस के सभी नेताओं से आग्रह है कि राष्ट्रीय गीत ‘वंदेमातरम’ को समय निकाल कर कंठस्थ कर लें।