लद्दाख में सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के संस्थान हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव लर्निंग (एचआईएएल) को आवंटित जमीन का मामला एक बार फिर चर्चा में आ गया है। लद्दाख प्रशासन ने जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाई कोर्ट में दाखिल हलफनामे में जमीन आवंटन रद्द करने के फैसले को उचित ठहराया है। प्रशासन का कहना है कि संस्थान ने आवंटन की निर्धारित शर्तों का पालन नहीं किया और तय समयसीमा के भीतर लीज डीड निष्पादित कराने के साथ जमीन का प्रीमियम भी जमा नहीं किया। दूसरी ओर, एचआईएएल की मुख्य कार्यकारी अधिकारी गीतांजलि आंगमो ने प्रशासन के आरोपों को खारिज किया है।
हाई कोर्ट में दाखिल 136 पन्नों के हलफनामे में प्रशासन ने बताया कि लेह के फ्यांग थांग क्षेत्र में संस्थान को आवंटित 1,076 कनाल और एक मरला जमीन की लीज कानूनी रूप से 5 मई 2019 को समाप्त हो गई थी। प्रशासन के अनुसार, 5 मई 2018 को जारी आवंटन आदेश में स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि एक वर्ष के भीतर लीज डीड निष्पादित नहीं कराने और निर्धारित प्रीमियम जमा नहीं करने पर जमीन का आवंटन स्वतः रद्द माना जाएगा।
लद्दाख प्रशासन ने 21 अगस्त 2025 को एचआईएएल का जमीन आवंटन रद्द कर दिया था। संस्थान ने इस फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी। इसी याचिका के जवाब में लेह के उपायुक्त एवं लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद के मुख्य कार्यकारी अधिकारी रोमिल सिंह डोंक की ओर से हलफनामा दाखिल किया गया है। इसमें प्रशासन ने अपने फैसले के समर्थन में कानूनी और प्रशासनिक आधार प्रस्तुत किए हैं। हलफनामे में संस्थान की शैक्षणिक मान्यता का मुद्दा भी उठाया गया है। प्रशासन ने लद्दाख के उच्च शिक्षा विभाग के हवाले से कहा कि एचआईएएल मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालय नहीं है और उसके पाठ्यक्रम लद्दाख विश्वविद्यालय या किसी अन्य वैधानिक निकाय से संबद्ध नहीं हैं।
प्रशासन ने इस तथ्य को भी जमीन आवंटन से जुड़े विवाद में शामिल किया है। हालांकि, इस संबंध में संस्थान का पक्ष भी महत्वपूर्ण है और मामले का अंतिम निर्णय न्यायालय की कार्यवाही पर निर्भर करेगा। प्रशासन ने सोनम वांगचुक के नेतृत्व वाले संगठन स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (एसईसीएमओएल) का भी उल्लेख किया है। हलफनामे में आरोप लगाया गया है कि संगठन ने लेह के फे गांव में करीब 124 कनाल सरकारी जमीन पर औपचारिक आवंटन और निर्धारित भुगतान के बिना लंबे समय से कब्जा कर रखा है। प्रशासन के अनुसार, इस जमीन का प्रीमियम लगभग 80 लाख रुपये आंका गया है। ये आरोप प्रशासन की ओर से न्यायालय में पेश किए गए हलफनामे का हिस्सा हैं।
हलफनामे में यह भी दावा किया गया है कि एचआईएएल ने जून 2020 में प्रशासन को पत्र लिखकर जमीन के प्रीमियम और भू-किराये को पूरी तरह माफ करने का अनुरोध किया था। प्रशासन का कहना है कि इस मांग को स्वीकार नहीं किया गया। इसके अतिरिक्त, फ्यांग वेलफेयर सोसाइटी, गांव के नंबरदार और कुछ स्थानीय निवासियों की ओर से वर्ष 2018 से शिकायतें मिलने का भी उल्लेख किया गया है। प्रशासन ने सुझाव दिया है कि वापस ली गई जमीन का उपयोग किसी प्रतिष्ठित राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थान की स्थापना के लिए किया जा सकता है। इसके लिए सैनिक स्कूल, एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय और सिंधु केंद्रीय विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों के नाम सुझाए गए हैं।
प्रशासन ने अपने हलफनामे में अप्रैल 2007 की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए वांगचुक से जुड़े शैक्षणिक कार्यक्रमों के लिए लगभग 200 कनाल जमीन पर कथित अनधिकृत कब्जे का आरोप भी लगाया है। इसके अलावा, सितंबर 2025 में लेह में हुए हिंसक प्रदर्शनों और वांगचुक की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत हिरासत का जिक्र किया गया है। हलफनामे के अनुसार, उनकी हिरासत मार्च 2026 में रद्द कर दी गई थी। इस मामले में प्रशासन ने 25 सितंबर 2025 के केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश का भी उल्लेख किया है, जिसमें एसईसीएमओएल के विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) पंजीकरण को रद्द करने से संबंधित कथित वैधानिक उल्लंघनों का जिक्र है।
प्रशासन ने विदेशी दान और उससे जुड़ी गतिविधियों पर भी सवाल उठाए हैं। इन आरोपों पर संबंधित पक्षों का पक्ष और न्यायालय का निष्कर्ष मामले की आगे की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण होंगे। फिलहाल, एचआईएएल की जमीन का आवंटन रद्द करने का विवाद हाई कोर्ट में विचाराधीन है। प्रशासन ने जहां नियमों के उल्लंघन और निर्धारित शर्तें पूरी नहीं किए जाने को फैसले का आधार बताया है, वहीं संस्थान ने इस कार्रवाई को चुनौती दी है। ऐसे में अब न्यायालय में प्रस्तुत तथ्यों, दस्तावेजों और दोनों पक्षों की दलीलों के आधार पर मामले का भविष्य तय होगा।