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जाति व्यवस्था पर बॉम्बे HC की टिप्पणी, सफाई कर्मियों की गरिमा पर सवाल

बॉम्बे हाई कोर्ट ने देश में अब भी जारी मैनुअल स्कैवेंजिंग यानी हाथ से मैला ढोने की प्रथा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि भारत तकनीक और अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल करने का दावा करता है, लेकिन दूसरी ओर समाज के कुछ वर्गों को आज भी ऐसा काम […]

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  • September 5, 2026 12:48 pm IST, Published 54 minutes ago

बॉम्बे हाई कोर्ट ने देश में अब भी जारी मैनुअल स्कैवेंजिंग यानी हाथ से मैला ढोने की प्रथा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि भारत तकनीक और अंतरिक्ष के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धियां हासिल करने का दावा करता है, लेकिन दूसरी ओर समाज के कुछ वर्गों को आज भी ऐसा काम करना पड़ रहा है, जो उनकी मानवीय गरिमा के खिलाफ है।

जस्टिस भारती डांगरे और मंजूषा देशपांडे की पीठ ने कहा कि 21वीं सदी में देश चांद के दूसरे हिस्से तक पहुंचने की उपलब्धियों की बात करता है, लेकिन जाति व्यवस्था जैसी सामाजिक बुराई अब भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अदालत ने संविधान में समानता और कानून के समान संरक्षण के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान लागू हुए 75 साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद इस समस्या का पूरी तरह समाधान नहीं हो पाया है।

हाई कोर्ट की यह टिप्पणी मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास से संबंधित 2013 के कानून को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किए जाने के आरोपों से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आई। मामले की सुनवाई 13 अगस्त को हुई थी और आदेश को 3 सितंबर को सार्वजनिक किया गया। अदालत ने कहा कि हाथ से मैला ढोने की प्रथा केवल एक रोजगार संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक भेदभाव और जातिगत व्यवस्था से जुड़ी गंभीर समस्या है। पीढ़ियों से एक विशेष समुदाय के लोगों को इस अमानवीय कार्य से जोड़कर रखना संविधान में निहित समानता और सम्मान के सिद्धांतों के विपरीत है।

सुनवाई के दौरान मैनुअल स्कैवेंजिंग की रोकथाम और सफाई कर्मचारियों की सुरक्षा को लेकर राज्य की ओर से उठाए गए कदमों पर भी सवाल उठे। राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि उसके सभी 36 जिलों को मैनुअल स्कैवेंजिंग से मुक्त घोषित किया जा चुका है। इसके लिए अगस्त 2023 में जिलाधिकारियों की ओर से प्रमाण पत्र जमा किए जाने की जानकारी भी दी गई थी।

हालांकि, याचिकाकर्ताओं ने इन दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि जमीनी स्थिति सरकारी रिकॉर्ड से अलग दिखाई देती है। उनके मुताबिक राज्य में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां सफाई कर्मचारियों की मौत हुई और उनके परिवारों को मुआवजा दिया गया। याचिकाकर्ताओं ने 81 मामलों में 10 लाख रुपये का मुआवजा दिए जाने का उल्लेख करते हुए दावा किया कि इससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

मामले में यह मुद्दा भी सामने आया कि निजी ठेकेदारों या निजी संस्थाओं के माध्यम से सफाई का काम करने वाले कर्मचारियों की मौत होने पर मुआवजे की जिम्मेदारी किसकी होगी। अदालत ने दो सरकारी आदेशों में राज्य के रुख को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे मामलों में मृत सफाई कर्मचारियों के परिवार सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय 30 लाख रुपये के मुआवजे के हकदार होंगे। राज्य सरकार को संबंधित नियोक्ताओं से यह रकम वसूलने की स्वतंत्रता दी गई है।

यह याचिका श्रमिक जनता संघ से जुड़े राजू माधवे और लेखक श्रेयस पांडे ने दायर की थी। राजू माधवे के बेटे सूरज की वर्ष 2022 में मुंब्रा की एक हाउसिंग सोसाइटी में सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान मौत हो गई थी। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गायत्री सिंह ने अदालत में राज्य के सरकारी आदेशों और मुआवजे से जुड़ी व्यवस्था पर सवाल उठाए।

अदालत ने पांच मृत सफाई कर्मचारियों के आश्रितों को भी 30-30 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया, जिनके मामले याचिका के माध्यम से अदालत के सामने रखे गए थे। बॉम्बे हाई कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल सामने रखा है कि कानूनी प्रतिबंध और सरकारी योजनाओं के बावजूद मैनुअल स्कैवेंजिंग पूरी तरह खत्म क्यों नहीं हो पा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कागजों पर किसी क्षेत्र को मैनुअल स्कैवेंजिंग मुक्त घोषित करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक स्थिति में भी इस अमानवीय प्रथा का अंत सुनिश्चित करना जरूरी है।

फैसले का व्यापक संदेश यही है कि तकनीकी प्रगति के साथ सामाजिक न्याय और मानव गरिमा की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है। जब तक सफाई कर्मचारियों को सुरक्षित कार्य परिस्थितियां, सम्मान और कानून के तहत प्रभावी संरक्षण नहीं मिलता, तब तक इस सामाजिक समस्या को पूरी तरह खत्म करने का लक्ष्य अधूरा रहेगा।

 

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