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पराली जलाने पर रोक के लिए केंद्र सरकार अलर्ट

 मध्य प्रदेश में 452% और राजस्थान में 200% बढ़ीं घटनाएं नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए कमर कस ली है। पराली जलाने का मौसम चरम पर पहुंचने से पहले केंद्र ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और राष्ट्रीय […]

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  • October 14, 2026 10:02 am IST, Published 1 hour ago

 मध्य प्रदेश में 452% और राजस्थान में 200% बढ़ीं घटनाएं

नई दिल्ली। दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण बढ़ने की आशंका के बीच केंद्र सरकार ने पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने के लिए कमर कस ली है। पराली जलाने का मौसम चरम पर पहुंचने से पहले केंद्र ने मध्य प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में मिशन मोड में काम करने के निर्देश दिए हैं। सरकार ने राज्यों को निगरानी बढ़ाने, जिलाधिकारियों के साथ तत्काल बैठकें करने और किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के वैकल्पिक उपाय उपलब्ध कराने पर जोर दिया है।

केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय अंतर-मंत्रालयी बैठक में पराली प्रबंधन की समीक्षा की गई। बैठक में कहा गया कि धान की कटाई और रबी फसलों की बुवाई के बीच समय कम है, इसलिए प्रशासन को केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित रहने के बजाय जमीन पर तेजी से काम करना होगा।

मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़ीं पराली जलाने की घटनाएं

बैठक में सामने आए आंकड़ों के अनुसार, 15 सितंबर से 12 अक्टूबर की अवधि में हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले 53.3 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। उत्तर प्रदेश में भी घटनाएं करीब 32 प्रतिशत घटी हैं। पंजाब में भी कमी आने की जानकारी दी गई।

इसके विपरीत, मध्य प्रदेश और राजस्थान में पराली जलाने की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

  • मध्य प्रदेश: पिछले वर्ष की समान अवधि में पराली जलाने की 55 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो बढ़कर 277 हो गईं। यह लगभग 452 प्रतिशत की वृद्धि है।
  • राजस्थान: घटनाएं 20 से बढ़कर 60 हो गईं। इस तरह इनमें 200 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दोनों राज्यों में बढ़ती घटनाओं को चिंताजनक बताते हुए प्रभावित जिलों और गांवों के लिए विशेष कार्ययोजना लागू करने के निर्देश दिए।

किसानों को केवल सलाह नहीं, सस्ते विकल्प देने पर जोर

केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि किसानों से पराली नहीं जलाने की अपील करना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें ऐसे विकल्प भी उपलब्ध कराने होंगे, जिनसे फसल अवशेषों का निपटान आसानी से और कम खर्च में किया जा सके।

किसानों के सामने धान की कटाई के बाद खेत खाली करने और समय पर गेहूं की बुवाई करने की चुनौती रहती है। धान की कटाई और अगली फसल की बुवाई के बीच महज 20 से 25 दिन का समय मिलने के कारण कई किसान जल्दी में पराली जला देते हैं।

सरकार का जोर मशीनों की उपलब्धता बढ़ाने, फसल अवशेषों के उपयोग को प्रोत्साहित करने और स्थानीय स्तर पर प्रभावी व्यवस्था तैयार करने पर है, ताकि किसानों को पराली जलाने के लिए मजबूर न होना पड़े।

पराली से जैविक खाद और अतिरिक्त कमाई की संभावना

फसल अवशेषों को जलाने के बजाय उनका उपयोग कई तरीकों से किया जा सकता है। पराली को खेत में मिलाने से मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और खाद तैयार करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, इसका इस्तेमाल जैव-सीएनजी, जैव-एथनॉल, बिजली उत्पादन और पशु चारे के लिए भी किया जा सकता है।

इन विकल्पों से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को कम करने के साथ किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर भी पैदा हो सकते हैं। हालांकि, इसके लिए स्थानीय स्तर पर संग्रह, परिवहन, प्रसंस्करण और खरीद की उचित व्यवस्था जरूरी है।

केंद्र ने जारी किए 4,266 करोड़ रुपये से अधिक

केंद्र सरकार के अनुसार, फसल अवशेष प्रबंधन योजना के तहत वर्ष 2018-19 से 2025-26 के बीच राज्यों को कुल 4,266.47 करोड़ रुपये जारी किए गए हैं। इस राशि का इस्तेमाल पराली प्रबंधन और संबंधित व्यवस्थाओं को मजबूत करने के लिए किया गया।

राज्यों को जारी धनराशि का विवरण इस प्रकार है:

  • पंजाब: 2,056.50 करोड़ रुपये
  • हरियाणा: 1,171.71 करोड़ रुपये
  • उत्तर प्रदेश: 868.67 करोड़ रुपये
  • मध्य प्रदेश: 59 करोड़ रुपये

इसके अलावा, केंद्र अब तक राज्यों को फसल अवशेष प्रबंधन के लिए तीन लाख 54 हजार से अधिक मशीनें उपलब्ध करा चुका है। इनमें चालू वित्त वर्ष में दी गई 26,109 मशीनें भी शामिल हैं।

इन मशीनों की मदद से पराली को खेत में मिलाने, उसे इकट्ठा करने और दूसरे उपयोगों के लिए तैयार करने में सहायता मिल सकती है।

दिल्ली-एनसीआर के प्रदूषण पर भी पड़ेगा असर

पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वायु प्रदूषण बढ़ाने वाले कई कारकों में शामिल है। इसका प्रभाव मौसम की परिस्थितियों और अन्य प्रदूषण स्रोतों के साथ मिलकर दिल्ली-एनसीआर की हवा की गुणवत्ता पर पड़ सकता है। पराली जलाने के अलावा वाहनों का धुआं, निर्माण कार्यों से उठने वाली धूल और औद्योगिक उत्सर्जन भी प्रदूषण में योगदान देते हैं।

इसी वजह से केंद्र सरकार ने संबंधित राज्यों को पराली जलाने की घटनाओं पर समय रहते नियंत्रण करने और प्रभावित क्षेत्रों में निगरानी मजबूत करने को कहा है।

अक्टूबर से नवंबर के बीच अहम होगी कार्रवाई

धान की कटाई और गेहूं की बुवाई के बीच सीमित समय को देखते हुए अक्टूबर के मध्य से नवंबर के मध्य तक की अवधि पराली प्रबंधन के लिए बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इस दौरान प्रशासन की निगरानी, किसानों को मशीनों की उपलब्धता और फसल अवशेषों के वैकल्पिक उपयोग की व्यवस्था निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

निष्कर्ष: केंद्र सरकार के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती पराली जलाने की घटनाओं में कमी को जमीन पर प्रभावी बनाना है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश में दर्ज कमी उत्साहजनक संकेत है, लेकिन मध्य प्रदेश और राजस्थान में बढ़ती घटनाएं चिंता बढ़ा रही हैं। किसानों को समय पर मशीनें, सस्ते विकल्प और पराली के उपयोग के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराना ही इस समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

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