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भारत-अमेरिका रक्षा साझेदारी मजबूत, दस वर्षीय समझौते की समीक्षा की

भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां लगातार बदल रही हैं। दोनों देश रक्षा उपकरणों के विकास, तकनीकी नवाचार और सूचनाओं के आदान-प्रदान के जरिए अपनी साझेदारी को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, समझौते के वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि...

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  • October 28, 2026 3:50 pm IST, Published 60 minutes ago

भारत और अमेरिका ने अपने रक्षा संबंधों को और मजबूत बनाने की दिशा में अहम कदम उठाया है। फिलीपींस में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ के बीच हुई बैठक में दोनों देशों के बीच दस साल के रक्षा सहयोग समझौते की प्रगति की समीक्षा की गई। बातचीत में सैन्य तकनीक, खुफिया जानकारी साझा करने, हथियारों के संयुक्त उत्पादन और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। इस बैठक को दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

यह मुलाकात फिलीपींस में आयोजित 13वीं आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक प्लस (ADMM-Plus) के दौरान हुई। राजनाथ सिंह ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर बैठक को सकारात्मक बताते हुए कहा कि दोनों पक्षों ने दस वर्षीय रक्षा ढांचे के तहत हुई प्रगति का जायजा लिया। उन्होंने कहा कि सैन्य तकनीक, सूचनाओं के आदान-प्रदान और संयुक्त उत्पादन के क्षेत्रों में सहयोग दोनों देशों के बीच रणनीतिक तालमेल को बढ़ावा दे रहा है। साथ ही, उन्होंने सुरक्षित, स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए भारत-अमेरिका साझेदारी को महत्वपूर्ण बताया।

भारत और अमेरिका के बीच दस साल के रक्षा सहयोग ढांचे पर 31 अक्टूबर 2025 को हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों के बीच रक्षा संबंधों को दीर्घकालिक आधार देना और सैन्य सहयोग के नए अवसर विकसित करना है। इससे पहले दोनों देशों के बीच 2005 से 2015 तक के लिए रक्षा सहयोग का एक समझौता लागू था। नए ढांचे के जरिए बदलती सुरक्षा परिस्थितियों के अनुरूप साझेदारी को आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है।

रक्षा सहयोग का यह ढांचा केवल सैन्य अभ्यास और सुरक्षा वार्ताओं तक सीमित नहीं है। इसके अंतर्गत आधुनिक रक्षा तकनीक विकसित करने, सैन्य उपकरणों के उत्पादन में सहयोग बढ़ाने और दोनों देशों के रक्षा उद्योगों के बीच साझेदारी मजबूत करने की दिशा में काम किया जा रहा है। भारत और अमेरिका के बीच तकनीकी सहयोग का उद्देश्य रक्षा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ नई क्षमताओं का विकास करना भी है। बैठक में खुफिया जानकारी साझा करने का विषय भी महत्वपूर्ण रहा। क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के बीच समय पर और सटीक सूचनाओं का आदान-प्रदान सैन्य योजना तथा समुद्री सुरक्षा के लिए उपयोगी माना जाता है। दोनों देशों के बीच इस तरह का सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बदलते रणनीतिक हालात को समझने और संभावित चुनौतियों से निपटने में मदद कर सकता है।

रक्षा तकनीक के क्षेत्र में INDUS-X पहल भी भारत-अमेरिका सहयोग का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस पहल के जरिए दोनों देशों के रक्षा स्टार्टअप, उद्योगों, निवेशकों और अनुसंधान संस्थानों के बीच संपर्क बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। इसके तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, निगरानी और टोही प्रणाली, सैन्य उपकरणों तथा अन्य आधुनिक तकनीकों के विकास और उत्पादन में सहयोग की संभावनाओं पर काम किया जा रहा है। संयुक्त उत्पादन से दोनों देशों की रक्षा औद्योगिक क्षमताओं को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा भी बातचीत का प्रमुख मुद्दा रही। इस क्षेत्र में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान और क्षेत्रीय स्थिरता भारत तथा अमेरिका दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं। क्वाड समूह के माध्यम से भी भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया स्वतंत्र तथा खुले हिंद-प्रशांत क्षेत्र के उद्देश्य को आगे बढ़ाते हैं। रक्षा सहयोग का नया ढांचा इन साझा प्राथमिकताओं के अनुरूप सैन्य और तकनीकी साझेदारी को मजबूत करने का अवसर देता है।

भारत और अमेरिका के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग ऐसे समय में महत्वपूर्ण है, जब क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियां लगातार बदल रही हैं। दोनों देश रक्षा उपकरणों के विकास, तकनीकी नवाचार और सूचनाओं के आदान-प्रदान के जरिए अपनी साझेदारी को अधिक प्रभावी बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, समझौते के वास्तविक परिणाम इस बात पर निर्भर करेंगे कि तय प्राथमिकताओं को किस गति से लागू किया जाता है और संयुक्त परियोजनाएं कितनी सफल रहती हैं। फिलीपींस में हुई इस बैठक से स्पष्ट है कि भारत और अमेरिका अपने रक्षा संबंधों को दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी के रूप में आगे बढ़ाना चाहते हैं। आने वाले समय में रक्षा तकनीक, संयुक्त उत्पादन और क्षेत्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर दोनों देशों के बीच सहयोग की दिशा महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

 

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