रैली में शामिल होने के लिए विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं का पहुंचना शुरू हुआ। फारूक अब्दुल्ला, तेजस्वी यादव, सुप्रिया सुले, अभिषेक बनर्जी, केसी वेणुगोपाल सहित कई अन्य नेता भी कार्यक्रम में शामिल हुए। अलग-अलग राज्यों से आए कार्यकर्ताओं में रैली को लेकर उत्साह दिखाई दिया। मैदान और आसपास के इलाकों में बड़ी संख्या में समर्थकों की मौजूदगी रही।
कार्यक्रम के दौरान विपक्षी नेताओं की साझा मंच पर उपस्थिति को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विभिन्न दलों के नेताओं ने एक साथ अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी बात रखी। रैली में चुनावी व्यवस्था, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) और चुनाव आयोग की भूमिका जैसे विषयों को लेकर विपक्ष की चिंताएं प्रमुख रहीं।
दिल्ली पुलिस ने कार्यक्रम को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत किया। रामलीला मैदान के प्रवेश मार्गों और आसपास के संवेदनशील स्थानों पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। भीड़ को व्यवस्थित रखने और यातायात को सुचारु बनाए रखने के लिए भी आवश्यक प्रबंध किए गए। राजधानी के प्रमुख मार्गों पर सुरक्षा निगरानी बढ़ाई गई, ताकि कार्यक्रम के दौरान किसी प्रकार की अव्यवस्था न हो।
रैली के दौरान राहुल गांधी ने दिल्ली के बाजारों और व्यापारियों से जुड़ा मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस ने लोगों से अपील की थी कि रैली में आने के साथ-साथ आसपास के बाजारों से खरीदारी भी करें, जिससे स्थानीय कारोबारियों को फायदा मिल सके। राहुल गांधी के मुताबिक, कनॉट प्लेस की ओर आते समय उन्हें जानकारी मिली कि भाजपा ने कथित तौर पर दबाव डालकर कई दुकानें बंद करवा दी हैं।
राहुल गांधी ने इस मुद्दे को उठाते हुए कहा कि लोगों को समझना चाहिए कि व्यापारियों के कारोबार पर असर किस वजह से पड़ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि दुकानों के बंद रहने से स्थानीय व्यापारियों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। उनके इस बयान के बाद रैली में व्यापारिक गतिविधियों और राजनीतिक आयोजनों के बीच संबंध को लेकर चर्चा शुरू हुई। हालांकि दुकानों को बंद कराने के आरोप पर संबंधित पक्ष का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा।
रैली में विपक्षी दलों के नेताओं की भागीदारी ऐसे समय में हुई है, जब SIR और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक विवाद लगातार चर्चा में है। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची से जुड़े किसी भी बदलाव में पारदर्शिता और नागरिकों के मताधिकार की सुरक्षा सर्वोपरि होनी चाहिए। वहीं इस विषय पर राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं।
कांग्रेस की इस महारैली के जरिए विपक्ष ने अपनी राजनीतिक एकजुटता और साझा मुद्दों को सार्वजनिक मंच पर रखने का प्रयास किया। अलग-अलग राज्यों और राजनीतिक दलों से आए नेताओं की मौजूदगी ने आयोजन को राष्ट्रीय राजनीतिक महत्व दिया। रैली के दौरान दिए गए बयानों और उठाए गए मुद्दों से आने वाले दिनों में चुनावी प्रक्रिया, व्यापारियों की समस्याओं और विपक्षी एकता को लेकर राजनीतिक बहस आगे बढ़ने की संभावना है।