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प्रोजेक्ट में देरी की जिम्मेदारी पुराने बिल्डर की, खरीदारों को राहत

नयी दिल्लीः हाउसिंग प्रोजेक्ट में देरी से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि बिल्डर की ओर से परियोजना पूरी करने में हुई देरी का आर्थिक बोझ सीधे मकान खरीदारों पर नहीं डाला जा सकता। अदालत ने कहा कि ‘टाइम एक्सटेंशन चार्ज’ या देरी से जुड़ा ऐसा जुर्माना, जिसकी जिम्मेदारी […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • September 4, 2026 6:01 pm IST, Published 4 hours ago

नयी दिल्लीः हाउसिंग प्रोजेक्ट में देरी से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि बिल्डर की ओर से परियोजना पूरी करने में हुई देरी का आर्थिक बोझ सीधे मकान खरीदारों पर नहीं डाला जा सकता। अदालत ने कहा कि ‘टाइम एक्सटेंशन चार्ज’ या देरी से जुड़ा ऐसा जुर्माना, जिसकी जिम्मेदारी मूल रूप से बिल्डर पर बनती है, उसे केवल इस आधार पर घर खरीदारों के खाते में नहीं डाला जा सकता कि परियोजना बाद में किसी दूसरे डेवलपर ने अपने हाथ में ले ली है।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां किसी आवासीय परियोजना के निर्माण में लंबे समय तक देरी होती है और बाद में प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए नया बिल्डर या डेवलपर नियुक्त किया जाता है। ऐसे मामलों में अक्सर खरीदारों से अतिरिक्त रकम की मांग की जाती है और देरी के दौरान लगाए गए विभिन्न शुल्कों को उनकी देनदारी बताया जाता है।

अदालत ने इस तरह की जिम्मेदारी तय करते समय यह देखना जरूरी माना कि देरी किस अवधि में हुई, उस समय परियोजना की जिम्मेदारी किस डेवलपर के पास थी और संबंधित आर्थिक दायित्व किसके कार्यों या चूक के कारण पैदा हुआ। यदि देरी उस पुराने बिल्डर के कार्यकाल में हुई है, तो उससे पैदा हुई देनदारी को बाद में घर खरीदारों पर स्थानांतरित नहीं किया जा सकता।

फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि केवल परियोजना को पूरा करने के लिए नया बिल्डर सामने आने से पुरानी देनदारियां अपने आप नए डेवलपर या मकान खरीदारों की जिम्मेदारी नहीं बन जातीं। नए डेवलपर की भूमिका मुख्य रूप से उस व्यवस्था और समझौते पर निर्भर करेगी जिसके तहत उसने अधूरी परियोजना को पूरा करने की जिम्मेदारी ली है। पुरानी देरी के लिए किस पक्ष की जवाबदेही है, यह तथ्य और संबंधित कानूनी दस्तावेजों के आधार पर तय किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के जरिए यह सिद्धांत दोहराया कि घर खरीदार को ऐसी गलती की कीमत नहीं चुकानी चाहिए, जो उसकी ओर से नहीं हुई है। आम तौर पर खरीदार पहले ही बुकिंग, किस्त, बैंक ऋण और अन्य भुगतान के रूप में बड़ी रकम लगा चुका होता है। परियोजना में देरी होने पर उसे अतिरिक्त वित्तीय दबाव का सामना करना पड़ता है। ऐसे में केवल बिल्डर की देरी के कारण उस पर अलग से जुर्माना या शुल्क डालना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।

रियल एस्टेट क्षेत्र में इस फैसले का असर खास तौर पर उन परियोजनाओं पर पड़ सकता है, जिनमें डेवलपर बदल चुका है या दिवाला प्रक्रिया, समझौते या किसी अन्य व्यवस्था के तहत नया डेवलपर परियोजना को पूरा कर रहा है। ऐसी स्थिति में देनदारियों का निर्धारण करते समय पुराने और नए डेवलपर की भूमिका अलग-अलग देखनी होगी।

इस तरह के फैसले से घर खरीदारों के हितों की रक्षा का कानूनी आधार और मजबूत होता है। हालांकि हर मामले के तथ्य अलग हो सकते हैं और किसी विशेष परियोजना में शुल्क की वैधता इस बात पर निर्भर करेगी कि संबंधित अनुबंध, नियामकीय आदेश और अदालत के सामने मौजूद तथ्य क्या हैं।

मकान खरीदारों के लिए संदेश स्पष्ट है कि किसी परियोजना में हुई देरी से संबंधित शुल्क की मांग आने पर उन्हें यह जांचना चाहिए कि देरी किसकी वजह से हुई और शुल्क लगाने का कानूनी आधार क्या है। केवल नया डेवलपर आने या परियोजना को पूरा करने की जिम्मेदारी बदलने से पुरानी देरी की वित्तीय जिम्मेदारी खरीदारों पर नहीं डाली जा सकती।

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