नई दिल्ली: देश में महिलाओं और बच्चों से जुड़े गंभीर अपराधों के मामलों के त्वरित निपटारे के लिए बनाई गई फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों (FTSC) की रफ्तार धीमी पड़ती नजर आ रही है। केंद्र सरकार ने लोकसभा में बताया कि 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में कार्यरत 775 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों ने वर्ष 2025 में कुल 66,500 मामलों का निपटारा किया, जबकि वर्ष के अंत तक लगभग 2.45 लाख मामले लंबित रहे।
कानून एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया कि इन अदालतों में पॉक्सो (POCSO) अधिनियम और दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों की सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर की जाती है। वर्तमान में संचालित अदालतों में 398 पॉक्सो विशेष अदालतें भी शामिल हैं।
सरकार द्वारा दिए गए आंकड़ों के अनुसार:
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि 2025 में मामलों के निपटारे की संख्या पिछले दो वर्षों की तुलना में कम रही।
केंद्र सरकार ने बताया कि फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की योजना 2019 में शुरू की गई थी। इसका उद्देश्य दुष्कर्म और पॉक्सो कानून से जुड़े लंबित मामलों का तेजी से निपटारा करना था।
सरकार ने 790 फास्ट ट्रैक विशेष अदालतों की स्थापना का लक्ष्य रखा था और इस योजना की अवधि को बढ़ाकर 30 सितंबर 2026 तक कर दिया गया है।
मंत्री ने यह भी बताया कि केंद्र सरकार जिला और अधीनस्थ न्यायालयों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए एक केंद्र प्रायोजित योजना भी चला रही है। इस योजना के तहत 1993-94 से केंद्र और राज्यों के बीच तय फंड-शेयरिंग व्यवस्था के आधार पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता दी जाती है।
हालांकि फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना का उद्देश्य गंभीर मामलों में त्वरित न्याय सुनिश्चित करना है, लेकिन 2.45 लाख लंबित मामलों का आंकड़ा यह संकेत देता है कि न्याय प्रणाली पर अभी भी भारी दबाव बना हुआ है। ऐसे में अदालतों की संख्या बढ़ाने, रिक्त पदों को भरने और न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।