नई दिल्ली: तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सांसद महुआ मोइत्रा को सुप्रीम कोर्ट से तत्काल राहत नहीं मिली। अदालत ने धार्मिक भावनाएं आहत करने से जुड़े मामले में जांच अधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश होने से छूट देने की उनकी मांग स्वीकार करने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि इस तरह की परिस्थितियों को व्यक्तिगत पेशी से छूट का आधार नहीं बनाया जा सकता।
यह मामला महुआ मोइत्रा के एक सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिसके संबंध में उनके खिलाफ जांच चल रही है। इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने उन्हें गिरफ्तारी से अंतरिम राहत देते हुए जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया था। साथ ही हाईकोर्ट ने उन्हें 14 अगस्त को संबंधित जांच अधिकारी के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिए कहा था।
हाईकोर्ट के इसी निर्देश को चुनौती देते हुए महुआ मोइत्रा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत में दलील दी कि पिछली बार जब वह अपने संसदीय क्षेत्र के एक पुलिस थाने गई थीं, तब उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुआ था और उन पर अंडे फेंके गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें दोबारा ऐसी घटनाओं और सुरक्षा संबंधी खतरे की आशंका है, इसलिए उन्हें वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जांच में शामिल होने की अनुमति दी जाए।
सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने इस दलील पर असहमति जताई। पीठ ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में सक्रिय जनप्रतिनिधियों को विरोध और आलोचना जैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ सकता है, लेकिन केवल इस आधार पर जांच प्रक्रिया में व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट नहीं दी जा सकती।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी के समक्ष उपस्थित होना कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है और इसमें सहयोग करना प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। न्यायालय ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को सुरक्षा संबंधी वास्तविक खतरा है, तो उसके लिए कानून में अलग व्यवस्थाएं उपलब्ध हैं, लेकिन केवल आशंका के आधार पर व्यक्तिगत पेशी से छूट नहीं दी जा सकती।
सुनवाई के दौरान अदालत की सख्त टिप्पणियों के बाद महुआ मोइत्रा की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी। सुप्रीम कोर्ट ने यह अनुरोध स्वीकार करते हुए याचिका वापस लेने की अनुमति दे दी। इसके साथ ही व्यक्तिगत पेशी से छूट की मांग पर कोई राहत नहीं दी गई।
यह मामला धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोपों से जुड़ा है, जिसकी जांच संबंधित एजेंसियों द्वारा की जा रही है। हाईकोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि जांच प्रक्रिया में सहयोग करना आवश्यक होगा, जबकि गिरफ्तारी पर अंतरिम रोक जारी रहेगी।
सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से यह संदेश गया है कि जांच प्रक्रिया में सहयोग करना कानून के शासन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि कोई व्यक्ति किसी जांच में आरोपी या संबंधित पक्ष है, तो उसे निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होगा, जब तक कि किसी असाधारण परिस्थिति में अदालत अलग आदेश न दे।
अदालत ने इस मामले में यह स्पष्ट किया है कि सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्तियों के लिए भी कानून की प्रक्रिया समान रूप से लागू होती है। किसी भी तरह की राहत तथ्यों और कानूनी आधार पर ही दी जाएगी, न कि केवल संभावित विरोध या असुविधा के आधार पर। अब महुआ मोइत्रा को कलकत्ता हाईकोर्ट के निर्देशानुसार निर्धारित तिथि पर जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित होना होगा और जांच में सहयोग करना होगा।