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भोजशाला केस में सुप्रीम कोर्ट की पहल, जल्द होगी विस्तृत सुनवाई

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर से जुड़े बहुचर्चित विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई अहम दलीलें सामने आईं। मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने संकेत दिया कि वह सभी पक्षों को नोटिस जारी कर विस्तृत सुनवाई करेगी। वहीं, मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • July 14, 2026 2:56 pm IST, Published 55 minutes ago

नई दिल्ली: मध्य प्रदेश के धार स्थित ऐतिहासिक भोजशाला परिसर से जुड़े बहुचर्चित विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कई अहम दलीलें सामने आईं। मामले की सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने संकेत दिया कि वह सभी पक्षों को नोटिस जारी कर विस्तृत सुनवाई करेगी। वहीं, मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में कहा कि धार्मिक और ऐतिहासिक विवादों का समाधान टकराव से नहीं, बल्कि संतुलित और संवैधानिक दृष्टिकोण से होना चाहिए। उन्होंने महात्मा गांधी के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि “आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को अंधा कर देगी।”

सुनवाई के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत इस मामले में सभी संबंधित पक्षों को सुनना चाहती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी पक्षों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए जल्द ही विस्तृत सुनवाई के लिए तारीख तय की जाएगी। साथ ही अदालत ने इस संवेदनशील मामले में सभी पक्षों से संयम बरतने की भी अपील की।

मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हुजैफा अहमदी ने दलील दी कि पहले जो व्यवस्था वर्षों से चली आ रही थी, उसे हाई कोर्ट के आदेश के बाद बदल दिया गया। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय को धार्मिक गतिविधियों से पूरी तरह अलग कर दिया गया और उन्हें सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाने का पर्याप्त अवसर भी नहीं मिला।

अभिषेक मनु सिंघवी ने अपनी दलील में कहा कि देश के कई ऐतिहासिक स्मारकों और धार्मिक स्थलों को लेकर समय-समय पर अलग-अलग दावे किए जाते रहे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कुतुब मीनार और ताजमहल जैसे स्मारकों को लेकर भी विभिन्न ऐतिहासिक दावे सामने आते रहे हैं। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में केवल ऐतिहासिक दावों के आधार पर मौजूदा व्यवस्था को बदलना उचित नहीं होगा।

सिंघवी ने यह भी कहा कि धार भोजशाला परिसर में लंबे समय तक नमाज अदा की जाती रही और अंग्रेजी शासनकाल के दस्तावेजों में भी इसका उल्लेख मिलता है। उन्होंने तर्क दिया कि वर्षों तक नमाज और बसंत पंचमी के अवसर पर पूजा समानांतर रूप से होने की व्यवस्था धार्मिक सौहार्द का उदाहरण थी और इस व्यवस्था को बनाए रखा जाना चाहिए था।

मुस्लिम पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने अदालत को बताया कि वर्ष 1995 में दोनों समुदायों के बीच सहमति बनी थी, जिसके तहत धार्मिक गतिविधियां शांतिपूर्ण तरीके से संचालित होती थीं। उनका कहना था कि उस व्यवस्था को अचानक बदलना उचित नहीं था और इससे वर्षों से चले आ रहे संतुलन पर असर पड़ा है।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को बताया कि हाई कोर्ट के आदेश को लागू हुए दो महीने से अधिक समय बीत चुका है। इस अवधि में प्रशासन ने आदेश के अनुरूप आवश्यक कदम उठाए हैं और क्षेत्र में कानून-व्यवस्था तथा शांति बनी हुई है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अदालत में कही गई बातों की सार्वजनिक व्याख्या सावधानी से की जानी चाहिए, क्योंकि ऐसे संवेदनशील मामलों में किसी भी टिप्पणी का गलत अर्थ निकाला जा सकता है। उन्होंने दोहराया कि सर्वोच्च अदालत इस मामले पर जल्द विस्तृत सुनवाई करेगी और सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही आगे का निर्णय लिया जाएगा।

 

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