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कैंसर दवाओं की कीमतों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त,केंद्र से पूछा मुनाफे पर नियंत्रण क्यों नहीं?

इस मामले में दवाओं की कीमतों को लेकर बहस केवल एमआरपी या मुनाफे तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध इस बात से है कि गंभीर बीमारी का सामना कर रहा आम व्यक्ति बिना आर्थिक रूप से टूटे इलाज करा सकता है या नहीं।

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • October 27, 2026 5:01 pm IST, Published 39 minutes ago

नयी दिल्लीः कैंसर की दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार के सामने गंभीर सवाल उठाए हैं। सुनवाई के दौरान अदालत ने स्पष्ट किया कि गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के जीवन और स्वास्थ्य को व्यापारिक हितों के तराजू पर नहीं तौला जा सकता। कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों, उन पर होने वाले मुनाफे और आम मरीजों की आर्थिक स्थिति को लेकर अदालत की टिप्पणियों ने एक बार फिर स्वास्थ्य सेवाओं को किफायती बनाने की जरूरत पर ध्यान खींचा है।

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से दलील दी गई कि दुनिया के अन्य देशों की तुलना में भारत में कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं अपेक्षाकृत सस्ती हैं। सरकार के इस तर्क पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाते हुए कहा कि केवल दूसरे देशों की कीमतों से तुलना करना पर्याप्त नहीं है। अदालत ने संकेत दिया कि यदि अंतरराष्ट्रीय तुलना का आधार बनाया जा रहा है, तो भारत की प्रति व्यक्ति आय और लोगों की आर्थिक क्षमता जैसे पहलुओं पर भी विचार करना होगा।

अदालत की इस टिप्पणी के पीछे एक महत्वपूर्ण सवाल है कि किसी दवा की कीमत किसी दूसरे देश की तुलना में कम होने का मतलब यह नहीं है कि वह भारत के हर मरीज की पहुंच में भी है। देश में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार हैं, जिनके लिए कैंसर का इलाज कराना आर्थिक रूप से बेहद कठिन हो जाता है। महंगी दवाओं, अस्पताल के खर्च, जांच और लंबे समय तक चलने वाले उपचार के कारण कई परिवारों पर भारी वित्तीय दबाव पड़ता है।

पिछली सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की दवाओं की कीमतों में बड़े अंतर को लेकर सवाल उठाया था। अदालत के सामने यह मुद्दा आया था कि जिस दवा की कीमत लगभग 2,700 रुपये बताई जा रही है, उसकी अधिकतम खुदरा कीमत यानी एमआरपी 27,000 रुपये तक कैसे पहुंच सकती है। कीमतों में इस तरह के अंतर को लेकर अदालत की चिंता यह है कि दवा की वास्तविक लागत और मरीज से वसूली जाने वाली राशि के बीच अंतर को किस आधार पर उचित ठहराया जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी जानना चाहा कि कैंसर की दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय करने में इतनी देरी क्यों हो रही है। अदालत ने सवाल किया कि जब दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत कदम उठाए जा सकते हैं, तो सभी आवश्यक दवाओं के लिए अधिकतम मूल्य निर्धारित करने की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार क्यों नहीं किया जाता।

सरकार की ओर से दलील दी गई कि बाजार को अपने नियमों के अनुसार काम करने की कुछ स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। साथ ही, चिकित्सा उद्योग के विकास और दवा क्षेत्र में निवेश की जरूरतों को भी ध्यान में रखना जरूरी है। सरकार का पक्ष यह रहा कि इस क्षेत्र पर पूरी तरह नियंत्रण लगाने से उद्योग की प्रगति और विकास प्रभावित हो सकता है।

हालांकि, अदालत ने इस दृष्टिकोण पर असहमति जताते हुए मरीजों के हितों को प्राथमिकता देने की जरूरत पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी का मूल संदेश यह था कि स्वास्थ्य और जीवन जैसे बुनियादी सवालों पर विचार करते समय केवल बाजार, कारोबार और आर्थिक नीतियों को केंद्र में नहीं रखा जा सकता। कैंसर जैसी बीमारी में समय पर उपचार और जरूरी दवाओं की उपलब्धता मरीज के जीवन के लिए निर्णायक हो सकती है।

इस मामले में दवाओं की कीमतों को लेकर बहस केवल एमआरपी या मुनाफे तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध इस बात से है कि गंभीर बीमारी का सामना कर रहा आम व्यक्ति बिना आर्थिक रूप से टूटे इलाज करा सकता है या नहीं। यदि जरूरी दवाएं मरीजों की पहुंच से बाहर रहती हैं, तो उपचार की उपलब्धता के बावजूद उसका लाभ हर व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाएगा।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों से केंद्र सरकार के सामने यह चुनौती फिर उभरकर आई है कि दवा उद्योग के विकास और मरीजों को किफायती इलाज उपलब्ध कराने के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। अब इस मामले में आगे होने वाली कार्यवाही और सरकार के संभावित कदमों पर नजर रहेगी। मरीजों और उनके परिवारों के लिए सबसे अहम सवाल यही है कि कैंसर के इलाज का खर्च कब और किस हद तक कम हो सकेगा।

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