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पराली जलाने पर सख्ती, पंजाब-हरियाणा के 34 जिलों में उतरीं CPCB टीमें

पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान केवल कार्रवाई से संभव नहीं है। किसानों को समय पर मशीनरी, उचित आर्थिक सहायता और फसल अवशेषों के उपयोग के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। किसानों के लिए ऐसा प्रबंधन तंत्र तैयार करना होगा, जिसमें पराली को नष्ट करने के बजाय उसे उपयोगी संसाधन में बदला जा सके...

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Gauravshali Bharat News
  • October 6, 2026 6:30 pm IST, Published 45 minutes ago

धान की कटाई का मौसम शुरू होते ही पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं पर रोक लगाने की कवायद तेज हो गई है। फसल अवशेषों को खेतों में जलाने से उठने वाला धुआं हर साल उत्तर भारत की हवा की गुणवत्ता के लिए बड़ी चुनौती बनता है। इसी को देखते हुए केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने दोनों राज्यों के 34 जिलों में फ्लाइंग स्क्वॉड तैनात किए हैं। इन टीमों का काम खेतों में जाकर स्थिति का जायजा लेना, पराली जलाने की घटनाओं की निगरानी करना और संबंधित अधिकारियों को रिपोर्ट उपलब्ध कराना होगा।

फ्लाइंग स्क्वॉड की तैनाती ऐसे समय में हुई है, जब धान की कटाई के साथ खेतों में फसल अवशेष बड़ी मात्रा में निकलने लगते हैं। किसानों के सामने कम समय में खेत तैयार करने की चुनौती रहती है। कई बार इसी वजह से पराली को जलाने का रास्ता अपनाया जाता है। हालांकि इसका सीधा असर आसपास के वातावरण के साथ-साथ दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत के दूसरे इलाकों की हवा पर भी पड़ता है।

CPCB की टीमें अलग-अलग जिलों में खेतों की निगरानी करेंगी। इनका फोकस उन इलाकों पर रहेगा जहां पिछले वर्षों में पराली जलाने की घटनाएं अधिक दर्ज की गई हैं। टीमों की रिपोर्ट के आधार पर स्थानीय प्रशासन को जरूरी कार्रवाई करने और किसानों को फसल अवशेष प्रबंधन के उपलब्ध विकल्पों की जानकारी देने में मदद मिलेगी। पराली जलाने से निकलने वाले धुएं में कई तरह के प्रदूषक कण और गैसें मौजूद होती हैं। बड़ी संख्या में खेतों में एक साथ आग लगने पर इनका असर व्यापक क्षेत्र में दिखाई देता है। हवा की दिशा और मौसम की परिस्थितियां अनुकूल होने पर प्रदूषण का स्तर तेजी से बढ़ सकता है। यही वजह है कि धान कटाई के सीजन में पंजाब और हरियाणा की गतिविधियों पर केंद्र और राज्य स्तर की एजेंसियों की विशेष नजर रहती है।

इस बार निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने के पीछे मकसद सिर्फ आग की घटनाओं का पता लगाना नहीं है, बल्कि समय रहते उन्हें रोकना भी है। इसके लिए खेतों में फसल अवशेषों के प्रबंधन को लेकर किसानों को जागरूक करने पर भी जोर दिया जा रहा है। मशीनों के जरिए पराली को खेत में मिलाना, उसका उपयोग चारे या अन्य उत्पादों के लिए करना और वैकल्पिक प्रबंधन तकनीकों को अपनाना ऐसे उपाय हैं, जिनसे आग लगाने की जरूरत कम की जा सकती है। पंजाब और हरियाणा में पराली प्रबंधन को लेकर प्रशासनिक स्तर पर भी तैयारियां की जाती हैं। जिला प्रशासन, कृषि विभाग और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़ी एजेंसियां मिलकर किसानों तक मशीनरी और योजनाओं की जानकारी पहुंचाने का प्रयास करती हैं। इसके बावजूद यदि खेत में आग लगाने की घटना सामने आती है तो संबंधित नियमों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

फ्लाइंग स्क्वॉड की मौजूदगी से निगरानी का दायरा बढ़ने की उम्मीद है। रोजाना स्थिति की समीक्षा और जमीनी रिपोर्ट मिलने से प्रशासन को उन क्षेत्रों की पहचान करने में आसानी होगी, जहां तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत है। साथ ही इससे यह भी पता चल सकेगा कि रोकथाम के उपाय जमीन पर कितने प्रभावी साबित हो रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार पराली जलाने की समस्या का स्थायी समाधान केवल कार्रवाई से संभव नहीं है। किसानों को समय पर मशीनरी, उचित आर्थिक सहायता और फसल अवशेषों के उपयोग के व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। किसानों के लिए ऐसा प्रबंधन तंत्र तैयार करना होगा, जिसमें पराली को नष्ट करने के बजाय उसे उपयोगी संसाधन में बदला जा सके।

आने वाले दिनों में धान कटाई की रफ्तार बढ़ने के साथ निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी। CPCB के फ्लाइंग स्क्वॉड की रिपोर्ट और स्थानीय प्रशासन की कार्रवाई से यह तय होगा कि इस सीजन में खेतों में लगने वाली आग की घटनाओं पर कितनी प्रभावी रोक लग पाती है। फिलहाल केंद्रीय एजेंसियों की सक्रियता से यह साफ है कि पराली जलाने के मामले में इस बार निगरानी और जवाबदेही दोनों को गंभीरता से लिया जा रहा है।

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