नई दिल्ली। परिवार नियोजन के क्षेत्र में एक ऐसी तकनीक पर काम हो रहा है, जो भविष्य में पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक विकल्पों को बदल सकती है। अमेरिका के वेइल कॉर्नेल मेडिसिन के वैज्ञानिक एक ऐसी प्रयोगात्मक गर्भनिरोधक गोली विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं, जिसे यौन संबंध बनाने से लगभग 30 मिनट पहले लेने की परिकल्पना की गई है। इस तकनीक का उद्देश्य शुक्राणुओं की गति को अस्थायी रूप से रोकना है, ताकि वे अंडाणु तक पहुंचकर निषेचन न कर सकें।
इस संभावित तकनीक की चर्चा इसलिए भी हो रही है, क्योंकि पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक के उपलब्ध विकल्प अब तक सीमित रहे हैं। हालांकि, इस खबर के साथ एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना जरूरी है। यह गोली अभी नियमित इस्तेमाल के लिए स्वीकृत दवा नहीं है। वैज्ञानिकों को मनुष्यों में इसकी सुरक्षा, प्रभावशीलता और संभावित दुष्प्रभावों का परीक्षण करना बाकी है। <u>इसलिए फिलहाल इसे बाजार में उपलब्ध गर्भनिरोधक गोली समझना सही नहीं होगा।
क्या है पुरुषों की नई गर्भनिरोधक गोली?
वेइल कॉर्नेल मेडिसिन के वैज्ञानिक डॉ. जोचेन बक और डॉ. लॉनी लेविन इस शोध से जुड़े हैं। 23 अक्टूबर 2026 को संस्थान ने घोषणा की कि उसे अमेरिकी नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ चाइल्ड हेल्थ एंड ह्यूमन डेवलपमेंट से इस प्रयोगात्मक गर्भनिरोधक को विकसित करने और जांचने के लिए चार वर्षों का 8.2 मिलियन डॉलर का अनुदान मिला है।
शोधकर्ताओं का लक्ष्य ऐसी दवा विकसित करना है, जिसका इस्तेमाल जरूरत के अनुसार किया जा सके। वर्तमान में पुरुषों के लिए कंडोम और नसबंदी प्रमुख गर्भनिरोधक विकल्प हैं। इसके मुकाबले, प्रस्तावित तकनीक का उद्देश्य यौन संबंध से कुछ समय पहले दवा लेकर अस्थायी गर्भनिरोध उपलब्ध कराना है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, इस संभावित गोली को संबंध बनाने से करीब 30 मिनट पहले लेने और लगभग छह से आठ घंटे तक प्रभावी रखने की योजना है। लेकिन यह समय अभी प्रस्तावित दवा की विकास संबंधी जानकारी है, मनुष्यों में प्रमाणित सुरक्षा या गर्भनिरोधक प्रभाव का अंतिम परिणाम नहीं।
शुक्राणुओं की गति रोककर कैसे काम करेगी दवा?
इस तकनीक का आधार सॉल्यूबल एडेनिलाइल साइक्लेज यानी sAC नामक एंजाइम है। यह एंजाइम शुक्राणुओं की सक्रियता और उनकी गति से जुड़ी जैविक प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सामान्य स्थिति में शुक्राणुओं को महिला प्रजनन तंत्र में आगे बढ़ने और अंडाणु तक पहुंचने के लिए गतिशील होना पड़ता है। वैज्ञानिक ऐसी दवा विकसित कर रहे हैं, जो sAC एंजाइम की गतिविधि को कुछ समय के लिए बाधित कर सके। इससे शुक्राणुओं की गति प्रभावित हो सकती है और उनके निषेचन करने की क्षमता अस्थायी रूप से कम हो सकती है।
इस तकनीक की एक खास बात यह है कि इसका उद्देश्य पुरुषों के हार्मोन स्तर को बदलने के बजाय शुक्राणुओं की कार्यप्रणाली को निशाना बनाना है। हालांकि, किसी संभावित दवा का हार्मोन पर कम असर होने का विचार अपने आप में यह साबित नहीं करता कि वह पूरी तरह सुरक्षित है। इसके लिए अलग से विस्तृत परीक्षण आवश्यक होंगे।
चूहों पर हुए परीक्षण में क्या सामने आया?
इस शोध की वैज्ञानिक नींव वर्ष 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन से जुड़ी है। Nature Communications में प्रकाशित शोध में वैज्ञानिकों ने TDI-11861 नामक एक प्रयोगात्मक यौगिक का परीक्षण किया था।
इस अध्ययन में नर चूहों को दी गई एक खुराक से शुक्राणुओं की गति अस्थायी रूप से बाधित हुई। शोधकर्ताओं ने नियंत्रित परिस्थितियों में पाया कि दवा दिए गए नर चूहे मादा चूहों के साथ सामान्य संभोग व्यवहार कर सकते थे, लेकिन परीक्षण के दौरान गर्भधारण नहीं हुआ। इसके विपरीत, नियंत्रण समूह में गर्भधारण के मामले सामने आए।
शोध में शुक्राणुओं की गति पर प्रभाव कुछ घंटों तक देखा गया और बाद में उनकी सामान्य कार्यक्षमता लौटने के संकेत मिले। यह परिणाम भविष्य में जरूरत के अनुसार इस्तेमाल होने वाले पुरुष गर्भनिरोधक विकसित करने की संभावना को समर्थन देता है।
हालांकि, यह अंतर समझना जरूरी है कि वर्ष 2023 के अध्ययन में चूहों पर एक विशेष यौगिक का परीक्षण किया गया था। इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि मनुष्यों में प्रस्तावित गोली पहले से ही उतनी ही प्रभावी या सुरक्षित साबित हो चुकी है।
छह से आठ घंटे तक सुरक्षा का दावा कितना सही?
नई तकनीक के संबंध में सामने आई जानकारी के अनुसार, वैज्ञानिक ऐसी गोली विकसित करना चाहते हैं, जिसका संभावित प्रभाव छह से आठ घंटे तक बना रहे। इसके बाद पुरुष की प्रजनन क्षमता सामान्य स्थिति में लौटने की उम्मीद है।
लेकिन यह समय-सीमा अभी विकासाधीन दवा की प्रस्तावित विशेषता है। इसे मनुष्यों में प्रमाणित गर्भनिरोधक सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।
आगे होने वाले परीक्षणों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दवा कितनी तेजी से असर करती है, इसका प्रभाव कितनी देर तक रहता है, अलग-अलग व्यक्तियों में परिणाम कितने समान होते हैं और दवा का असर समाप्त होने के बाद प्रजनन क्षमता किस तरह लौटती है।
अब आगे क्या होगा?
वेइल कॉर्नेल मेडिसिन की 23 अक्टूबर 2026 की घोषणा के मुताबिक, शोध का अगला चरण मनुष्यों में शुरुआती परीक्षण की तैयारी से जुड़ा है। इसमें दवा की विषाक्तता, सुरक्षा, उपयुक्त खुराक और शरीर पर प्रभाव का मूल्यांकन किया जाना है। शोधकर्ताओं की योजना चरण-1 के नियंत्रित परीक्षण की दिशा में आगे बढ़ने की है।
ऐसे परीक्षणों में प्रतिभागियों की निगरानी की जाती है और दवा लेने वाले समूह की तुलना प्लेसीबो यानी ऐसी गोली वाले समूह से की जा सकती है, जिसमें सक्रिय दवा नहीं होती। शुक्राणुओं की गति में होने वाले बदलाव और संभावित दुष्प्रभावों का अध्ययन भी अहम होगा।
इसके बाद ही पता चल सकेगा कि यह तकनीक भविष्य में इस्तेमाल के लिए कितनी उपयुक्त हो सकती है। आम लोगों तक पहुंचने से पहले प्रभावशीलता की पुष्टि, बड़े स्तर के परीक्षण और नियामकीय मंजूरी जैसे कई चरण पूरे करने होंगे।
परिवार नियोजन में पुरुषों की बढ़ सकती है भूमिका
यदि भविष्य में यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी साबित होती है, तो परिवार नियोजन में पुरुषों की भागीदारी बढ़ाने के लिए एक नया विकल्प मिल सकता है। अभी कई गर्भनिरोधक उपायों की जिम्मेदारी महिलाओं पर अधिक रहती है। ऐसे में पुरुषों के लिए अतिरिक्त विकल्प विकसित होने से दंपतियों को अपनी जरूरत और स्वास्थ्य के अनुरूप निर्णय लेने में मदद मिल सकती है।
फिर भी, किसी भी नई गर्भनिरोधक तकनीक का इस्तेमाल वैज्ञानिक प्रमाणों और चिकित्सकीय सलाह के आधार पर ही होना चाहिए। जब तक इस गोली की सुरक्षा और प्रभावशीलता मनुष्यों में स्थापित नहीं हो जाती तथा इसे आवश्यक मंजूरी नहीं मिलती, तब तक इसे गर्भधारण रोकने का भरोसेमंद विकल्प नहीं माना जा सकता।
निष्कर्ष: पुरुषों के लिए जरूरत के अनुसार इस्तेमाल होने वाली गर्भनिरोधक गोली भविष्य की एक संभावनाशील वैज्ञानिक खोज है। चूहों पर हुए शुरुआती परीक्षणों ने इस विचार को आधार दिया है, लेकिन मनुष्यों में इसकी सुरक्षा और प्रभावशीलता साबित होना अभी बाकी है। फिलहाल पाठकों को सोशल मीडिया पर किए जा रहे दावों और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तथ्यों के बीच अंतर समझना चाहिए।