बांदा: बुंदेलखंड में कभी पानी की कमी खेती और रोजमर्रा की जिंदगी की सबसे बड़ी चुनौतियों में गिनी जाती थी। बांदा के मटौंध इलाके से सामने आई तस्वीर इस बदलाव की कहानी बयां कर रही है। जहां कुछ वर्षों पहले किसान बारिश के भरोसे खेती करने को मजबूर थे और सिंचाई के लिए पानी की तलाश करनी पड़ती थी, वहीं अब खेतों में बने तालाब बारिश के पानी को रोककर फसलों के लिए सहारा बन रहे हैं। उत्तर प्रदेश की खेत-तालाब योजना के जरिए बारिश के पानी को खेत में ही संरक्षित करने की कोशिश ने कई किसानों को सिंचाई का वैकल्पिक स्रोत उपलब्ध कराया है।
कभी पानी के लिए ट्रेन, अब खेत में पानी का इंतजाम
बुंदेलखंड में पानी की समस्या का जिक्र होते ही कुछ वर्ष पहले की वे तस्वीरें याद आती हैं, जब पेयजल संकट के कारण बांदा तक ट्रेन से पानी पहुंचाने की नौबत आई थी। हालांकि खेती के स्तर पर चुनौती इससे भी पुरानी रही है। बारिश पर निर्भर किसान अक्सर मानसून की अनिश्चितता से प्रभावित होते रहे हैं।
बांदा के मटौंध क्षेत्र में सामने आई तस्वीर इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण है। यहां खेतों के बीच छोटे तालाब बनाए गए हैं, जिनमें बारिश का पानी जमा किया जा रहा है। जरूरत पड़ने पर किसान इसी पानी का इस्तेमाल खेतों की सिंचाई के लिए कर रहे हैं। इससे बारिश के बाद उपलब्ध पानी को कुछ समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिलती है।
खेत में तालाब बना तो बारिश का पानी बना सहारा
खेत-तालाब योजना का मूल उद्देश्य बारिश के पानी को खेत में ही रोकना और उसका इस्तेमाल सिंचाई के लिए करना है। उत्तर प्रदेश सरकार की जानकारी के अनुसार, व्यक्तिगत भूमि पर खेत तालाब निर्माण को सिंचाई सुविधा और जल संरक्षण से जोड़कर लागू किया गया है। योजना के तहत किसानों को तालाब निर्माण के लिए अनुदान का प्रावधान भी किया गया है।
आजतक की 12 सितंबर 2026 की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक बांदा में अब तक 4,800 से अधिक किसान इस योजना से लाभान्वित हो चुके हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि चालू वर्ष में 255 किसानों को योजना का लाभ देने का लक्ष्य रखा गया है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, खेत में तालाब बनने से बारिश का पानी संरक्षित होता है और जरूरत के समय उसका इस्तेमाल सिंचाई में किया जा सकता है।
गेहूं, धान से लेकर सरसों तक को मिल रहा पानी
बुंदेलखंड के किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या खरीफ और रबी दोनों मौसम में पानी की उपलब्धता रही है। गेहूं, धान, सरसों, चना और अरहर जैसी फसलों के लिए समय पर सिंचाई नहीं मिलने पर उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
मटौंध क्षेत्र की रिपोर्ट में बताया गया है कि पहले कई किसान खेती के लिए मुख्य रूप से बारिश पर निर्भर थे। बारिश पर्याप्त होने पर फसल बच जाती थी, लेकिन मानसून कमजोर पड़ने पर किसानों के सामने लागत निकालने तक की चुनौती आ जाती थी। अब खेत में जमा बारिश का पानी जरूरत के समय सिंचाई में इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे खेती के लिए पानी की उपलब्धता को लेकर किसानों को कुछ अतिरिक्त सहारा मिल रहा है।
किसानों की आय को लेकर भी सामने आए बदलाव के दावे
आजतक की रिपोर्ट में स्थानीय किसानों के हवाले से खेती से होने वाली बिक्री में बढ़ोतरी के दावे भी सामने आए हैं। एक किसान के अनुसार, पहले जहां 15 हजार से 50 हजार रुपये तक की फसल बिक्री को अच्छा माना जाता था, वहीं अब कुछ किसानों की बिक्री 2 से 3 लाख रुपये तक पहुंच रही है। बड़े किसानों के लिए एक फसल से 5 से 6 लाख रुपये तक की बिक्री का दावा भी रिपोर्ट में किया गया है।
हालांकि ऐसी आय जमीन के आकार, फसल, उत्पादन, बाजार भाव और खेती की लागत जैसे कई कारकों पर निर्भर करती है। इसलिए इन आंकड़ों को सभी किसानों की औसत आय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। रिपोर्ट में भी इन्हें किसानों द्वारा बताए गए अनुभवों और दावों के तौर पर प्रस्तुत किया गया है।
जल संरक्षण के साथ खेती को मिला नया विकल्प
खेत तालाब का सबसे अहम पहलू केवल सिंचाई नहीं, बल्कि बारिश के पानी का स्थानीय स्तर पर संरक्षण भी है। सामान्य परिस्थितियों में खेतों से बहकर निकल जाने वाला बारिश का पानी तालाब में इकट्ठा किया जा सकता है। इसके बाद किसान जरूरत के अनुसार इसका उपयोग कर सकता है।
उत्तर प्रदेश सरकार की प्रकाशित सामग्री में भी खेत-तालाब योजना को जल संरक्षण और सिंचाई सुविधा से जोड़ा गया है। बुंदेलखंड जैसे अपेक्षाकृत जल-संकट वाले क्षेत्र में बारिश के पानी को स्थानीय स्तर पर रोकने की अवधारणा खेती के लिए उपयोगी हो सकती है।
बांदा में बढ़ रहा खेत तालाबों का महत्व
बांदा में पानी के स्तर और उपलब्धता से जुड़े सरकारी आंकड़े भी क्षेत्र की जल परिस्थितियों पर नजर रखने की जरूरत को दिखाते हैं। उत्तर प्रदेश जल जीवन मिशन के बांदा संबंधी आंकड़ों में मटौंध समेत अलग-अलग क्षेत्रों के जलस्तर संबंधी रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि क्षेत्र में जल संसाधनों की निगरानी लगातार की जा रही है।
खेत-तालाब मॉडल की खासियत यह है कि इसके जरिए पानी को खेत से बहुत दूर ले जाने के बजाय उसी कृषि क्षेत्र में रोकने का प्रयास किया जाता है। इससे किसान को सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी का स्थानीय स्रोत मिल सकता है।
पानी से हरियाली तक पहुंची बदलाव की तस्वीर
मटौंध की तस्वीर में खेत के किनारे जमा पानी और उसके आसपास दिखाई दे रही हरियाली इस बदलाव को दृश्य रूप देती है। यह बदलाव केवल एक तालाब या एक खेत तक सीमित नहीं माना जा सकता, बल्कि बुंदेलखंड जैसे क्षेत्र में जल संरक्षण आधारित खेती की संभावनाओं की ओर संकेत करता है।
हालांकि योजना की सफलता के लिए तालाबों का निर्माण, उनका सही रखरखाव, पानी की उपलब्धता और उसका प्रभावी इस्तेमाल महत्वपूर्ण है। इसके साथ किसानों को फसल चयन, सिंचाई प्रबंधन और जल संरक्षण की बेहतर तकनीकों की जानकारी भी जरूरी है।
फिलहाल बांदा के मटौंध क्षेत्र की तस्वीर यह दिखाती है कि बारिश का पानी यदि खेत में रोका जाए और जरूरत के समय उसका इस्तेमाल किया जाए तो पानी की कमी से जूझ रहे इलाकों में खेती को अतिरिक्त सहारा मिल सकता है। जहां कभी किसान बारिश का इंतजार करते थे, वहीं अब खेत के भीतर जमा पानी फसल के लिए जरूरत के समय काम आ रहा है। यही बदलाव बुंदेलखंड की खेती में जल संरक्षण की भूमिका को सामने ला रहा है।