लखनऊ: सूचना के अधिकार यानी RTI के जरिए CCTV फुटेज हासिल करने की कोशिश कर रहे लोगों के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ का एक अहम फैसला सामने आया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि ऐसी CCTV फुटेज, जिसमें संवेदनशील जानकारी शामिल हो सकती है, उसे केवल RTI आवेदन के आधार पर सीधे आवेदक को उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि किसी शिकायत या विवाद से जुड़ी CCTV रिकॉर्डिंग को हमेशा के लिए हासिल करने का रास्ता बंद हो गया है। कोर्ट ने बताया है कि उचित न्यायिक या सक्षम मंच के जरिए फुटेज को सुरक्षित रखने और जरूरत पड़ने पर तलब कराने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
CCTV फुटेज को लेकर हाईकोर्ट ने क्या कहा?
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने अपने आदेश में CCTV रिकॉर्डिंग की संवेदनशीलता और RTI कानून में मौजूद अपवादों को ध्यान में रखा। अदालत के समक्ष राज्य सूचना आयोग की ओर से यह दलील दी गई कि CCTV फुटेज में ऐसी जानकारी हो सकती है, जिसका सीधे खुलासा किसी व्यक्ति की सुरक्षा या अन्य संवेदनशील पहलुओं को प्रभावित कर सकता है। इसी आधार पर RTI अधिनियम की धारा 8(1)(g) के तहत फुटेज के सीधे खुलासे से छूट का पक्ष रखा गया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CCTV फुटेज को लेकर पूरी तरह से कोई कानूनी रास्ता बंद नहीं किया गया है। यदि किसी व्यक्ति को किसी घटना, शिकायत या विवाद के सिलसिले में रिकॉर्डिंग की जरूरत है तो वह सक्षम अदालत या संबंधित वैधानिक आयोग के समक्ष अपनी शिकायत रख सकता है। ऐसी स्थिति में संबंधित मंच रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने और आवश्यकता होने पर उसे अपने समक्ष मंगाने का निर्देश दे सकता है।
किस मामले में आया हाईकोर्ट का यह फैसला?
यह आदेश शोभित कश्यप की ओर से दायर रिट याचिका के निपटारे के दौरान आया। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, याचिकाकर्ता ने 20 मार्च 2025 को RTI आवेदन दाखिल कर कई जानकारियां मांगी थीं। इनमें संबंधित CCTV कैमरों की पूरी फुटेज भी शामिल थी। उनका आरोप था कि मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। इसके साथ ही उन्होंने संबंधित अधिकारी पर अधिकतम 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाए जाने और कथित परेशानी के लिए मुआवजे की मांग भी की थी।
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सूचना आयोग की ओर से कहा गया कि मांगी गई CCTV फुटेज संवेदनशील प्रकृति की है। इसलिए इसे RTI अधिनियम की धारा 8(1)(g) के तहत सीधे आवेदक को उपलब्ध नहीं कराया जा सकता। हालांकि, आयोग की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि सक्षम अदालत या आयोग फुटेज पेश करने का निर्देश देता है तो रिकॉर्डिंग को संबंधित कार्यवाही में प्रस्तुत किया जा सकता है।
RTI आवेदन और कोर्ट की कार्यवाही में क्या अंतर?
हाईकोर्ट के फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि RTI के जरिए जानकारी मांगना और किसी कानूनी कार्यवाही में साक्ष्य के तौर पर रिकॉर्डिंग मंगाना दो अलग प्रक्रियाएं हैं।
RTI कानून का उद्देश्य नागरिकों को सार्वजनिक प्राधिकरणों के पास उपलब्ध सूचनाओं तक पहुंच देना है, लेकिन कानून में कुछ ऐसी सूचनाओं के खुलासे से छूट भी दी गई है जिनके सार्वजनिक होने से सुरक्षा, गोपनीयता या अन्य महत्वपूर्ण हित प्रभावित हो सकते हैं।
CCTV फुटेज की प्रकृति भी सामान्य दस्तावेजों से अलग हो सकती है। किसी रिकॉर्डिंग में कई लोगों की गतिविधियां, उनकी पहचान, स्थान, आवाजाही और अन्य संवेदनशील दृश्य मौजूद हो सकते हैं। ऐसे में हर CCTV रिकॉर्डिंग को बिना किसी जांच या कानूनी प्रक्रिया के सीधे किसी आवेदक को सौंपना उचित नहीं माना जा सकता।
शिकायत होने पर क्या किया जा सकता है?
अदालत ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक रास्ता भी स्पष्ट किया है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि CCTV फुटेज किसी घटना या शिकायत के निपटारे के लिए महत्वपूर्ण है, तो वह उचित कोर्ट या सक्षम आयोग के सामने अपनी शिकायत प्रस्तुत कर सकता है।
ऐसी कार्यवाही में संबंधित मंच रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने का निर्देश दे सकता है। जरूरत पड़ने पर CCTV फुटेज को अपने पास मंगाकर मामले की जांच या सुनवाई के दौरान उसका परीक्षण भी किया जा सकता है। यानी रिकॉर्डिंग तक पहुंच का सवाल केवल RTI आवेदन तक सीमित नहीं है।
याचिकाकर्ता की दलील पर भी हुई चर्चा
मामले में याचिकाकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने के अधिकार से संबंधित दलील भी रखी गई थी। अदालत ने हालांकि यह देखा कि संबंधित व्यक्ति ने फुटेज हासिल करने के लिए केवल RTI का रास्ता अपनाया था और सक्षम अदालत या आयोग के समक्ष ऐसी शिकायत दाखिल नहीं की थी, जिसके आधार पर रिकॉर्डिंग को संरक्षित या तलब करने का आदेश दिया जा सके।
यही वजह रही कि हाईकोर्ट ने RTI के जरिए सीधे CCTV फुटेज उपलब्ध कराने की मांग को स्वीकार नहीं किया। साथ ही अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उचित मंच के सामने शिकायत दाखिल करने पर फुटेज को सुरक्षित रखने और आवश्यकता के अनुसार पेश कराने की प्रक्रिया अपनाई जा सकती है।
आम लोगों के लिए फैसले का क्या मतलब?
इस फैसले का सीधा असर उन लोगों पर पड़ सकता है जो किसी विवाद, शिकायत, दुर्घटना या घटना से जुड़ी CCTV रिकॉर्डिंग को केवल RTI आवेदन के माध्यम से हासिल करना चाहते हैं। अब उन्हें यह समझना होगा कि CCTV फुटेज सामान्य सूचना की तरह हर स्थिति में सीधे उपलब्ध होने वाली सामग्री नहीं है।
अगर रिकॉर्डिंग किसी विवाद या कानूनी मामले में महत्वपूर्ण सबूत है तो संबंधित व्यक्ति को उचित कानूनी मंच से उसका संरक्षण और उत्पादन सुनिश्चित कराने की जरूरत पड़ सकती है। इससे एक तरफ संवेदनशील जानकारी के अनधिकृत प्रसार पर रोक लगाने की कोशिश होती है, वहीं दूसरी तरफ वास्तविक शिकायत या विवाद में जरूरी रिकॉर्डिंग को संरक्षित रखने का रास्ता भी खुला रहता है।
निजता और पारदर्शिता के बीच संतुलन
हाईकोर्ट के आदेश को व्यापक रूप से निजता, सुरक्षा और पारदर्शिता के बीच संतुलन के संदर्भ में देखा जा सकता है। RTI कानून नागरिकों को सरकारी रिकॉर्ड और सूचनाओं तक पहुंच का महत्वपूर्ण अधिकार देता है, लेकिन यह अधिकार कानून में निर्धारित अपवादों से अलग नहीं है।
CCTV तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल के दौर में रिकॉर्डिंग में केवल किसी घटना की जानकारी ही नहीं होती, बल्कि उसमें आम नागरिकों की मौजूदगी और उनकी गतिविधियां भी रिकॉर्ड होती हैं। इसलिए ऐसी सामग्री को बिना प्रक्रिया के सार्वजनिक करने के बजाय कानूनी निगरानी में इस्तेमाल करने का तरीका महत्वपूर्ण हो जाता है।
निष्कर्ष: इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला यह स्पष्ट करता है कि संवेदनशील CCTV फुटेज को केवल RTI आवेदन के आधार पर सीधे आवेदक को देना जरूरी नहीं है। लेकिन यदि किसी शिकायत या विवाद में रिकॉर्डिंग जरूरी है, तो सक्षम अदालत या आयोग के माध्यम से उसे सुरक्षित रखने और जरूरत पड़ने पर तलब कराने का रास्ता उपलब्ध है।