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योगी सरकार का फैसला, सरकारी नौकरी से पहले चरित्र सत्यापन अनिवार्य

सरकार की इस पहल के बाद हिंसक गतिविधियों में संलिप्तता और सरकारी नौकरी के लिए पात्रता के निर्धारण को लेकर चर्चा भी महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे मामलों में यह तय करना जरूरी होगा कि किसी अभ्यर्थी की भूमिका क्या थी, आरोपों के समर्थन में किस तरह के तथ्य उपलब्ध हैं और संबंधित नियम उस पर कैसे लागू होते हैं। केवल विरोध प्रदर्शन में...

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  • October 29, 2026 1:15 pm IST, Published 32 minutes ago

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने की प्रक्रिया के तहत अभ्यर्थियों के चरित्र सत्यापन को लेकर नियम सख्त कर दिए गए हैं। राज्य सरकार ने सीधी भर्ती के जरिए नियुक्त होने वाले उम्मीदवारों के अतीत और आपराधिक गतिविधियों से जुड़े रिकॉर्ड की जांच के लिए नई व्यवस्था लागू की है। सरकार की ओर से जारी निर्देशों के अनुसार, हिंसा में शामिल होने और हिंसक तरीकों से सत्ता परिवर्तन की साजिश में भागीदारी जैसे गंभीर मामलों में संलिप्त पाए जाने वाले अभ्यर्थियों को सरकारी सेवा के लिए अयोग्य माना जा सकता है। इस संबंध में नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज ने नई नीति जारी की है।

नई व्यवस्था का उद्देश्य सरकारी सेवाओं में नियुक्ति से पहले अभ्यर्थियों की पृष्ठभूमि की जांच को अधिक व्यवस्थित बनाना है। इसके तहत राज्य सरकार के विभागों के अलावा निगमों, परिषदों, शैक्षणिक संस्थानों, स्वायत्त निकायों, सरकारी उपक्रमों, पंचायतों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती से होने वाली नियुक्तियों को शामिल किया गया है। पहले से लंबित चरित्र सत्यापन के मामलों का निपटारा भी नई नीति के प्रावधानों के अनुसार किया जाएगा।

सरकार के निर्देशों के मुताबिक, चयनित अभ्यर्थियों को चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने से पहले प्रोविजनल नियुक्ति पत्र जारी किया जा सकेगा। हालांकि, यह व्यवस्था नियुक्ति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए होगी और इसे अंतिम सत्यापन का विकल्प नहीं माना जाएगा। संवेदनशील और सुरक्षा से जुड़े पदों पर नियुक्ति के लिए विस्तृत जांच की आवश्यकता बनी रहेगी। संबंधित विभागों को पद की प्रकृति और सुरक्षा संबंधी जरूरतों के अनुसार आवश्यक सावधानियां बरतनी होंगी।

नई नीति में यह भी स्पष्ट किया गया है कि केवल राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी उम्मीदवार को सरकारी नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी तरह, सिर्फ प्राथमिकी दर्ज होने या किसी मामले की जांच लंबित रहने से अभ्यर्थी स्वतः अयोग्य नहीं हो जाएगा। किसी उम्मीदवार के संबंध में निर्णय लेते समय संबंधित तथ्यों, मामले की प्रकृति और उपलब्ध रिकॉर्ड का आकलन करना महत्वपूर्ण होगा। इससे यह स्पष्ट होता है कि नियमों का उद्देश्य केवल आरोपों के आधार पर नियुक्ति रोकना नहीं, बल्कि सत्यापन के दौरान सामने आने वाली परिस्थितियों की जांच करना है।

चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने के लिए पुलिस को निर्धारित अवधि के भीतर रिपोर्ट उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पुलिस को सत्यापन रिपोर्ट 30 दिनों के भीतर देनी होगी। इससे नियुक्ति प्रक्रिया में अनावश्यक देरी कम करने में मदद मिलने की उम्मीद है। वहीं, पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत कर्मचारियों के लिए नए सिरे से चरित्र सत्यापन कराना अनिवार्य नहीं होगा।

सरकार की इस पहल के बाद हिंसक गतिविधियों में संलिप्तता और सरकारी नौकरी के लिए पात्रता के निर्धारण को लेकर चर्चा भी महत्वपूर्ण हो गई है। ऐसे मामलों में यह तय करना जरूरी होगा कि किसी अभ्यर्थी की भूमिका क्या थी, आरोपों के समर्थन में किस तरह के तथ्य उपलब्ध हैं और संबंधित नियम उस पर कैसे लागू होते हैं। केवल विरोध प्रदर्शन में शामिल होने, राजनीतिक मत रखने या किसी संगठन से वैचारिक सहमति रखने को हिंसक गतिविधियों में भागीदारी के समान नहीं माना जा सकता। प्रत्येक मामले का आकलन तथ्यों और लागू कानूनी प्रावधानों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।

उत्तर प्रदेश सरकार की नई व्यवस्था का असर आने वाली सीधी भर्तियों के साथ-साथ पहले से लंबित सत्यापन मामलों पर भी पड़ेगा। अभ्यर्थियों के लिए नियुक्ति से पहले आवश्यक दस्तावेज और सही जानकारी उपलब्ध कराना महत्वपूर्ण होगा। वहीं, संबंधित विभागों और पुलिस की जिम्मेदारी होगी कि जांच निर्धारित समय में पूरी हो और निर्णय निष्पक्ष तरीके से लिया जाए। नई नीति के प्रभाव का आकलन इस बात से होगा कि चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी रहती है और पात्र उम्मीदवारों की नियुक्ति में अनावश्यक बाधाएं उत्पन्न हुए बिना नियमों का पालन किस तरह सुनिश्चित किया जाता है।

 

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