• होम
  • उत्तराखंड
  • उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों के खतरे से निपटने की तैयारी

उत्तराखंड में ग्लेशियर झीलों के खतरे से निपटने की तैयारी

देहरादून: उत्तराखंड के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरे को देखते हुए राज्य सरकार निगरानी और आपदा चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की तैयारी में है। सरकार का फोकस ऐसी झीलों की लगातार निगरानी करने और अचानक झील फटने की स्थिति में निचले इलाकों तक समय रहते […]

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • September 6, 2026 2:02 pm IST, Published 35 minutes ago
देहरादून: उत्तराखंड के ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर झीलों से पैदा होने वाले संभावित खतरे को देखते हुए राज्य सरकार निगरानी और आपदा चेतावनी तंत्र को मजबूत करने की तैयारी में है। सरकार का फोकस ऐसी झीलों की लगातार निगरानी करने और अचानक झील फटने की स्थिति में निचले इलाकों तक समय रहते सूचना पहुंचाने पर है। इसके लिए ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) मॉनिटरिंग और अर्ली वार्निंग सिस्टम विकसित किया जाएगा।

इस व्यवस्था की शुरुआत चमोली जिले की वसुंधरा ताल से किए जाने की योजना है। अधिकारियों के अनुसार वसुंधरा ताल को संवेदनशील झीलों में शामिल किया गया है और यहां संभावित खतरे को देखते हुए आधुनिक निगरानी प्रणाली स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। प्रस्तावित सिस्टम झील की स्थिति में होने वाले बदलावों पर नजर रखने के साथ-साथ किसी असामान्य गतिविधि का पता लगाकर चेतावनी जारी करने में मदद करेगा।

वसुंधरा ताल के संबंध में सबसे बड़ी चिंता यह है कि यदि किसी प्राकृतिक कारण से झील का पानी अचानक बाहर निकलता है तो इससे नीचे की ओर स्थित क्षेत्रों में तेज बाढ़ की स्थिति बन सकती है। विशेषज्ञों और प्रशासन के स्तर पर इस तरह की आशंका को गंभीरता से लिया जा रहा है। संभावित प्रभाव वाले क्षेत्रों में लोगों को सुरक्षित करने के लिए समय पर सूचना उपलब्ध कराना इस पूरी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।

राज्य सरकार इस सिस्टम को केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI), रुड़की के सहयोग से विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इसका उद्देश्य केवल एक झील पर निगरानी तक सीमित रहना नहीं, बल्कि भविष्य में उत्तराखंड की अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों के लिए भी इसी तरह की तकनीकी व्यवस्था तैयार करना है।

प्रस्तावित अर्ली वार्निंग सिस्टम में झील और उसके आसपास की परिस्थितियों पर लगातार नजर रखने वाली तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। इससे जलस्तर, संभावित अस्थिरता और अन्य महत्वपूर्ण संकेतकों में बदलाव को समझने में मदद मिल सकती है। किसी गंभीर स्थिति के संकेत मिलने पर संबंधित तंत्र को अलर्ट जारी करने की व्यवस्था विकसित की जाएगी, ताकि प्रशासन राहत और बचाव की तैयारी समय रहते शुरू कर सके।

सरकार की योजना के अनुसार वसुंधरा ताल में पहला GLOF मॉनिटरिंग सिस्टम सितंबर के तीसरे सप्ताह में स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए 20 से 30 सितंबर के बीच की समयसीमा निर्धारित की गई है। दुर्गम हिमालयी क्षेत्र में उपकरण पहुंचाना और उन्हें स्थापित करना अपने आप में चुनौतीपूर्ण कार्य है। मौसम, ऊंचाई और भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए सिस्टम की स्थापना के दौरान तकनीकी और लॉजिस्टिक तैयारियों पर भी विशेष ध्यान देना होगा।

उत्तराखंड में ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों का महत्व पर्यावरणीय दृष्टि से भी काफी अधिक है। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी क्षेत्र में बर्फ और ग्लेशियरों की स्थिति में बदलाव को लेकर वैज्ञानिक संस्थान लगातार अध्ययन कर रहे हैं। ऐसे में ग्लेशियर झीलों की निगरानी को आपदा प्रबंधन से जोड़ना भविष्य की तैयारियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

GLOF की घटनाएं अचानक सामने आ सकती हैं और इनका प्रभाव नदी घाटियों में तेजी से फैल सकता है। इसलिए केवल घटना के बाद राहत और बचाव पर निर्भर रहने के बजाय पहले से जोखिम की पहचान, निगरानी और चेतावनी तंत्र तैयार करना जरूरी है। प्रस्तावित सिस्टम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

वसुंधरा ताल में सिस्टम स्थापित होने के बाद इससे मिलने वाले अनुभव और तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल राज्य की अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों की निगरानी व्यवस्था विकसित करने में किया जा सकता है। सरकार का उद्देश्य एक ऐसा तंत्र तैयार करना है, जिससे वैज्ञानिक निगरानी, तकनीकी विश्लेषण और स्थानीय प्रशासन के बीच बेहतर समन्वय कायम हो सके।

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में जहां कई महत्वपूर्ण नदियों का उद्गम हिमालयी क्षेत्रों से होता है, वहां ग्लेशियर झीलों से जुड़े जोखिम की समय रहते पहचान करना आपदा प्रबंधन की बड़ी प्राथमिकता बन गया है। वसुंधरा ताल में प्रस्तावित पहला मॉनिटरिंग सिस्टम इसी व्यापक रणनीति की शुरुआत के तौर पर देखा जा रहा है।

Advertisement