नई दिल्ली: लगभग दो दशक बाद बांग्लादेश मूल की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन एक बार फिर कोलकाता पहुंचने जा रही हैं। यह वापसी केवल एक साहित्यिक कार्यक्रम में भागीदारी भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे उनके लंबे निर्वासन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भारतीय सांस्कृतिक परिदृश्य से जुड़े एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देखा जा रहा है। तसलीमा एक अगस्त को कोलकाता के रवींद्र सदन में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम में हिस्सा लेंगी, जहां कट्टरपंथ और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे विषयों पर चर्चा होने की संभावना है।
जानकारी के अनुसार, पश्चिम बंगाल सरकार उनके कोलकाता में रहने से जुड़े प्रस्ताव पर भी विचार कर सकती है। हालांकि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक निर्णय सामने नहीं आया है। यदि ऐसा होता है तो यह तसलीमा नसरीन के लिए एक भावनात्मक वापसी होगी, क्योंकि वह लंबे समय से कोलकाता को अपना “दूसरा घर” बताती रही हैं।
तसलीमा नसरीन दक्षिण एशिया की चर्चित लेखिकाओं में गिनी जाती हैं। उनकी कई पुस्तकों ने सामाजिक और धार्मिक मुद्दों पर तीखी बहस छेड़ी। इन्हीं विचारों के कारण उन्हें अपने मूल देश बांग्लादेश छोड़ना पड़ा और वर्षों से वे निर्वासन का जीवन जी रही हैं। भारत आने के बाद उन्होंने कोलकाता को अपनी भाषा, संस्कृति और साहित्यिक वातावरण के कारण सबसे उपयुक्त ठिकाना माना।
2007 में तसलीमा की पुस्तक द्विखंडित को लेकर कोलकाता में विरोध प्रदर्शन होने पर वाम मोर्चा सरकार ने किताब पर प्रतिबंध लगा दिया और तनावपूर्ण माहौल के बाद तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के दौरान उन्हें पश्चिम बंगाल छोड़ना पड़ा। इससे पहले, बांग्लादेश में विवादों के चलते देश छोड़ने के बाद वह वर्ष 2004 में कोलकाता आई थीं और इसे अपनी भाषा तथा सांस्कृतिक निकटता के कारण अपना दूसरा घर मानती थीं।
हालांकि, पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद भी उनकी स्थिति में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया। तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में भी उन्हें राज्य में स्थायी रूप से रहने की अनुमति नहीं मिल सकी। इस दौरान उन्होंने अमेरिका और यूरोप में भी लंबा समय बिताया, लेकिन बाद में भारत लौट आईं।
तसलीमा कई मौकों पर यह कह चुकी हैं कि बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल की साझा भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत उन्हें कोलकाता से विशेष लगाव महसूस कराती है। इसी वजह से उन्होंने हमेशा इस शहर को अपने “दूसरे घर” के रूप में देखा और यहां फिर से बसने की इच्छा भी सार्वजनिक रूप से व्यक्त की। इसके बाद उन्होंने भारत के विभिन्न हिस्सों में समय बिताया और बाद में विदेशों का भी रुख किया।
अमेरिका और यूरोप में कई वर्षों तक रहने के बाद तसलीमा फिर भारत लौटीं। पिछले लगभग एक दशक से वे मुख्य रूप से नई दिल्ली में रेजिडेंट परमिट के आधार पर रह रही हैं। समय-समय पर उनके निवास परमिट का नवीनीकरण होता रहा है। इस दौरान उन्होंने कई बार सार्वजनिक रूप से कहा कि उनकी इच्छा कोलकाता में रहने की है, क्योंकि वहां की भाषा, संस्कृति और साहित्य से उनका गहरा जुड़ाव है।
एक अगस्त को प्रस्तावित कार्यक्रम को लेकर साहित्यिक और सामाजिक हलकों में काफी उत्सुकता है। कार्यक्रम का आयोजन रवींद्र सदन में किया जाएगा, जहां देशभर से लेखक, कवि और बुद्धिजीवी शामिल हो सकते हैं। कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कट्टरपंथ के खिलाफ संवाद, लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर चर्चा को आगे बढ़ाना बताया जा रहा है। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि राज्य के वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति की संभावना है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
तसलीमा नसरीन का साहित्य हमेशा सामाजिक बदलाव, महिलाओं के अधिकार, धार्मिक कट्टरता और मानवाधिकार जैसे विषयों के इर्द-गिर्द रहा है। उनके लेखन ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई, लेकिन इसके साथ ही उन्हें लगातार विरोध और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा। यही कारण है कि उनका जीवन लंबे समय से निर्वासन और सुरक्षा व्यवस्था के बीच गुजर रहा है।
यदि भविष्य में उन्हें कोलकाता में रहने की अनुमति मिलती है, तो यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं होगा, बल्कि साहित्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक विमर्श का भी हिस्सा बनेगा। करीब 20 वर्षों बाद तसलीमा नसरीन का कोलकाता पहुंचना साहित्य जगत और उनके समर्थकों के लिए एक भावनात्मक क्षण हो सकता है। अब सभी की नजर इस बात पर है कि कार्यक्रम के बाद उनके भविष्य के निवास को लेकर क्या निर्णय सामने आता है।