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तमिलनाडु सरकार को सुप्रीम कोर्ट में झटका, ईवी वेलु की राहत बरकरार

नई दिल्ली: तमिलनाडु की राजनीति में एक अहम कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। भ्रष्टाचार के एक चर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ईवी वेलु को मिली अंतरिम राहत में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही तमिलनाडु सरकार को अदालत से तत्काल राहत नहीं मिल सकी। […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • July 16, 2026 10:38 am IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली: तमिलनाडु की राजनीति में एक अहम कानूनी घटनाक्रम सामने आया है। भ्रष्टाचार के एक चर्चित मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डीएमके के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री ईवी वेलु को मिली अंतरिम राहत में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही तमिलनाडु सरकार को अदालत से तत्काल राहत नहीं मिल सकी। सर्वोच्च अदालत ने राज्य सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया, जिसमें मद्रास हाई कोर्ट द्वारा दी गई अंतरिम सुरक्षा को हटाने की मांग की गई थी।

यह मामला सड़क अवसंरचना परियोजनाओं में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है। आरोप है कि पूर्व मंत्री के कार्यकाल के दौरान कुछ परियोजनाओं में नियमों का पालन किए बिना भुगतान किया गया, जिससे सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका जताई गई। इसी आधार पर राज्य की भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी ने मामला दर्ज किया था। हालांकि, इस कार्रवाई के खिलाफ ईवी वेलु ने मद्रास हाई कोर्ट का रुख किया, जहां उन्हें अंतरिम राहत मिली और गिरफ्तारी पर रोक लगा दी गई।

राज्य सरकार ने हाई कोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। सरकार का तर्क था कि हाई कोर्ट ने जिस प्रकार गिरफ्तारी पर व्यापक रोक लगाई है, वह न्यायिक प्रक्रिया के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अदालत में दलील दी कि याचिका केवल आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देने से संबंधित थी, न कि अग्रिम जमानत से। ऐसे में गिरफ्तारी पर पूर्ण रोक का आदेश देना उचित नहीं माना जा सकता।

सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि सर्वोच्च अदालत पहले भी कई मामलों में स्पष्ट कर चुकी है कि आपराधिक मामलों को रद्द करने की मांग और अग्रिम जमानत की राहत दो अलग-अलग कानूनी प्रक्रियाएं हैं। इसलिए किसी याचिका पर सुनवाई के दौरान स्वतः गिरफ्तारी पर रोक लगाना न्यायिक परंपरा के अनुरूप नहीं है।

दूसरी ओर, ईवी वेलु की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने राज्य सरकार के तर्कों का विरोध किया। उन्होंने अदालत के सामने कहा कि उनके मुवक्किल के खिलाफ दर्ज मामला राजनीतिक परिस्थितियों से प्रभावित प्रतीत होता है। उनका कहना था कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के बाद पूर्व मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू होना राजनीतिक प्रतिशोध की आशंका को मजबूत करता है। उन्होंने यह भी कहा कि जांच प्रक्रिया कानून के अनुसार चलनी चाहिए, लेकिन किसी व्यक्ति के अधिकारों की भी रक्षा जरूरी है।

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि मद्रास हाई कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि ईवी वेलु को जांच में पूरा सहयोग करना होगा। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस शर्त को दोहराते हुए कहा कि जांच एजेंसी द्वारा बुलाए जाने पर संबंधित व्यक्ति का सहयोग करना अनिवार्य होगा।

सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी संकेत दिया कि इस स्तर पर हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। इसी आधार पर राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी गई। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट किया कि जांच की प्रक्रिया जारी रहेगी और संबंधित पक्षों को कानून के अनुसार सहयोग करना होगा।

भ्रष्टाचार का यह मामला उस समय से जुड़ा है जब ईवी वेलु राज्य सरकार में लोक निर्माण विभाग (PWD) की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। आरोप है कि सड़क परियोजनाओं में काम पूरा होने से पहले ही ठेकेदारों को भुगतान कर दिया गया, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचा। इन आरोपों की शिकायत सबसे पहले वर्ष 2022 में एक सामाजिक संगठन ने की थी। बाद में जांच एजेंसी ने उपलब्ध शिकायतों और दस्तावेजों के आधार पर मामला दर्ज किया।

यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन के बाद पूर्व सरकार के मंत्रियों के खिलाफ कई मामलों की जांच तेज हुई है। विपक्ष का आरोप है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में निष्पक्ष जांच कराना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है।

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद फिलहाल ईवी वेलु को गिरफ्तारी से मिली अंतरिम राहत बरकरार रहेगी, लेकिन उन्हें जांच एजेंसियों के साथ पूरा सहयोग करना होगा। अब इस मामले की आगे की सुनवाई और मद्रास हाई कोर्ट में लंबित याचिका पर आने वाला फैसला ही तय करेगा कि जांच और कानूनी प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि सर्वोच्च अदालत ने इस चरण में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए हाई कोर्ट के आदेश को यथावत रहने दिया है।

 

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