• होम
  • देश
  • सियासत में नया समीकरण, 362 के आंकड़े पर टिकी कहानी

सियासत में नया समीकरण, 362 के आंकड़े पर टिकी कहानी

नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र इस बार केवल विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि देश की राजनीति की दिशा तय करने वाला सत्र साबित हो सकता है। केंद्र सरकार कई अहम संविधान संशोधन विधेयकों को संसद में लाने की तैयारी में है। इनमें महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण, लोकसभा और विधानसभा सीटों […]

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • July 16, 2026 11:54 am IST, Published 47 minutes ago

नई दिल्ली: संसद का मानसून सत्र इस बार केवल विधायी कार्यवाही तक सीमित नहीं रहने वाला, बल्कि देश की राजनीति की दिशा तय करने वाला सत्र साबित हो सकता है। केंद्र सरकार कई अहम संविधान संशोधन विधेयकों को संसद में लाने की तैयारी में है। इनमें महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण, लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन तथा कुछ अन्य संवैधानिक प्रावधानों से जुड़े प्रस्ताव प्रमुख हैं। लेकिन इन सभी योजनाओं की सफलता का आधार एक ही है की संसद में विशेष बहुमत का आंकड़ा।

सरकार अच्छी तरह जानती है कि संविधान संशोधन किसी साधारण विधेयक की तरह पारित नहीं कराया जा सकता। इसके लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। ऐसे में सत्ता पक्ष फिलहाल केवल विधेयक पेश करने के बजाय यह सुनिश्चित करने में जुटा है कि मतदान के समय उसके पास पर्याप्त समर्थन मौजूद हो।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि सरकार सहयोगी दलों के साथ लगातार संवाद बनाए हुए है। इसके अलावा कुछ ऐसे दलों और सांसदों से भी संपर्क साधा जा रहा है, जिनका रुख अब तक पूरी तरह स्पष्ट नहीं माना जा रहा। सरकार इस बार किसी भी तरह का राजनीतिक जोखिम लेने के मूड में दिखाई नहीं दे रही है।

विशेष बहुमत का गणित बनेगा सबसे बड़ी चुनौती

संविधान संशोधन के लिए संसद में केवल साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं होता। ऐसे विधेयकों को पारित कराने के लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में दो-तिहाई समर्थन के साथ-साथ सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत का भी समर्थन आवश्यक होता है। यही वजह है कि सरकार हर संख्या का सावधानी से आकलन कर रही है।

सूत्रों के अनुसार लोकसभा में आवश्यक समर्थन जुटाना सरकार के लिए अपेक्षाकृत कठिन माना जा रहा है,क्योकि लोकसभा की कुल निर्धारित सदस्य संख्या 543 है। वर्तमान में तीन सीटें रिक्त होने के कारण प्रभावी सदस्य संख्या 540 है। संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है। यदि सभी प्रभावी सदस्य सदन में मौजूद हों, तो दो-तिहाई समर्थन का आंकड़ा लगभग 360 सदस्यों तक पहुंचता है।

इससे पहले 131वें संविधान संशोधन बिल में वोटिंग के दौरान 528 सांसदों ने हिस्सा लिया था। उस दौरान सत्ता पक्ष के गठबंधन को 298 मत मिले, जबकि विपक्ष के पक्ष में 230 वोट पड़े। इसके बाद से राजनीतिक समीकरणों में लगातार बदलाव देखने को मिले हैं और सत्ता पक्ष अपने समर्थन आधार को और मजबूत करने की कोशिश में जुटा है। ऐसे में आगामी संविधान संशोधन विधेयकों के दौरान सदन का संख्या बल और सहयोगी दलों का रुख निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

जबकि राज्यसभा में स्थिति कुछ हद तक बेहतर बताई जा रही है। इसी कारण सत्ता पक्ष कोई जल्दबाजी नहीं करना चाहता। रणनीति यह है कि विधेयक तभी सदन में पेश किए जाएं जब उनके पारित होने की संभावना पूरी तरह सुनिश्चित हो।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस बार केवल सहयोगी दल ही नहीं, बल्कि कुछ क्षेत्रीय दलों की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है। DMK, समाजवादी पार्टी, एनसीपी (शरद पवार गुट) और अन्य दलों के रुख पर सभी की नजर बनी हुई है। हालांकि इन दलों की ओर से किसी संभावित समर्थन या विरोध को लेकर अभी तक कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई है। इस बीच विपक्षी दल भी सरकार की रणनीति पर नजर बनाए हुए हैं। यदि सरकार आवश्यक संख्या नहीं जुटा पाती है, तो संभावना है कि इन विधेयकों को भविष्य के लिए टाल दिया जाए।

बहुमत के गणित पर टिकी रणनीति

हाल के राजनीतिक घटनाक्रमों के बाद संसद के भीतर संख्या बल को लेकर नई चर्चाएं तेज हो गई हैं। TMC के 28 में से 20 सांसदों ने ममता बनर्जी का साथ छोड़कर पाला बदल लिया,दूसरी तरफ शिवसेना (UTB) के 6 सांसदों ने एकनाथ शिंदे की शिवसेना के साथ विलय कर लिया है |

जानकारों का  मानना है कि यदि  कुछ क्षेत्रीय दलों या उनके सांसदों का समर्थन सत्ता पक्ष को मिलता है, तो लोकसभा में NDA का संख्या बल और मजबूत हो सकता है। इसी तरह कुछ दलों के तटस्थ रहने, अनुपस्थित रहने या मतदान के दौरान अलग रुख अपनाने की स्थिति भी संविधान संशोधन जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों के परिणाम को प्रभावित कर सकती है।

लोकसभा में विशेष बहुमत हासिल करने के लिए सरकार केवल अपने सहयोगी दलों पर ही नहीं, बल्कि अन्य दलों के संभावित समर्थन और सदन में मतदान के दौरान बनने वाले समीकरणों पर भी नजर बनाए हुए है। राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कुछ क्षेत्रीय दल मुद्दों के आधार पर समर्थन देने का फैसला कर सकते हैं, हालांकि इस संबंध में किसी भी दल की ओर से औपचारिक घोषणा नहीं की गई है।

वही पर संसदीय सत्र में सबसे बड़ी भूमिका केवल संख्या बल की नहीं, बल्कि उस दिन सदन में मौजूद सदस्यों, उनके मतदान के रुख और राजनीतिक रणनीति की होगी। यही कारण है कि सरकार और विपक्ष दोनों अपने-अपने स्तर पर समर्थन जुटाने और संसदीय गणित को अपने पक्ष में करने की कोशिश में लगे हुए हैं।

वही पर सरकार के एजेंडे में सबसे अधिक चर्चा महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले संविधान संशोधन प्रस्ताव की हो रही है। इसके साथ ही लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन से जुड़ा प्रस्ताव भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार कुछ अन्य संवैधानिक संशोधनों पर भी विचार कर रही है। इनमें हिरासत की स्थिति में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्रियों के पद से जुड़े कानूनी प्रावधानों में बदलाव को लेकर संसदीय समिति की सिफारिशों पर भी चर्चा हो सकती है। हालांकि इन प्रस्तावों को लेकर अभी अंतिम निर्णय सामने नहीं आया है।

राजनीतिक स्तर पर भी यह मानसून सत्र बेहद अहम माना जा रहा है। यदि सरकार आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो कई बड़े संवैधानिक बदलावों का रास्ता खुल सकता है। वहीं यदि बहुमत का गणित साथ नहीं देता, तो सरकार इन प्रस्तावों को आगे के लिए टाल सकती है।

आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि सरकार अपने सहयोगियों और अन्य दलों का कितना समर्थन जुटा पाती है। संसद का यह सत्र केवल कानून बनाने की प्रक्रिया नहीं होगा, बल्कि यह सत्ता पक्ष की राजनीतिक रणनीति, विपक्ष की एकजुटता और संसदीय गणित तीनों की बड़ी परीक्षा भी साबित हो सकता है। फिलहाल इतना तय है कि इस बार संसद में बहस केवल विधेयकों पर नहीं, बल्कि बहुमत के गणित पर भी केंद्रित रहेगी।

Advertisement