PDA में ‘पंडित’ की एंट्री, मायावती ने सपा पर बोला तीखा हमला

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरणों को साधने की कोशिशें तेज होती दिखाई दे रही हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने चर्चित PDA फॉर्मूले में ‘पंडित’ को भी शामिल करने की बात कही है। उनके इस नए राजनीतिक संदेश के बाद बहुजन समाज पार्टी की […]

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  • August 8, 2026 2:49 pm IST, Published 44 minutes ago

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले जातीय समीकरणों को साधने की कोशिशें तेज होती दिखाई दे रही हैं। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने चर्चित PDA फॉर्मूले में ‘पंडित’ को भी शामिल करने की बात कही है। उनके इस नए राजनीतिक संदेश के बाद बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने समाजवादी पार्टी पर तीखा हमला बोला है। मायावती ने सर्वसमाज के लोगों को सपा की राजनीति से सावधान रहने की अपील करते हुए इसे चुनावी रणनीति का हिस्सा बताया है।

अखिलेश यादव ने हाल ही में ब्राह्मण समाज से जुड़े एक कार्यक्रम में PDA के अपने सामाजिक समीकरण को विस्तार देने का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि PDA में ‘P’ का संबंध पंडित से भी है। समाजवादी पार्टी की ओर से ब्राह्मण समाज के बीच पहुंच बढ़ाने की यह कोशिश ऐसे समय में सामने आई है, जब उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दल अपने-अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं।

अखिलेश यादव का PDA फॉर्मूला अब तक पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को एक साथ जोड़ने की राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जाता रहा है। अब इसमें पंडित यानी ब्राह्मण समाज को भी जोड़ने का संदेश देकर सपा अपने सामाजिक आधार को व्यापक बनाने की कोशिश करती नजर आ रही है। राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में यह कदम खास तौर पर उस बड़े सामाजिक समूह तक पहुंच बनाने की कोशिश है, जिसकी चुनावी राजनीति में उत्तर प्रदेश में लंबे समय से अहम भूमिका रही है।

मायावती ने अखिलेश यादव के इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा कि समाजवादी पार्टी को लेकर सर्वसमाज के लोगों को सावधान रहने की जरूरत है। उन्होंने आरोप लगाया कि सपा समय और राजनीतिक जरूरत के हिसाब से अपनी रणनीति बदलती रही है। मायावती ने सपा के नए ब्राह्मण संपर्क अभियान को राजनीतिक अवसरवाद से जोड़ते हुए कहा कि चुनाव करीब आने पर अलग-अलग सामाजिक समूहों को जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

बसपा प्रमुख ने अपने बयान में यह भी दावा किया कि उनकी पार्टी की राजनीति किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं है। मायावती लंबे समय से सर्वसमाज की राजनीति का दावा करती रही हैं और ब्राह्मण समाज को भी बसपा के सामाजिक समीकरण में महत्वपूर्ण स्थान देती रही हैं। ऐसे में सपा की ओर से ब्राह्मणों को साधने की कोशिश को बसपा अपने राजनीतिक प्रभाव के लिए चुनौती के रूप में देख रही है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर सपा की सक्रियता इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि अखिलेश यादव इससे पहले PDA के जरिए पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को जोड़ने पर जोर देते रहे हैं। अब ब्राह्मण समाज को भी इस राजनीतिक संदेश में जगह देने से सपा के सामाजिक गठजोड़ को व्यापक करने की कोशिश के संकेत मिल रहे हैं। आने वाले समय में ब्राह्मण वोटरों को लेकर सपा और बसपा के बीच राजनीतिक बयानबाजी और तेज हो सकती है। दोनों दल उत्तर प्रदेश में अपने-अपने सामाजिक आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। भाजपा भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है, क्योंकि ब्राह्मण मतदाताओं का रुख राज्य की चुनावी राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है।

फिलहाल अखिलेश यादव के PDA में ‘पंडित’ को शामिल करने के बयान ने उत्तर प्रदेश की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। सपा इसे सामाजिक विस्तार की रणनीति के रूप में आगे बढ़ाती है या यह केवल चुनावी संदेश तक सीमित रहता है, यह आने वाले महीनों में स्पष्ट होगा। दूसरी ओर मायावती ने जिस तरह सर्वसमाज को सावधान रहने का संदेश दिया है, उससे संकेत मिल रहा है कि 2027 के चुनाव से पहले जातीय और सामाजिक समीकरणों को लेकर राजनीतिक मुकाबला और अधिक तेज होने वाला है।

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