भोपाल: मध्य प्रदेश के सीहोर जिले स्थित देवबड़ला पुरातत्व स्थल से मिली 11वीं सदी की एक दुर्लभ माता दुर्गा की प्रतिमा ने पुरातत्वविदों का ध्यान आकर्षित किया है। इस प्रतिमा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें देवी दुर्गा ललितासन मुद्रा में विराजमान हैं, जो भारतीय मूर्तिकला में बेहद दुर्लभ मानी जाती है।
प्रतिमा में देवी दुर्गा के चरणों के पास उनकी सवारी शेर दर्शाया गया है। वहीं देवी के सिर के दोनों ओर बनी नौ आकृतियां उनके नवदुर्गा स्वरूपों का प्रतीक हैं। इन आकृतियों के हाथों में वही आयुध (हथियार) दिखाई देते हैं जिनका उल्लेख प्राचीन शिल्प ग्रंथों में मिलता है।
पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतिमा परमारकालीन (11वीं सदी) की है। ललितासन मुद्रा में देवी की प्रतिमाएं आठवीं से 12वीं शताब्दी के बीच की मानी जाती हैं और देश में ऐसी मूर्तियां बहुत कम संख्या में मिलती हैं।
यह दुर्लभ प्रतिमा वर्ष 2023 में एक प्राचीन मंदिर के गर्भगृह के मलबे से प्राप्त हुई थी। देवबड़ला पुरातत्व स्थल पर कभी करीब 15 मंदिर हुआ करते थे, जो समय के साथ ध्वस्त हो गए और उनकी मूर्तियां जमीन में दब गईं।
देवबड़ला में वर्ष 2016 से चल रही खुदाई के दौरान अब तक 15 प्राचीन मंदिरों के अवशेष मिले हैं। इनमें से बिलकेश्वर महादेव मंदिर और विष्णु मंदिर का जीर्णोद्धार भी कराया जा चुका है। खुदाई में मिली कई दुर्लभ मूर्तियों को स्थानीय संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है।
पुरातत्व विभाग अब इन सभी प्राचीन मूर्तियों की 3D स्कैनिंग कर रहा है। ज्ञान भारतम मिशन के तहत इनका विस्तृत विवरण तैयार कर डिजिटल पोर्टल पर अपलोड किया जाएगा, ताकि देश और दुनिया के लोग इन दुर्लभ धरोहरों की जानकारी प्राप्त कर सकें।
देवबड़ला संग्रहालय में एक ही पत्थर के स्तंभ पर शिव और विष्णु की संयुक्त कलाकृति, तीन मुख वाले ब्रह्मा की प्रतिमा तथा तपस्या मुद्रा में महागौरी की दुर्लभ प्रतिमा भी संरक्षित है। विशेषज्ञों के अनुसार ये सभी मूर्तियां परमारकालीन कला और शिल्पकला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं।
पुरातत्व विभाग का कहना है कि इन दुर्लभ प्रतिमाओं का वैज्ञानिक अध्ययन और डिजिटल संरक्षण भारतीय सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।