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मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट गंभीर, केंद्र को नोटिस जारी

नई दिल्ली: मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह (पोलिगैमी) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह मामला केवल विवाह संबंधी कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय से भी जुड़ा […]

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Supreme Court on MuslimWomen
Gauravshali Bharat News
  • July 31, 2026 1:17 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: मुस्लिम समुदाय में बहुविवाह (पोलिगैमी) पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। यह मामला केवल विवाह संबंधी कानूनों तक सीमित नहीं है, बल्कि महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों, लैंगिक समानता और सामाजिक न्याय से भी जुड़ा माना जा रहा है। अदालत के इस कदम के बाद बहुविवाह, निकाह और तलाक से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर राष्ट्रीय स्तर पर नई बहस शुरू होने की संभावना है।

यह याचिका भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (बीएमएमए) की ओर से दायर की गई है। संगठन ने अदालत से मांग की है कि मुस्लिम पुरुषों द्वारा एक से अधिक विवाह करने की प्रथा पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए और इसे कानून के तहत दंडनीय अपराध घोषित किया जाए। इसके साथ ही पति द्वारा छोड़ी गई महिलाओं के लिए आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने, भरण-पोषण के स्पष्ट प्रावधान बनाने तथा निकाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण लागू करने की भी मांग की गई है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में उठाए गए मुद्दों को गंभीर मानते हुए केंद्र सरकार से उसका पक्ष मांगा। अदालत ने संकेत दिया कि वह इस मामले में संवैधानिक और कानूनी पहलुओं की विस्तृत समीक्षा करेगी। अब केंद्र सरकार को तय समय के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करना होगा, जिसके बाद मामले की आगे सुनवाई होगी।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लेकर चल रही बहस अपनी जगह है, लेकिन मुस्लिम महिलाओं की वर्तमान समस्याओं के समाधान के लिए अलग और प्रभावी कानूनी सुधार आवश्यक हैं। उनका तर्क है कि केवल यूसीसी लागू होने की संभावना पर निर्भर रहने के बजाय वर्तमान कानूनों में ऐसे बदलाव किए जाने चाहिए, जो महिलाओं को तत्काल और प्रभावी कानूनी सुरक्षा प्रदान करें।

बीएमएमए ने अपनी याचिका में संगठन द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण का भी उल्लेख किया है। संगठन का दावा है कि बड़ी संख्या में मुस्लिम महिलाओं ने बहुविवाह का विरोध किया और इसे समाप्त करने की मांग की। याचिका के अनुसार कई महिलाओं ने शिकायत की कि उनकी सहमति के बिना दूसरी शादी कर ली गई, जिसके बाद उन्हें आर्थिक उपेक्षा, मानसिक उत्पीड़न और सामाजिक असुरक्षा का सामना करना पड़ा। संगठन का कहना है कि ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं और उनके बच्चों का भविष्य भी प्रभावित होता है।

याचिका में यह भी कहा गया है कि वर्तमान व्यवस्था में कई महिलाओं को अपने अधिकारों के लिए लंबी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। यदि निकाह और तलाक का अनिवार्य पंजीकरण सुनिश्चित किया जाए तो विवाह संबंधी विवादों में पारदर्शिता बढ़ेगी और महिलाओं के अधिकारों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी। इसी उद्देश्य से बीएमएमए ने “मुस्लिम मॉडिफाइड कोड” लागू करने का सुझाव भी दिया है, जिसमें विवाह, तलाक, भरण-पोषण और आर्थिक अधिकारों से जुड़े स्पष्ट प्रावधान शामिल हों।

संगठन ने विशेष रूप से उन महिलाओं की स्थिति पर चिंता जताई है जिन्हें पति दूसरी शादी के बाद छोड़ देते हैं या आर्थिक रूप से असहाय छोड़ दिया जाता है। याचिका में मांग की गई है कि ऐसी महिलाओं के लिए भरण-पोषण, आर्थिक सहायता और सामाजिक सुरक्षा की कानूनी गारंटी सुनिश्चित की जाए, ताकि उन्हें जीवनयापन के लिए संघर्ष न करना पड़े।

यह मामला व्यक्तिगत कानूनों और संविधान के तहत मिले समानता तथा गरिमा के अधिकार के बीच संतुलन स्थापित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो सकता है। अदालत के समक्ष यह प्रश्न भी रहेगा कि व्यक्तिगत धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के मौलिक अधिकारों के बीच किस प्रकार संतुलन बनाया जाए।

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अभी इस मामले के गुण-दोष पर कोई अंतिम टिप्पणी नहीं की है। फिलहाल अदालत ने केवल केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। अंतिम निर्णय विस्तृत सुनवाई, केंद्र सरकार के जवाब और सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद ही होगा।

 

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