नई दिल्ली। कभी बच्चों से पूछा जाता था कि बड़े होकर क्या बनोगे, तो डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट, वैज्ञानिक या शिक्षक जैसे जवाब सबसे आम होते थे। लेकिन डिजिटल दौर ने बच्चों के सपनों की दिशा तेजी से बदल दी है। अब कैमरा, मोबाइल, वीडियो और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म भी बच्चों के लिए करियर की कल्पना का हिस्सा बनते जा रहे हैं। एक हालिया अध्ययन से जुड़ी रिपोर्टों में बच्चों के बीच YouTuber और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की बढ़ती इच्छा सामने आई है।
सोशल मीडिया की चमक-दमक, लोकप्रियता, फॉलोअर्स और कम उम्र में सफलता की कहानियां बच्चों को खास तौर पर आकर्षित कर रही हैं। यही वजह है कि कई बच्चे पारंपरिक नौकरियों के बजाय कंटेंट क्रिएटर, YouTuber या सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने को भविष्य का विकल्प मानने लगे हैं।
बचपन का सवाल बदला, जवाब भी बदल गया
एक समय था जब माता-पिता बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी अधिकारी बनने की सलाह देते थे। करियर का मतलब पढ़ाई, डिग्री और नौकरी से जोड़ा जाता था। लेकिन स्मार्टफोन और इंटरनेट की आसान पहुंच ने इस सोच को बदल दिया है।
आज बच्चे अपने आसपास ऐसे लोगों को देखते हैं जो वीडियो बनाकर लोकप्रिय हो रहे हैं, ब्रांड प्रमोशन कर रहे हैं और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए कमाई कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली सफलता की ये कहानियां बच्चों की कल्पना को प्रभावित कर रही हैं।
ब्रिटेन में बच्चों के करियर सपनों से जुड़े एक सर्वे में डॉक्टर 18 प्रतिशत बच्चों की पसंद थे, जबकि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर 17 प्रतिशत और YouTuber 14 प्रतिशत बच्चों की पसंद के रूप में सामने आए थे। हालांकि यह सर्वे पुराना है और इसे आज के सभी बच्चों पर लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन यह डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव का शुरुआती संकेत जरूर देता है।
सोशल मीडिया ने सफलता की परिभाषा बदली
डिजिटल दुनिया में सफलता अब केवल अच्छी नौकरी या बड़ी कंपनी में काम करने तक सीमित नहीं है। फॉलोअर्स की संख्या, वीडियो के व्यूज, लाइक्स, कमेंट और वायरल होने की क्षमता भी लोकप्रियता और सफलता के नए पैमाने बन चुके हैं।
बच्चों के लिए यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे कम उम्र से ही वीडियो कंटेंट देखते हैं। वे अपने पसंदीदा क्रिएटर्स की जीवनशैली, कपड़े, गैजेट, यात्रा और लोकप्रियता को करीब से देखते हैं। ऐसे में उनके मन में यह धारणा बन सकती है कि कैमरे के सामने आकर वीडियो बनाना भी एक आकर्षक करियर हो सकता है।
कुछ बच्चों के लिए यह केवल मनोरंजन नहीं रहता, बल्कि वे इसे भविष्य के पेशे के रूप में देखने लगते हैं।
सात साल की उम्र में भी दिख रहा है असर
शोध और अकादमिक अध्ययनों में बच्चों के सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की प्रवृत्ति को लेकर गंभीर चर्चा हो रही है। कुछ बच्चे बहुत कम उम्र में ही सोशल मीडिया कंटेंट का हिस्सा बन जाते हैं। कई मामलों में माता-पिता उनके अकाउंट और वीडियो निर्माण की जिम्मेदारी संभालते हैं।
इसे ‘Kidfluencing’ कहा जाता है। इसमें बच्चे वीडियो, फोटो, ब्रांड प्रमोशन, अनबॉक्सिंग, गेमिंग या मनोरंजन से जुड़े कंटेंट में दिखाई दे सकते हैं। कुछ लोकप्रिय चैनलों में बच्चों की भूमिका इतनी प्रमुख होती है कि उनका नाम ही चैनल की पहचान बन जाता है।
यही वह बिंदु है जहां विशेषज्ञ बच्चों की निजता, पढ़ाई, मानसिक दबाव और उनकी सहमति जैसे सवालों पर ध्यान देने की जरूरत बताते हैं।
सिर्फ कमाई नहीं, इसके पीछे है लोकप्रियता का आकर्षण
बच्चों के सोशल मीडिया करियर की ओर आकर्षित होने के पीछे सिर्फ पैसा ही कारण नहीं है। लोकप्रियता, पहचान, फॉलोअर्स और दूसरे लोगों का ध्यान भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
एक पुराने सर्वे में बच्चों के करियर विकल्पों के बारे में पूछे जाने पर माता-पिता ने बताया था कि उनके बच्चों के लिए पैसा और प्रसिद्धि भी नौकरी चुनने के कारणों में शामिल थे।
सोशल मीडिया इन दोनों चीजों को एक साथ दिखाता है। कोई बच्चा वीडियो वायरल होते देखता है और उसे लगता है कि कुछ ही समय में हजारों या लाखों लोग उसे पहचान सकते हैं। यही कल्पना पारंपरिक करियर की तुलना में डिजिटल करियर को ज्यादा रोमांचक बना सकती है।
लेकिन वायरल सफलता की तस्वीर अधूरी हो सकती है
सोशल मीडिया पर सफलता जितनी आसान दिखाई देती है, वास्तविकता उतनी सरल नहीं है। हर वीडियो वायरल नहीं होता और हर कंटेंट क्रिएटर बड़ी कमाई नहीं कर पाता। इसके अलावा लगातार कंटेंट बनाने का दबाव, आलोचना, ट्रोलिंग और निजी जीवन के सार्वजनिक हो जाने जैसी चुनौतियां भी सामने आती हैं।
बच्चों के मामले में यह चिंता और बढ़ जाती है। हालिया शोध में kidfluencing से जुड़े बच्चों की निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, आर्थिक शोषण और सहमति जैसे अधिकारों पर जोखिम की चर्चा की गई है।
एक अन्य अध्ययन में भी यह सवाल उठाया गया है कि कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया पर सार्वजनिक पहचान बनाने के लंबे समय तक रहने वाले प्रभावों को पूरी तरह समझ पाने की स्थिति में होते हैं या नहीं।
माता-पिता के लिए भी नई चुनौती
बच्चे अगर YouTuber या कंटेंट क्रिएटर बनना चाहते हैं तो इसे तुरंत गलत या सही मानने के बजाय उनकी रुचि को समझना जरूरी है। वीडियो बनाना अपने आप में रचनात्मक गतिविधि हो सकती है। इससे बच्चों में कहानी कहने, कैमरा संचालन, एडिटिंग, तकनीक और संचार जैसी क्षमताएं विकसित हो सकती हैं।
लेकिन पढ़ाई, खेल, नींद और वास्तविक सामाजिक जीवन की कीमत पर सोशल मीडिया गतिविधियों को बढ़ावा देना उचित नहीं माना जा सकता। माता-पिता को बच्चों की ऑनलाइन निजता और सुरक्षा का भी ध्यान रखना चाहिए।
सबसे जरूरी बात यह है कि बच्चे की पसंद और उसकी उम्र के बीच संतुलन बनाया जाए। आज कोई बच्चा YouTuber बनने की इच्छा रखता है तो जरूरी नहीं कि वह दस साल बाद भी यही करियर चुने। बचपन में करियर की पसंद बदलना सामान्य बात है।
डिजिटल दौर में करियर की नई तस्वीर
डॉक्टर, इंजीनियर, पायलट और वैज्ञानिक जैसे पारंपरिक करियर आज भी बच्चों की पसंद में महत्वपूर्ण हैं। लेकिन इनके साथ डिजिटल कंटेंट, सोशल मीडिया, गेमिंग, डिजाइन, वीडियो प्रोडक्शन और क्रिएटर इकॉनमी जैसे नए विकल्प तेजी से दिखाई दे रहे हैं।
इस बदलाव को केवल बच्चों की पसंद में परिवर्तन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। यह उस समाज का संकेत भी है जहां इंटरनेट ने काम, पहचान और सफलता की परिभाषाओं को बदल दिया है।
बच्चों के सपनों का बदलना स्वाभाविक है, लेकिन उन सपनों को सुरक्षित और संतुलित दिशा देना परिवार, स्कूल और समाज की साझा जिम्मेदारी है। डिजिटल दुनिया बच्चों के लिए अवसरों का नया दरवाजा खोल सकती है, बशर्ते उस दरवाजे के साथ सुरक्षा, शिक्षा और जिम्मेदारी की चाबी भी उनके हाथ में हो।