• होम
  • देश
  • बच्चों के यौन शोषण से जुड़े ऑनलाइन कंटेंट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

बच्चों के यौन शोषण से जुड़े ऑनलाइन कंटेंट पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

केंद्र से मांगा जवाब; केंद्रीकृत रिपोर्टिंग सिस्टम पर भी विचार नई दिल्ली। इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट की कथित मौजूदगी और ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग में सामने आ रही खामियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा कानून मंत्रालय […]

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • August 18, 2026 7:54 am IST, Published 6 hours ago

केंद्र से मांगा जवाब; केंद्रीकृत रिपोर्टिंग सिस्टम पर भी विचार

नई दिल्ली। इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट की कथित मौजूदगी और ऐसे मामलों की रिपोर्टिंग में सामने आ रही खामियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा कानून मंत्रालय से इस मामले में जवाब मांगा है।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. चंद्रन की पीठ ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अलायंस’ और ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कई इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म POCSO कानून के तहत अनिवार्य रिपोर्टिंग नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं।

केंद्रीकृत ऑनलाइन रिपोर्टिंग सिस्टम पर मांगा जवाब

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से यह भी स्पष्ट करने को कहा है कि क्या ऐसा केंद्रीकृत ऑनलाइन सिस्टम तैयार किया जा सकता है, जिसके माध्यम से सोशल मीडिया और अन्य इंटरनेट प्लेटफॉर्म बच्चों के शोषण से जुड़े मामलों की जानकारी सीधे भारतीय कानून प्रवर्तन एजेंसियों को दे सकें।

प्रस्तावित व्यवस्था में डिजिटल सबूत साझा करने की सुविधा भी शामिल हो सकती है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि ऐसे मामलों की पहचान, रिपोर्टिंग, डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने और आईपी विवरण साझा करने के लिए सभी इंटरनेट मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए एक समान स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू किया जाए।

प्लेटफॉर्म की रिपोर्टिंग व्यवस्था पर उठे सवाल

याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, वर्तमान में कई प्लेटफॉर्म ऐसे मामलों की जानकारी अमेरिका स्थित नेशनल सेंटर फॉर मिसिंग एंड एक्सप्लॉइटेड चिल्ड्रन (NCMEC) को भेजते हैं। हालांकि, उनका आरोप है कि POCSO कानून के तहत आवश्यक होने के बावजूद कई मामलों में सूचना सीधे संबंधित विशेष किशोर पुलिस इकाई या स्थानीय पुलिस को नहीं दी जाती।

याचिकाओं में कुछ प्लेटफॉर्म पर ऐसे भुगतान वाले विज्ञापनों की मौजूदगी का भी आरोप लगाया गया है, जो बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से संबंधित आपत्तिजनक सामग्री को बढ़ावा देते हैं।

इंटरनेट कंपनियों को भी बनाया जाएगा पक्षकार

सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को मामले में संबंधित इंटरनेट मीडिया कंपनियों को पक्षकार बनाने की अनुमति दे दी है। अब अदालत इस मामले में प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और मौजूदा रिपोर्टिंग व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी सुनवाई करेगी।

मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को निर्धारित की गई है।

‘सेफ हार्बर’ को लेकर पहले भी दे चुकी है चेतावनी

सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान 2024 के अपने उस रुख को भी याद किया, जिसमें कहा गया था कि यदि कोई इंटरनेट मध्यस्थ POCSO कानून के तहत निर्धारित अनिवार्य रिपोर्टिंग दायित्वों का पालन नहीं करता है, तो वह सूचना प्रौद्योगिकी कानून के तहत मिलने वाली ‘सेफ हार्बर’ सुरक्षा का लाभ खो सकता है।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि सेफ हार्बर सुरक्षा का लाभ लेने के लिए प्लेटफॉर्म को उचित सावधानी संबंधी नियमों का पालन करना होगा। कानूनी टकराव की स्थिति में POCSO कानून को प्राथमिकता दी जाएगी।

कोर्ट ने बच्चों से संबंधित यौन शोषण सामग्री को अपने पास रखने, हटाने में विफल रहने या उसकी रिपोर्ट नहीं करने को लेकर भी सख्त रुख अपनाया है। अदालत के अनुसार, परिस्थितियों के आधार पर ऐसी सामग्री को हटाए या रिपोर्ट किए बिना रखना उसे आगे प्रसारित करने की मंशा का संकेत माना जा सकता है और यह POCSO कानून के तहत अपराध बन सकता है।

Advertisement