नयी दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने देश में हाथियों की आवाजाही के पारंपरिक रास्तों यानी हाथी गलियारों को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि फसल और आजीविका के नुकसान का हवाला देकर राज्य सरकारें हाथियों के प्राकृतिक रास्तों में स्थायी या कृत्रिम अवरोध नहीं खड़े कर सकतीं। अदालत ने केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को देशभर में नए सिरे से सर्वेक्षण कराने और यह पता लगाने का निर्देश दिया है कि कहीं हाथी गलियारों में किसी तरह की बाधा तो नहीं बनाई गई है।
प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में न्यायमूर्ति जायमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। सुनवाई के दौरान पीठ ने वन्यजीवों की प्राकृतिक आवाजाही को लेकर अपना रुख स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि हाथियों के आने-जाने वाले रास्तों को रोकना स्वीकार्य नहीं हो सकता। हाथियों के झुंड भोजन और पानी की तलाश में लंबी दूरी तय करते हैं और उनके पारंपरिक मार्ग कई राज्यों से होकर गुजरते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि किसानों की फसलों को होने वाले नुकसान की समस्या का समाधान हाथियों के रास्ते में बाधा पैदा करके नहीं किया जा सकता। अदालत का कहना था कि यदि किसी इलाके में हाथियों के कारण फसलों को नुकसान हो रहा है, तो उसका समाधान दूसरे वैज्ञानिक और मानवीय तरीकों से तलाशना होगा। वन्यजीवों की आवाजाही को रोकने के लिए रास्ते बंद करना दीर्घकालिक समाधान नहीं है।
सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल का उदाहरण भी सामने आया। अदालत में बताया गया कि नेपाल की ओर से आने वाले हाथी पश्चिम बंगाल के रास्ते झारखंड और अन्य राज्यों की ओर बढ़ते हैं। इसी तरह हरियाणा के यमुनानगर क्षेत्र से हाथियों की आवाजाही उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की ओर होने का उल्लेख किया गया। इससे स्पष्ट होता है कि हाथियों के गलियारे केवल किसी एक राज्य तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कई राज्यों और क्षेत्रों को जोड़ते हैं।
अदालत ने केंद्र को छह सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया है। इस रिपोर्ट में देशभर के हाथी गलियारों की मौजूदा स्थिति, संभावित अवरोधों और उन्हें हटाने या रोकने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी शामिल करने को कहा गया है। केंद्र को यह भी बताना होगा कि अलग-अलग राज्यों में हाथियों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए क्या पहल की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाथियों को भगाने के लिए अपनाए जाने वाले हिंसक और खतरनाक तरीकों पर भी चिंता जताई। अदालत ने ऐसे तरीकों को रोकने के लिए अधिकारियों को आवश्यक कदम उठाने के निर्देश दिए। सुनवाई में आग के गोले, मशालों और अन्य हिंसक तरीकों से हाथियों को खदेड़ने की घटनाओं का जिक्र हुआ। अदालत ने माना कि भीड़ द्वारा हाथियों का पीछा करने या उन्हें डराने के लिए आग का इस्तेमाल करने से स्थिति और गंभीर हो सकती है।
अदालत का जोर इस बात पर है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए वैज्ञानिक और संवेदनशील व्यवस्था विकसित की जाए। हाथियों के प्राकृतिक आवास और उनके पारंपरिक रास्तों को सुरक्षित रखना इस दिशा में महत्वपूर्ण माना गया है। साथ ही किसानों और स्थानीय समुदायों की परेशानियों का समाधान भी प्रभावी तरीके से किए जाने की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद अब केंद्र सरकार और संबंधित राज्य सरकारों की जिम्मेदारी बढ़ गई है। नए सर्वेक्षण से यह पता चल सकेगा कि किन क्षेत्रों में हाथियों के पारंपरिक रास्तों पर बाधाएं मौजूद हैं। रिपोर्ट के आधार पर भविष्य में इन बाधाओं को हटाने और हाथियों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए नई कार्रवाई की जा सकती है।