लखनऊ: यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर बहुजन समाज पार्टी ने अपनी राजनीतिक रणनीति को नए सिरे से धार देना शुरू कर दिया है। पार्टी प्रमुख मायावती ने संगठन को मजबूत करने और अलग-अलग सामाजिक वर्गों तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में कदम तेज किए हैं। इसी क्रम में वरिष्ठ नेता सतीश चंद्र मिश्रा को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दिए जाने की बात सामने आई है। पार्टी की कोशिश है कि आगामी चुनाव में व्यापक सामाजिक आधार तैयार किया जाए और पुराने सफल चुनावी मॉडल को नए राजनीतिक माहौल के अनुरूप दोबारा इस्तेमाल किया जाए।
बसपा की राजनीति में सतीश चंद्र मिश्रा लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। खासतौर पर ब्राह्मण समाज के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने और विभिन्न सामाजिक समूहों को एक मंच पर लाने की रणनीति में उनका योगदान अहम माना जाता है। मायावती के नेतृत्व में बसपा ने वर्ष 2007 के विधानसभा चुनाव में दलित और ब्राह्मण समेत विभिन्न सामाजिक वर्गों को साथ जोड़कर उल्लेखनीय सफलता हासिल की थी। पार्टी अब उसी तरह की व्यापक सामाजिक भागीदारी की संभावनाएं तलाश रही है।
मायावती की रणनीति का एक प्रमुख हिस्सा ‘सर्वसमाज’ की राजनीति को मजबूत करना है। इसका उद्देश्य केवल एक विशेष सामाजिक वर्ग पर निर्भर रहने के बजाय समाज के अलग-अलग तबकों के बीच पार्टी का समर्थन बढ़ाना है। इसी वजह से सतीश चंद्र मिश्रा की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्हें अलग-अलग सामाजिक समूहों के प्रभावशाली लोगों और संभावित समर्थकों तक पार्टी का संदेश पहुंचाने की जिम्मेदारी में आगे किया जा सकता है।
बसपा के सामने उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक स्थिति को मजबूत करने की चुनौती है। पिछले कुछ चुनावों में पार्टी के वोट प्रतिशत और विधानसभा में प्रतिनिधित्व में गिरावट देखने को मिली है। ऐसे में मायावती संगठन के पुराने ढांचे को सक्रिय करने के साथ-साथ नए मतदाताओं और सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाने पर जोर दे रही हैं।
सतीश चंद्र मिश्रा को नई भूमिका दिए जाने के पीछे पार्टी की रणनीति को व्यापक सामाजिक गठजोड़ से जोड़कर देखा जा रहा है। बसपा के लिए ब्राह्मण मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाना भी अहम हो सकता है। 2007 के चुनाव में पार्टी की सोशल इंजीनियरिंग रणनीति में ब्राह्मण समाज की भागीदारी को काफी महत्व मिला था। उस चुनाव में बसपा ने पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। हालांकि, मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियां उस समय से काफी अलग हैं और इसलिए पार्टी को अपनी रणनीति में बदलाव भी करना होगा।
राज्य की राजनीति में इस समय कई दल अपने-अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटे हैं। ऐसे में बसपा की कोशिश अपने पारंपरिक दलित आधार को बनाए रखते हुए गैर-दलित वर्गों में भी समर्थन बढ़ाने की है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यदि अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संगठन की पकड़ मजबूत होती है तो आगामी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन की संभावना बन सकती है।
मायावती की रणनीति में संगठनात्मक विस्तार भी अहम भूमिका निभा सकता है। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने, स्थानीय नेताओं को जिम्मेदारी देने और क्षेत्रवार सामाजिक समीकरणों का अध्ययन करने पर जोर दिया जा सकता है। पार्टी के लिए यह जरूरी होगा कि चुनावी रणनीति केवल घोषणाओं तक सीमित न रहे, बल्कि जमीनी स्तर पर उसका असर भी दिखाई दे।
सतीश चंद्र मिश्रा की नई जिम्मेदारी इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है। उनके अनुभव और विभिन्न सामाजिक वर्गों के बीच संपर्क को पार्टी चुनावी अभियान में इस्तेमाल करना चाहती है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि बसपा 2007 के सोशल इंजीनियरिंग मॉडल को किस रूप में दोहराती है और उसमें मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार क्या बदलाव करती है।
आगामी विधानसभा चुनाव बसपा के लिए अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का महत्वपूर्ण अवसर होगा। मायावती के सामने दलित आधार को मजबूत रखने के साथ-साथ नए सामाजिक समूहों को जोड़ने की चुनौती है। सतीश चंद्र मिश्रा को मिली नई भूमिका इसी प्रयास का संकेत देती है और आने वाले महीनों में बसपा की चुनावी रणनीति में उनकी सक्रियता बढ़ सकती है।