नई दिल्ली: भारत में युवाओं की शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास को लेकर एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश में 15 से 29 वर्ष की आयु के अनुमानित 8.7 करोड़ युवा NEET श्रेणी में हैं। यहां NEET का अर्थ है ऐसे युवा जो न तो शिक्षा हासिल कर रहे हैं, न रोजगार में हैं और न ही किसी तरह का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। यह आंकड़ा देश में युवाओं को शिक्षा और रोजगार से जोड़ने के साथ-साथ कौशल विकास के सामने मौजूद बड़ी चुनौती को भी उजागर करता है।
नीति आयोग की “रीइमेजिनिंग स्किलिंग फॉर विकसित भारत@2047” शीर्षक वाली रिपोर्ट में युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने और स्थानीय स्तर पर रोजगार की मांग के अनुरूप कौशल उपलब्ध कराने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट में NEET युवाओं की स्थिति को समझने के लिए वर्ष 2021 में आयोजित राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 78वें दौर के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
15 से 29 साल के युवाओं की स्थिति ने बढ़ाई चिंता
रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 29 वर्ष की आयु के बड़ी संख्या में युवा शिक्षा, रोजगार या प्रशिक्षण से बाहर हैं। यह स्थिति केवल बेरोजगारी तक सीमित नहीं है, क्योंकि NEET श्रेणी में वे युवा भी शामिल होते हैं जो किसी शिक्षण संस्थान में नहीं पढ़ रहे और किसी औपचारिक या अनौपचारिक प्रशिक्षण का हिस्सा भी नहीं हैं।
युवाओं की इस बड़ी आबादी को देश की आर्थिक क्षमता से जोड़ना आने वाले वर्षों में महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है। भारत की युवा आबादी को आर्थिक विकास की ताकत माना जाता है, लेकिन यदि बड़ी संख्या में युवा शिक्षा, रोजगार और कौशल प्रशिक्षण से बाहर रह जाते हैं तो इसका असर उनकी आय, करियर और देश की उत्पादकता पर पड़ सकता है।
शिक्षा और रोजगार के बीच क्यों फंस रहे युवा?
नीति आयोग की रिपोर्ट में युवाओं की वित्तीय स्थिति और शिक्षा पर होने वाले खर्च को भी महत्वपूर्ण कारणों में शामिल किया गया है। कम आय वाले परिवारों के विद्यार्थियों के लिए कॉलेज की फीस, ट्यूशन और अन्य शैक्षणिक खर्च बड़ी चुनौती बन सकते हैं। कई परिवारों में आर्थिक दबाव के कारण युवाओं को पढ़ाई जारी रखने के बजाय जल्दी कमाई शुरू करने का विकल्प चुनना पड़ता है।
दूसरी ओर, केवल पारंपरिक डिग्री हासिल करना भी हर युवा के लिए रोजगार की गारंटी नहीं बन पा रहा है। नौकरी बाजार में कई क्षेत्रों में व्यावहारिक और तकनीकी कौशल की मांग बढ़ रही है। ऐसे में डिग्री और रोजगार के बीच कौशल का अंतर युवाओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकता है।
कम आय वाले परिवारों पर ज्यादा असर
रिपोर्ट के मुताबिक कम आय वाले परिवारों के युवा विशेष रूप से वित्तीय बाधाओं का सामना करते हैं। उच्च शिक्षा के बढ़ते खर्च के साथ-साथ प्रतियोगी परीक्षाओं, कोचिंग और प्रशिक्षण पर होने वाला अतिरिक्त खर्च भी परिवारों के बजट पर दबाव डालता है।
ऐसे परिवारों के लिए पारंपरिक शिक्षा के साथ अतिरिक्त कौशल प्रशिक्षण हासिल करना आर्थिक रूप से कठिन हो सकता है। यही वजह है कि कई युवा ऐसी नौकरियां चुनने के लिए मजबूर हो सकते हैं जिनमें कम वेतन मिलता है, जबकि कुछ युवा रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं होने पर श्रम बाजार से बाहर हो जाते हैं।
डिग्री के बाद भी युवाओं के सामने रोजगार की चुनौती
भारत में बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं, लेकिन शिक्षा पूरी करने के बाद उनकी उम्मीद के अनुरूप रोजगार मिलना हमेशा आसान नहीं होता। कई क्षेत्रों में कंपनियां डिग्री के साथ-साथ डिजिटल स्किल, तकनीकी दक्षता, संचार क्षमता और व्यावहारिक अनुभव को भी महत्व देती हैं।
इस स्थिति में यदि युवाओं को पढ़ाई के दौरान ही रोजगारपरक प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाए तो शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद अंतर को कम किया जा सकता है। नीति आयोग ने भी कौशल विकास को स्थानीय मांग और रोजगार के अवसरों से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया है।
स्थानीय स्तर पर कौशल प्रशिक्षण पर जोर
नीति आयोग की रिपोर्ट में युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऐसे कौशल कार्यक्रमों की आवश्यकता बताई गई है, जो स्थानीय रोजगार और बाजार की मांग के अनुरूप हों। इसका मतलब है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम केवल प्रमाणपत्र देने तक सीमित न रहें, बल्कि युवाओं को वास्तविक काम और रोजगार के लिए तैयार करें।
स्थानीय स्तर पर उद्योगों, प्रशिक्षण संस्थानों और रोजगार देने वाली कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल बनाया जा सकता है। इससे युवाओं को अपने क्षेत्र में उपलब्ध अवसरों के अनुसार प्रशिक्षण मिलने की संभावना बढ़ेगी। साथ ही छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं के लिए भी रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं।
NEET युवाओं को मुख्यधारा में लाना क्यों जरूरी?
भारत के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि युवा आबादी देश की आर्थिक और सामाजिक प्रगति में बड़ी भूमिका निभा सकती है। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार और प्रशिक्षण से जोड़ा जाए तो उनकी आय बढ़ने के साथ परिवारों की आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो सकती है।
इसके अलावा कौशलयुक्त युवा उद्यमिता और स्वरोजगार की दिशा में भी आगे बढ़ सकते हैं। डिजिटल अर्थव्यवस्था, विनिर्माण, सेवा क्षेत्र, पर्यटन, स्वास्थ्य, लॉजिस्टिक्स और अन्य उभरते क्षेत्रों में कौशल आधारित रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
सरकार और नीति निर्माताओं के सामने बड़ी चुनौती
8.7 करोड़ युवाओं का NEET श्रेणी में होना एक ऐसा आंकड़ा है जो शिक्षा और रोजगार नीतियों के बीच बेहतर समन्वय की आवश्यकता को सामने लाता है। केवल रोजगार पैदा करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि युवाओं को उन रोजगारों के लिए तैयार करना भी जरूरी होगा।
नीति आयोग की रिपोर्ट इसी दिशा में कौशल विकास को रोजगार की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने की ओर संकेत करती है। आने वाले वर्षों में भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक यह सुनिश्चित करना हो सकता है कि युवा शिक्षा पूरी करने के बाद निष्क्रिय न रहें, बल्कि उन्हें रोजगार, प्रशिक्षण या उद्यमिता के स्पष्ट अवसर मिलें।
निष्कर्ष: नीति आयोग की रिपोर्ट में सामने आया 8.7 करोड़ NEET युवाओं का अनुमान भारत के लिए एक गंभीर नीति चुनौती को दर्शाता है। हालांकि यही युवा आबादी देश की सबसे बड़ी ताकत भी बन सकती है, बशर्ते उन्हें समय पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, किफायती प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जाएं। विकसित भारत@2047 के लक्ष्य को हासिल करने के लिए युवाओं को शिक्षा और रोजगार की मुख्यधारा से जोड़ना बेहद अहम होगा।