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आंदोलन से पहले ही वार्ता पर सवाल, रविन्द्र तिवारी ने साधा निशाना

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्तर से जुड़े सामाजिक मुद्दे को लेकर प्रस्तावित आंदोलन और उसके समानांतर शुरू हुई वार्ता को लेकर सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता रविन्द्र तिवारी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब आंदोलन का आयोजन दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित था, तो उससे पहले ही वार्ता का विमर्श उत्तर प्रदेश […]

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  • August 26, 2026 11:36 am IST, Published 2 hours ago

नई दिल्ली। राष्ट्रीय स्तर से जुड़े सामाजिक मुद्दे को लेकर प्रस्तावित आंदोलन और उसके समानांतर शुरू हुई वार्ता को लेकर सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता रविन्द्र तिवारी ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब आंदोलन का आयोजन दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रस्तावित था, तो उससे पहले ही वार्ता का विमर्श उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक कैसे पहुंच गया। तिवारी ने इसे आंदोलन के मूल उद्देश्य और राष्ट्रीय स्वरूप को प्रभावित करने वाला प्रयास बताया है।

रविन्द्र तिवारी ने अपने बयान में कहा कि आंदोलन अभी शुरू भी नहीं हुआ था और उससे पहले ही मानो रेफरी ने इंटरवल घोषित कर दिया। उनके अनुसार, जब किसी विषय का स्वरूप राष्ट्रीय हो और उससे जुड़े निर्णय एवं समाधान का सामर्थ्य केंद्र स्तर पर निहित हो, तब किसी एक प्रदेश के उपमुख्यमंत्री की ओर से वार्ता का आमंत्रण कई गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने इसी संदर्भ में यह भी पूछा कि उपमुख्यमंत्री का पद संवैधानिक व्यवस्था में किस स्वरूप और अधिकार क्षेत्र के साथ राष्ट्रीय विषयों की ऐसी वार्ता में भूमिका निभाता है।

जंतर-मंतर के आंदोलन से लखनऊ की वार्ता तक सवाल

तिवारी ने कहा कि जंतर-मंतर पर प्रस्तावित आंदोलन का उद्देश्य व्यापक सामाजिक विमर्श और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी बात रखना था। ऐसे में आंदोलन से पहले किसी प्रदेश स्तर के राजनीतिक पदाधिकारी की ओर से वार्ता की पहल को लेकर पारदर्शिता आवश्यक है। उन्होंने कहा कि आंदोलनकारियों और संबंधित सामाजिक नेतृत्व के बीच होने वाले विमर्श को किसी सीमित राजनीतिक दायरे में बांधने के प्रयास से मूल विषय कमजोर हो सकता है।

उन्होंने अपने वक्तव्य में राजनीतिक नेतृत्व की कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। तिवारी का आरोप है कि एक ओर कुछ राजनीतिक नेता अपने राजनीतिक हितों के लिए विभिन्न समूहों के सामने समझौते की मुद्रा में दिखाई देते हैं, जबकि दूसरी ओर अपने अधिकार, पहचान, सम्मान और भविष्य को लेकर संघर्ष कर रहे सामाजिक वर्गों की आवाज को विभाजित करने की कोशिश की जाती है।

हालांकि, तिवारी के इन आरोपों पर संबंधित पक्ष की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आने की जानकारी नहीं दी गई है। इसलिए उनके वक्तव्य को उनके व्यक्तिगत राजनीतिक एवं सामाजिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जाना चाहिए।

राष्ट्रीय विषय पर प्रदेश स्तर की पहल क्यों?

रविन्द्र तिवारी ने अपने बयान में सबसे बड़ा सवाल यही उठाया कि यदि मुद्दा राष्ट्रीय है, तो वार्ता की पहल का स्वरूप भी राष्ट्रीय स्तर का होना चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी भी सामाजिक आंदोलन के पीछे मौजूद लोगों की भावनाओं और मांगों को समझने के लिए व्यापक संवाद जरूरी है।

उन्होंने कहा कि संवाद लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन संवाद की प्रक्रिया तभी सार्थक हो सकती है जब उसमें सभी संबंधित पक्षों की भागीदारी और पारदर्शिता हो। यदि वार्ता का स्वरूप सीमित हो जाए या आंदोलन के मूल मुद्दों से अलग दिशा में चला जाए, तो इससे सामाजिक अविश्वास बढ़ने की आशंका रहती है।

तिवारी ने इस पूरे घटनाक्रम को सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि आने वाले समय में यह स्पष्ट होना चाहिए कि वार्ता का उद्देश्य वास्तविक समाधान है या आंदोलन के प्रभाव को कम करना।

ब्राह्मण समाज के मुद्दों पर भी जताई चिंता

रविन्द्र तिवारी ने अपने वक्तव्य में ब्राह्मण समाज और तथाकथित अगड़े समाज से जुड़े सामाजिक प्रश्नों को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि समाज के भीतर अपनी पहचान, सम्मान, सामर्थ्य और भविष्य को लेकर जागरूकता बढ़ रही है। उनके अनुसार, इस जागरूकता को राजनीतिक लाभ-हानि के चश्मे से देखने के बजाय सामाजिक संवाद के रूप में समझने की आवश्यकता है।

उन्होंने दावा किया कि समाज का एक वर्ग लंबे समय से अपनी समस्याओं और अपेक्षाओं को राजनीतिक व्यवस्था के सामने रखने का प्रयास कर रहा है। ऐसे में यदि किसी आंदोलन के मूल विमर्श को अलग-अलग स्तरों पर बांटने की कोशिश होती है, तो इससे असंतोष और बढ़ सकता है।

तिवारी ने राजनीतिक दलों को चेताते हुए कहा कि किसी भी समाज या वर्ग की भावनाओं को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि राजनीति में विश्वास और सामाजिक समर्थन अचानक नहीं बनता, बल्कि लंबे समय तक चलने वाले संबंधों और विश्वास पर आधारित होता है।

भाजपा की राजनीति पर भी उठाए सवाल

अपने बयान में रविन्द्र तिवारी ने भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक कार्यशैली पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जिस परिवार, विचार और सामाजिक आधार ने किसी राजनीतिक संगठन को मजबूती दी हो, उसके साथ संवाद और सम्मान का रिश्ता बनाए रखना राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी होनी चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि यदि सामाजिक आधार को केवल चुनावी गणित के रूप में देखा जाएगा और उसकी वास्तविक चिंताओं को नजरअंदाज किया जाएगा, तो इससे राजनीतिक दूरी पैदा हो सकती है। तिवारी ने इसे राजनीति के लिए गंभीर चेतावनी बताते हुए कहा कि किसी भी संगठन का भविष्य उसके समर्थकों और सामाजिक आधार से अलग नहीं हो सकता।

उन्होंने यह भी कहा कि सामाजिक समूहों के भीतर पैदा हो रही नई राजनीतिक चेतना को केवल प्रचार, आरोप-प्रत्यारोप या राजनीतिक प्रबंधन से नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए वास्तविक संवाद, विश्वास और ठोस पहल जरूरी होगी।

संघर्ष मानव जीवन का सर्वोच्च सोपान”

रविन्द्र तिवारी ने अपने वक्तव्य में संघर्ष को सामाजिक परिवर्तन का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने कहा कि इतिहास में विजय अंततः सत्य और न्याय के पक्ष में खड़े संघर्षों की हुई है। उनके अनुसार, सामाजिक आंदोलनों का उद्देश्य किसी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ व्यक्तिगत संघर्ष नहीं, बल्कि अपने अधिकारों और सम्मान से जुड़े प्रश्नों को लोकतांत्रिक तरीके से सामने रखना होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि यदि किसी समाज में जागरूकता की शुरुआत हो चुकी है, तो उसके प्रभाव को समाप्त करना आसान नहीं होता। उनके अनुसार सामाजिक जागरण पहले भी परिवर्तन का माध्यम बना है और वर्तमान समय में भी इसकी प्रासंगिकता बनी हुई है।

तिवारी ने कहा कि आंदोलन का रास्ता चाहे लंबा हो, लेकिन यदि उसके पीछे वास्तविक सामाजिक भावना और व्यापक समर्थन है तो उसका प्रभाव दूर तक जाता है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि मौजूदा घटनाक्रम आने वाले समय में बड़े सामाजिक और राजनीतिक बदलाव का आधार बन सकता है।

सामाजिक जागरण शुरू हुआ तो समापन भी होगा”

अपने बयान के अंतिम हिस्से में रविन्द्र तिवारी ने कहा कि सामाजिक जागरण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और अब इसे केवल राजनीतिक रणनीति के माध्यम से रोकना संभव नहीं होगा। उन्होंने कहा कि समाज अपने अधिकारों, सम्मान और भविष्य को लेकर पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक हो रहा है।

उन्होंने ब्राह्मण समाज की ऐतिहासिक और सामाजिक भूमिका का उल्लेख करते हुए कहा कि समाज ने विभिन्न कालखंडों में विचार, शिक्षा, संस्कृति और सामाजिक दिशा निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उनके अनुसार, इस विरासत को वर्तमान समय की सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों से जोड़कर देखना होगा।

उन्होंने राजनीतिक दलों से अपील की कि सामाजिक भावनाओं को समझें और किसी भी आंदोलन को विभाजित करने के बजाय उसके मूल प्रश्नों पर सार्थक संवाद की पहल करें।

आगे क्या होगा, इस पर टिकी नजर

रविन्द्र तिवारी के बयान के बाद अब सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि प्रस्तावित आंदोलन और वार्ता की दिशा आगे क्या होगी। क्या राष्ट्रीय मुद्दे पर केंद्र स्तर पर औपचारिक संवाद होगा या प्रदेश स्तर की पहल ही आगे बढ़ेगी, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट हो सकता है।

फिलहाल तिवारी ने अपने बयान के माध्यम से यह स्पष्ट संकेत दिया है कि वे आंदोलन को केवल राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक जागरण के रूप में देख रहे हैं। उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन तीखे राजनीतिक संदेश के साथ करते हुए कहा कि यदि नाव डूबती है तो उसमें बैठे सभी लोगों पर उसका असर पड़ता है।

उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों को केवल तत्काल राजनीतिक लाभ के नजरिये से देखने के बजाय दीर्घकालिक सामाजिक और राजनीतिक परिणामों को ध्यान में रखना होगा।

रविन्द्र तिवारी ने अंत में “इति शुभम्, जय हिन्द, जय भारत” के साथ अपने वक्तव्य का समापन किया और खुद को सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में प्रस्तुत किया।

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