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अमेरिकी कॉलेजों में भारतीय छात्रों के आवेदन घटे

नयी दिल्ली: अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने की योजना बना रहे भारतीय छात्रों के लिए बदलती आव्रजन नीतियां और वीजा नियम चिंता का विषय बनते दिख रहे हैं। एक गैर-लाभकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी कॉलेजों में दाखिले के लिए भारतीय छात्रों के आवेदनों में 2025-26 शैक्षणिक सत्र के दौरान पिछले वर्ष की […]

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  • August 26, 2026 6:45 pm IST, Published 35 minutes ago

नयी दिल्ली: अमेरिका में उच्च शिक्षा हासिल करने की योजना बना रहे भारतीय छात्रों के लिए बदलती आव्रजन नीतियां और वीजा नियम चिंता का विषय बनते दिख रहे हैं। एक गैर-लाभकारी संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी कॉलेजों में दाखिले के लिए भारतीय छात्रों के आवेदनों में 2025-26 शैक्षणिक सत्र के दौरान पिछले वर्ष की तुलना में करीब 15 फीसदी की कमी दर्ज की गई है। यह गिरावट ऐसे समय में सामने आई है, जब अमेरिका में पढ़ाई करने वाले विदेशी छात्रों के बीच भारत लंबे समय से प्रमुख स्रोत देश रहा है।

एक हजार से अधिक उच्च शिक्षण संस्थानों का प्रतिनिधित्व करने वाले ‘कॉमन ऐप’ की रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आवेदनों में व्यापक बदलाव की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2026-27 सत्र के लिए स्नातक पाठ्यक्रमों में कुल आवेदनों की संख्या में वृद्धि हुई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय आवेदकों की संख्या में एक मार्च तक 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। रिपोर्ट में इसे अब तक की सबसे बड़ी गिरावटों में से एक बताया गया है।

भारत से आने वाले आवेदनों में 15 फीसदी की कमी विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अमेरिकी कॉलेज और विश्वविद्यालय लंबे समय से भारतीय छात्रों के लिए पसंदीदा विकल्प रहे हैं। इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, बिजनेस, डेटा साइंस और अन्य तकनीकी विषयों में बड़ी संख्या में भारतीय छात्र अमेरिकी संस्थानों में दाखिला लेते हैं। ऐसे में आवेदन संख्या में कमी का असर आने वाले वर्षों में भारतीय छात्रों की अमेरिका में मौजूदगी पर भी पड़ सकता है।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं के अनुसार, अमेरिका की बदलती वीजा व्यवस्था और आव्रजन नीतियों को लेकर अनिश्चितता छात्रों के फैसलों को प्रभावित कर सकती है। शिक्षाविदों के एक संगठन की रिपोर्ट में पहले ही अनुमान लगाया गया था कि कड़े वीजा नियमों और नीतिगत अनिश्चितता के कारण 2026 के आगामी सत्र में अमेरिकी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के दाखिले में करीब 1.1 लाख की कमी हो सकती है।

अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या में कमी का असर केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहता। विदेशी छात्र अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2025-26 शैक्षणिक सत्र में अंतरराष्ट्रीय छात्रों ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था में करीब 41.77 अरब डॉलर का योगदान दिया था। 2026-27 में यह योगदान घटकर लगभग 38.37 अरब डॉलर रहने का अनुमान है। इसका मतलब है कि विदेशी छात्रों की संख्या में गिरावट का आर्थिक असर भी देखने को मिल सकता है।

अमेरिका में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों में भारतीय छात्रों की हिस्सेदारी काफी महत्वपूर्ण है। संबंधित रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 शैक्षणिक सत्र में भारत से 3.63 लाख से अधिक छात्रों ने अमेरिका के विभिन्न शैक्षणिक कार्यक्रमों में दाखिला लिया था। 2025-26 में अमेरिका में पढ़ने वाले कुल अंतरराष्ट्रीय छात्रों की अनुमानित संख्या करीब 11.69 लाख रही, जबकि 2024-25 में यह संख्या लगभग 10.57 लाख बताई गई थी।

हालांकि अलग-अलग रिपोर्टों में छात्रों की संख्या और उनकी गणना के तरीके अलग हो सकते हैं, लेकिन आवेदन में गिरावट का रुझान अमेरिकी उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण संकेत है। भारतीय छात्रों के लिए अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था की आकर्षकता के बावजूद अब वीजा प्रक्रिया, नीतिगत बदलाव और भविष्य की अनिश्चितता जैसे मुद्दे निर्णय लेने में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं।

अमेरिकी सरकार ने जुलाई में छात्र और विजिटर वीजा से संबंधित नए नियम भी अधिसूचित किए हैं। इसके तहत पहले से चली आ रही प्रवास अवधि की व्यवस्था में बदलाव करते हुए अधिकतम चार वर्ष की अवधि तय की गई। यह अवधि आमतौर पर किसी शैक्षणिक पाठ्यक्रम की सामान्य अवधि के अनुरूप मानी जाती है।

नए नियमों और वीजा प्रक्रिया को लेकर छात्रों तथा विश्वविद्यालयों की चिंताएं ऐसे समय में सामने आ रही हैं, जब अमेरिकी उच्च शिक्षा संस्थान अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर काफी निर्भर हैं। विदेशी छात्रों की फीस और उनसे जुड़ी आर्थिक गतिविधियां विश्वविद्यालयों और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण स्रोत हैं।  यदि नीतिगत अनिश्चितता और वीजा संबंधी सख्ती का असर आगे भी जारी रहता है, तो अमेरिकी संस्थानों को अंतरराष्ट्रीय दाखिलों में और कमी का सामना करना पड़ सकता है। वहीं भारतीय छात्र भी ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के अन्य देशों जैसे वैकल्पिक शिक्षा बाजारों पर अधिक विचार कर सकते हैं।

 

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